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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

गोड स्क्रिउ, कुंज, इनी

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कबीर— जीव नहीं हिंसा करे, प्रगट पाप शिर होय ।
पाप सभी सो देखिया, पुण्य न देखा कोय ॥ १३ ॥

कबीर— तिलभर मछली खायके, कोटि गऊ दे दान ।
काशी करवट ले मरे, तौ भी नरक निधान ॥ १४ ॥

कबीर— हँसा हो सोही हँसे, गावे जान खजान ।
कर गहि चोटा तानसी, साहबके दीवान ॥ १५ ॥

कबीर— काटा कूटी जे करें, ते पखण्डको भेस ।
निश्चय राम न जानि हैं, कहैं कबीर सँदेस ॥ १६ ॥

कबीर— बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल ।
जो बकरीको खात है, तिनको कौन हवाल ॥ १७ ॥

कबीर— आठ वाट बकरी गई, मांस मुल्ला गा खाय ।
अजहूँ खाल खटिक घर, विहिश्त कहाँ को जाय ॥ १८ ॥

कबीर— अण्डा किन बिसमिल किया, घुन कीस किया हलाल ।
मछली किन जब्बह किया, सब खाने क्या ख्याल ॥ १९ ॥

कबीर— काजी तुझे करीमका, कब आया परमान ।
घट फोरा घर घर किया, साहब केर निशान ॥ २० ॥

कबीर— काजीका बेटा मुआ, उरमें साले पीर ।
वह साहब सबका पिता, भला न माने बीर ॥ २१ ॥

कबीर— पीर सबनकी एकसी, काजी जाने नाहि ।
अपना गला कटायके, विहिश्त बसे क्यों नाहि ? ॥ २२ ॥

कबीर— मुरगी मुल्लासे कहे, जबह करत हैं मोहि ।
साहब लेखा मांगसी, शङ्कट परेगा तोहि ॥ २३ ॥

कबीर— काजी जीहू स्वाद वश, जीव हनत हैं, आय ।
चढ़ि मसजिद एके कहैं, क्यों दरगह सच होय ॥ २४ ॥

कबीर— काजी मुल्ला मरमियां, चले दुनीके साथ ।
दिलसे दीन निवारिया, करद लयी जब हाथ ॥ २५ ॥

कबीर— काला मुंह कर करदका, दिलसे दुई निवार ।
सब सूरत सुभानकी, अहमक मुल्ला मार ॥ २६ ॥

कबीर— जोर कर जो जबह करे, मुँहसे कहे हलाल ।
साहब लेखा मांगसी, तब होई कौन हवाल ॥ २७ ॥

कबीर— जोर किया सो जुलुम है, माँगे जबाब खुदाय ।

हजार दास्तान बुलबुल

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खालिक दर खूनी खड़ा, मार मुंहे मुंह खाय ॥ २८ ॥

