कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पिशुन कर्म वर्णन
( २६ )
जगजीवन बोध
ताका नाम सुनो रे भाई । महा जालके फन्द फँदाई ॥
झूठे झूठ मिले संसारा । नरक कुण्ड में नाखन हारा ॥
पिसुन कर्म वर्णन
प्रथम माता
माता मनमें करै बखाना । यह भल उग्यो आजुको भाना ॥
बालक जन्मा मोरे कोखा । जन्म भरे की भागी धोखा ॥
नाइन
नाइन एक बधार्ई लायी । तीन तो एकै बात जनायी ॥
मेरा कहा करो तुम कामा । नाक छेदि कहो नाथू नामा ॥
नाल औवल पीसो गाढो । दिहली को तब बालक काढो ॥
यह तो बात मैं गुप्त सुनायी । सुवा जिवाका तो सुहि दायी ॥
पिता
पिताके मनमें ऐसी आवैं । उमगे हरष हिय नाहि समावैं ॥
बाटे पान मिठाइ बहुत । धन्य भाग्य मोर जनम्यो पूता ॥
काका
काका कहै मैं उतरूं पारा । बालक खेले घरके द्वारा ॥
कर्म जोर मोरें बड कीन्हा । क्षेत्रपाल मोहि बालक दीन्हा ॥
दादा
दादा सुनिकै दौरे आये । पोता देख बहुत सुख पाये ॥
दासी हाथे कुवैर मैगाया । हेतु प्रीति से कण्ठ लगाया ॥
दादी
दादीके मन हर्ष अपारा । लेत बलाई बारंबारा ॥
मैं करी बहुत सतियनकी सेवा । भये प्रसन्न मोर कुलदेवा ॥
नानी
नानी आवत वेगि उठाया । सुख चुम्बा है कण्ठ लगाया ॥
लून ले शिर ऊपर वारा । द्रव्य माल पुनि बहुत उतारा ॥
बोधसागर
( २७ )
नाना
अब नाना मुख देखन आया । दौहित्रा देखि अधिक मुख पाया ॥
उमँगे हरष हिये न अमायी । कंचन चूरा दिया बधायी ॥
भुआ
बहुत करै हरष भुआ बाई । दिन दिन अधिकी करै बधाई ॥
मुख चुम्बा दै कंठ लगावे । हिये हर्ष उमँग नहिं मावे ॥
मौसी
मौसी मन बहु हर्ष उठावै । धन्य बहिन को कोख तरावै ॥
मुख चूमे अरु कण्ठ लगावै । अतिशय उमँग हिये नहिं मावै ॥
अडोसी पडोसी
बुढिया एक जो बोले आयी । तिन यक बात कही समझायी ॥
बालक तैल लौन सों लीजै । लौना नाम कहे धरि दीजै ॥
दूसरी पडोसिन
दूजी कहै सुनो रे बाई । बालक डारो छीतर माई ॥
सांचो टोना यही कहावों । इनको छीतर कहि बतलावो ॥
तीसरी पडोसिन
तिया तीसरी बोले सयानी । मैं जान्यों सो काडु न जानी ॥
कोदरा बरोबर तौल के लीजै । याकर नाग कोदरसिंह कीजै ॥
चौथी पडोसिन
चमरिन गोद यहीको डारो । मोल लेइ पुनि ताहि उजारो ॥
चमरूसिंह नाम यहि केरा । बालक याते जिवै घनेरा ॥
पांचवी पडोसिन
याको धूर गुनौरे डारो । दूत पराछित या विधि मारो ॥
घूरन सिंहै अरु गेनौ नामा । दीजे ताहि सुधरे सब कामा ॥
( २८ )
जगजीवनबोध
छठी पडोसिन
यह सब बात बताओ माई । चूल्हे डारो चुल्हन कहाई ॥
जेती नारि आर्यों तेहि बारा । सबहिन आपन मता उचारा ॥
कोह काहू कोह काहु बतावैं । स्यानप आपन सबहि जतावैं ॥
ओझा और स्याने
बुढवै एक जो सीस धुनावैं । वाके शिर पर भैरों आवैं ॥
सो कह हमको बैल बधाओ । भैरोंसिघ कही बतलाओ ॥
देवी पूजक एक तब आया । देवीसिंह तब नाम बताया ॥
गाजी मुर्गी कोह चढ़ावैं । गाजीदीन तब नाम बतावैं ॥
यहि विधि अनेकनहू आये । आपन आपन उक्ति सुनाये ॥
पुरोहित
घरको पुरोहित ऐसी कही । मनको मनोरथ पूरण सही ॥
यह तो बडा सपूत कहावै । इनके तुलै कोह नहीं आवै ॥
पुरोहित कह यजमान है मेरा । कुल देवी भैरोंका चेरा ॥
चारण और भाट
चारण भाट जपै महामाई । भोजक भाट तहां चलि आई ॥
सबही मिलि दीनी आशीशा । महामाइ सुत कीन्ह बरखीशा ॥
मुसलमान फकीर
दवैश एक कहै समुझाई । नाम फकीरा कहो रे भाई ॥
बांधि गांठ गले में दीजे । सब पीरों का चारण लीजे ॥
योगी
जोगी एक तहां चलि आया । मेरी भभूत का परचा पाया ॥
कहा हमारा सुनिकै लीजे । याका नाम सदाशिव दीजे ॥
दिगम्बर
यन्त्र मन्त्र जतीकरि लाये । करि तावीज गले पहराये ॥
व्रत्र वटु सूअरदांत मंगायी । एक सुपारी माहि मढायी ॥