सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पुनोकी बड़ाई

( ९२ )

ज्ञानसागर

मूल नाम मुक्ति फल जोगा । ताते नरिअर मिष्ठानका भोगा ॥
देह बिसार जोग फल चाखा । मन वच कर्म नरिअर सत भाखा ॥
उज्ज्वल मंदिर सेत सम्हारा । तेहि रूप साज्यो पनवारा ॥
मुक्ति पदारथ अबेधा हीरा । तेहि पाये कोई गहिर गंभीरा ॥
चंदन काष्ठ सिंहासन चाही । सुमिरण नाम इकोतर आही ॥

साखी-उत्तम पान बडो ना, टूटा भंग न होय ॥
नरिअर चहिये निर्मल, महा मुक्ति फल होय ॥

चौपाई

और कछू बात संपत्ति आही । काचा जीव सुन बिचलेताही ॥
ताते सहज बताओ भाऊ । परचै जीवको परम स्वभाऊ ॥
अथवा जो इतना नहिं होई । सहज आरती थापो सोई ॥
सवा सेर आनो मिष्ठाना । सत्त सवासो आनो पाना ॥
प्रति पूनौ जो आरति करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु पूनौ कह अधिकारा । दया करौ दुख भंजन हारा ॥

साहिब कबीर वचन

तुम कह दोन्ह यही दिन पाना । तासौँ पूनौ आरति ठाना ॥
अथवा सबई अर्थ नहि जाना । दोई आरति थाप प्रमाना ॥
छठे मास साजौ निज बीरा । ताते दोई आरती मत धीरा ॥

साखी-जोग आरती फल बड़ा, सत्त वचन परकाश ॥

दुविधा मेटो निश्चय, सत्तलोक होय वास ॥

चौपाई

सत्तभाव देखहु मति धीरां । लगन साखि देख निज बीरा ॥
बिना लगन करो मत शिक्षा । जोती खेती जो भल दिशा ॥
ऊसरू बीज डारही कोई । निःफल खेती किसान की होई ॥