कबीर— गला काटि कलमा पढे, किया है कहै हलाल ।

साहब लेखा मांगिहै, तब हो कौन हवाल ॥ २९ ॥

कबीर— गला गुस्सेका काटिये, मियां कहको मार ।

जो पांचोंको बस करे, तो पावे दीदार ॥ ३० ॥

कबीर— यह सब झूठी बन्दगी, बेरिया पांच निमाज ।

सांचे मारे मुंहपर, काजी करै अकाज ॥ ३१ ॥

कबीर— दिनको रोजा धरत हैं, रातको हनत है गाय ।

यह खून वह बन्दगी, क्योंकर खुशी खुदाय ॥ ३२ ॥

कबीर— चाला जाय था, आगे मिले खुदाय ।

मारो तुझसे किन कही, किन फरमाई गाय ॥ ३३ ॥

कबीर— शेख सबूरी बाहिरा, हाँका यमपुर जाय ।

जिनका दिल साबित नहीं, तिनको कहाँ खुदाय ॥ ३४ ॥

कबीर— तेई पीर हैं, जो जाने पर पीर ।

जो पर पीर न जानहीं, ते काफिर बेपीर ॥ ३५ ॥

कबीर— खूब खाना है खीचड़ी, जामें अमृत लोन ।

मांस पराई खायके, गला कटावे कौन ॥ ३६ ॥

कबीर— कहता हूँ कह जात हूँ, कहा जो मान हमार ।

जिसका गला तु काटि है, सो फिर काटि तुम्हार ॥ ३७ ॥

कबीर— हिन्दूके दाय़ा नहीं, मेहर तुर्कको नाहिं ।

कह कबीर दोनों गये, लख चौरासी मांहि ॥ ३८ ॥

कबीर— मुसलमान मारे करदते, हिन्दू मारे तलवार ।

कहें कबीर दोनों मिले, जैहें यमके द्वार ॥ ३९ ॥

तात्पर्य—कबीर साहब चारों युगसे पुकारते आये हैं कि, हिंसा मत करो, मांस न खाओ, अभक्ष्य पदार्थोंको न खाओ, शराब न पियो, मादक पदार्थोंका सेवन न करो, यह सब महान् पाप हैं, इनका बदला न छूटेगा । महान् कष्टमय अधम अवस्थाकी प्राप्ति ही इनका फल है । इनसे अलग रहनेसेही तुमसे योग्य कर्म हो सकेंगे ।

इस विषयमें कबीर साहबकी बहुत वाणी है, मनुष्य पशु इत्यादि किसी प्रकारके प्राणधारीको दुःख देना, मारना पापके महान् परिणामको प्राप्त कराने-

जेकड़ा जे डेडुबर्ड, अनल पंख किंगा फिसर

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वाला है। भक्ति मुक्ति चाहते हो तो जीवहत्या और घृणित पदार्थोंका त्याग कर दो, जो मान लेगा वह सुखी होगा जो न मानेगा दुःख पायेगा।

नज्रम—रहीमो खुदाबन्द रहमा वही। जुल्म जन्न न जिसके नफरमाँदही
सिफतसारी है उसकीही शानमें। जिसे देखिये इल्म उरफानमें ॥

मद्य मांसके निषेधमें कबीर साहिबकी आज्ञा लिखी है कि, वे इनके खानेवालोंको नर्कका पथिक बताते हैं।

वेद।

अब वेद शास्त्रको सुनो। वे भी स्वसंवेदके समानही मांस मदिरा आदि अभक्ष्यका ग्रहण तथा किसीके दुःख देनेको महापाप बतलाते हैं।

अथर्व—“अस्तितु तस्माद् ओ जीयो यद् विहव्ये न ईजिरे।” जीवहत्याके कर्म गन्दे हैं उनका उत्तम फल नहीं। बोही भगवान्की उपासना सर्वश्रेष्ठ है जिसमें जीवहत्या नहीं होती। “मुग्धा देवा उत शुना यजन्त उत गो रङ्गैः पुरुधा यजन्त” वे एक तरहके पागल हैं जो कुत्ते जैसे निकृष्ट प्राणियोंतकके मांसको भी नहीं छोड़ते तथा गऊओंके अङ्गोंको काट काटकर खाने खिलानेसे परमात्माको प्रसन्न हुआ मानते हैं। वो मार्ग उनके कल्याणका नहीं है, किन्तु नरक देनेवाला है। कोई कोई यह कहते हैं कि, यज्ञ आदिमें की गई हिंसा हत्या नहीं है, बाकी सब हत्याएं हैं। यदि विचार करके देखा जाय तो इसमें भी कोई सार नहीं है। क्योंकि, अथर्व वेदमें लिखा हुआ है कि, ‘इष्टापूर्तस्य व्यभजन्त यमस्य अभी षोडशं सभापदः’ यदि यज्ञ आदिमें भी हत्या करोगे तो तुमें पुण्य यज्ञका मिलनेवाला था उसमें सोलहवें हिस्सेका पाप भी भोगना पड़ेगा। स्वर्गके अमृत कुण्डोंमें स्नान करनेवालोंको अपनी जीव हत्याके पापोंके कारण भयंकर आगकी तपिस भी सहनी पड़ेगी इससे यह बात सिद्ध होजाती है कि, वेद हत्यामें कभी भी पुण्य नहीं मानता, यज्ञके नामकी हत्यामें भी पाप होता है पुण्य नहीं होता।

