कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
गरुड़का अमृत लाकर बालकको जिलाना और तीनों देवका हार मानना
( १०४ )
गरुडबोध
बाजे ताल मृदंग अपारा । उठे रँगसों अनहद झंकारा ॥
तारी उठे तत तत सों सारा । हंसे सबै सब साधु विचारा ॥
निर्गुण भक्ति कीन्हा लौलायी । चहुँदिशि अगर रहा मँहँकायी ॥
देख सभा सब मोही भाई । सब मोहे कछु कही न जाई ॥
मोहि नाग नागेश्वर भारी । मोहि रही सब सभा विचारी ॥
मोहे गण गँधर्व मुनि देवा । कोई भक्त का जाने न भेवा ॥
वासुकिदेव अस्तुति अनुसारी । धन्य कबीर जो भक्ति तुम्हारी ॥
पायो दर्श धन्य भाग हमारो । धन्य कबीर यहाँ पग धारो ॥
धन्य कबीर तुम्हारी वानी । मोहि रही सब भगतिन रानी ॥
कीन्हो भक्ति पहर डुइ भाई । अति आनँद होय मंगल गार्ई ॥
पुनि उठिके हम आरति लीना । एकोतर नरियर मालुम कीना ॥
परवाना ब्रजबालहि दीनी । वह शिर नाइ बन्दगी कीनी ॥
पुनि समरथकी अस्तुति सुनायी । दीन प्रसाद सबहि बरतायी ॥
सब संतन लिन माथ चढ़ाही । आशिष दीन सकल मिलिताही ॥
दिन दशकै आदर करि लीना । सेवा भक्ति बहु विधि कीना ॥
संत साधुको बिदाई दीना । चादर धोती सबही लीना ॥
सबहि कहै मम आशिष लीजो । साधुन के चरणें चित दीजो ॥
ऐसी भाँति बिदा जो कियऊ । आपु आपु सब घरहि सिधैऊ ॥
चलत प्रेम सबहि को भाये । बहुत भाँति की अस्तुति लाये ॥
साखी-कहैं कबीर धर्मदाससे, यहि विधि भौ विस्तार ।
गरुड ज्ञान सबसे कियो, हारे सबे भुआर ॥
वक्ता के कण्ठ बसुँ, श्रेतहि श्रवण आहिँ ।
संतनके शीश वसुँ, ज्ञानिन हृदय माहिँ ॥
इति श्रीबोधसागरांतर्गत कबीरधर्मदाससम्भावे
गरुडबोधवर्णनो नाम षष्ठस्तंभः