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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1032

( १६४ )

कर्मबोध

अक्षर सागर निर्भर बानी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥
गोरख भरथरि गोपीचन्दा । कर्म फांस सबही पुनि फन्दा ॥
सौ औ सात चौदह इक्कीसा । ब्रह्माके चौरासी भेसा ॥
कर्म फांस तहवों लग राखा । जहाँ लगवेद व्यास कछु भाषा ॥
दश औ द्वादश कर्म बखाना । जिन जाना तिनही पहिचाना ॥
कर्म अकर्म मूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥
अक्षर सागर मूल भँडारा । अक्षर मूल भेद उजियारा ॥
अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥

साखी-कबीर-कर्म डोर चारों युग, सुनो सन्त सब दास ।
तत्त्वभेद निस्तत्त्व लहि, जगते रहो उदास ॥

रमैनी

सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारन कर्म नन्द घर गाजा ॥
एक नारि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपी निरमावा ॥
कारन कर्म केलि भवकीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥
जहँ तहँ गोरस जाय चुरावा । जहँ तहँ कर्म तहाँ ले खावा ॥
कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥
कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥
कर्म कारण जो तहाँ सिधारा । कारण कर्म पीव विषधारा ॥
मारि तासु कीन्हीं गति चारा । कर्म फांस बोन्यो संसारा ॥
कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्यो हाथा ॥
कर्महि मारि विध्वंस जो कीन्हा । कर्म फांस सबही आधीना ॥
कुञ्जा कछू कर्म जो कीन्हा । कारन कर्म कृष्णगति दीन्हा ॥
कर्मपताल कालेश्वर नाथा । सांवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥
यज्ञ अश्वमेध करत बलिराजा । कर्मते जाय पताल विराजा ॥
कर्मही वामन रूप बनाया । बलिराजापै दान दिवाया ॥