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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद्गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका हठ करना पीछे शरणमें आना

बोधसागर

( ३९ )

बारहवीं रानी सूरजमती । हंस रूप है ताकी गती ॥
द्वादश रानी सब बनि आयी । एक अंग होय सब भक्ति करायी ॥
राजा छडीदार पठवाई । तो वो कुँवरको लाय बुलाई ॥

छडीदार बचन

छडीदार कहै कर जोरी । राजकुँवर सुनु विन्ती मोरी ॥
राजा रानि गुरु चरणै आये । ताते तुमको बेगि बुलाये ॥
गरभवाससों करै निरुवारा । तुरत चलो जनि लावो बारा ॥

कुँवर बचन

तुम छडीदार कहो बात विचारी । कैसा गुरु है सो अधिकारी ॥

छडीदार बचन

हम मति हीन कछु नहि जाना । निश्चय आही पुरुष पुराना ॥
यह सुपने नाहीं कहुँ देखा । सुर मुनि नारद शारद पेखा ॥

कुँवर बचन

कुँवर बीनती कीन सुहाती । सुनतैं बात जुडानी छाती ॥
हंस रूप चारों हैं भाई । उमंग हरष हिये नाहि समाई ॥
जहाँ सतगुरु आसन कीन्हा । कुँवर चार आइ दर्शन लीन्हा ॥
बडा कुँवर वह सूरजभाना । गुरु स्वरूप हृदय में आना ॥
दूजा कुँवर इन्द्रमन दासा । शब्दै पीवै शब्दकी आसा ॥
तीजै कहिये चतुर्भुज कुमारा । शब्द सुनत वह सीस उतारा ॥
चौथा कुँवर विक्रम दासा । जिन तन मनकी छोडी आसा ॥
चारों कुँवर धरे गुरु पाई । तन मन धन सब प्रीति चढाई ॥
कदलौ केर पतवार धरायी । गज मुक्ताहल चौक पुरायी ॥
नरियल मोरि के मालूम कीन्हा । लिखि परवाना सबकूँ दीन्हा ॥
इतने हंस भये मन भावन । तिनको सतगुरु कीन्हा पावन ॥
तन मन धन सो बदला कीन्हा । शिरके साँट साहबको चीन्हा ॥
करी निछावर मेटे गर्भफेरा । अब तो भई भगतिकी वेरा ॥