ऋग्वेद—स्तोमास स्त्वा विचारिणि, प्रतिष्ठोभन्त्यक्तुभिः।

प्रयावाजं न हेषन्तं पेरुमस्यस्यर्जुनि ॥

अर्थ—जो कोई मांस खाता है वह नरकी होता है सर्वदा दुःखमें पड़ा रहता है उसका देखना भी महा पाप है इस तरहके पापियोंके दर्शन करना ही महापाप है बहुत अच्छा हो कि, ऐसे पापी नारकी स्थानोंमें ही पड़ा रहें।

वेदमें एक स्थलमें लिखा है कि—घास चौपायोंके लिये बनाया गया है, और अनाज मनुष्योंके लिये है जैसे स्त्री पुरुषके लिये वैसेही पशु पशुके लिये हैं। मानुषी स्त्री पशुके लिये नहीं है, उसी प्रकार मांस मनुष्यके लिये नहीं है।

मृत्युकी सूचना देनेवाली, विशेष वक्तव्य

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पुरुष सूक्त—यजुर्वेद पुरुष सूक्त उपनिषद पद्धो, लिखा है सर्व जीवधारी उस विराट् पुरुषके हाड़ चाम और मांस हैं, इस कारण मांस खानेवाले विराट् पुरुषके शत्रु हैं। क्योंकि, वे जीवधारियोंके ही मांसोंको खाते हैं। जो विराट् पुरुषके केशोंको खाते हैं वे उसके शत्रु नहीं हैं, क्योंकि बालोंको तोड़ने काटनेसे किसीको दुःख नहीं होता, किन्तु किसी अशमं सुखही होता है।

सूत्र—मद्यं न पिबेत् मांसं न भक्षयेत् असत्यं न वदेत् परदारान् न स्पृशेत् ॥

अर्थ—मदिरा मत पीओ मांस मत खाओ। झूठ मत बोलो। व्यभिचार न करो।

यज्जीर्वाहिंसायामनुवर्तते तस्य जीवस्य नरकं क्रीडते ॥

अर्थ—जो कोई जीर्वाहिंसाका विचार करता है, वह जरूर नर्कमें जाता है और नाना प्रकारके कष्टोंको प्राप्त होता है।

अहिंसाके विषयमें सर्व वैष्णव लोग और कबीर साहब सहमत हैं। जैन और बौद्धधर्म लोग तो अहिंसाको अपना परमधर्मही समझते हैं पातञ्जलिकी भी यही आज्ञा है। मीमांसा और न्याय भी यही कहता है।

ऊपर जो प्रमाण दिये थे वेद सूत्रादिकोंके थे उनमें परिष्कृत रूपसे जीव हिंसाका निषेध किया गया है, एवं इन कामोंके करनेवालोंको नरककी प्राप्ति बताई है तथा मनुष्यको क्या खाना चाहिये यह भी बता दिया है। अब स्मृतियों तथा ऋषीश्वरोंके वचन दिखाते हैं कि, स्मृतिकारोंने भी इसका निषेध किया है।

ऋषीश्वरोंके वचन ।

ब्रह्मा—ये भक्षयन्ति मांसानि सत्त्वानां जीवितैषिणाम् ।

तैदंयो भक्षितैः सर्वैरिति ब्रह्मात्रवीदृञ्ज ॥

अर्थ—जो जीव जीवनेकी इच्छावाले हैं उनके मांसको जो भक्षण करते हैं वे जीव भी परलोकमें अपने मांसके खानेवालोंके मांसको खाते हैं अर्थात् जो किसीका मांस खावेगा वह दूसरे जन्ममें अवश्य बदला देगा।

अहिंसा परमो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः ।

परम धर्महां अहिंसा है जहां यह अहिंसारूप है वहां अवश्यही जय होती है।

नारद—स्वमांसं परमांसेन यो वद्वयितुभिच्छति ।

नारदः प्राह धर्मात्मा नारकैः सह पच्यते ॥

अर्थ—जो कोई दूसरेके मांसको खाकर अपना मांस बढ़ाया चाहता है वह नरकमें अवश्य पड़ेगा।

मक्खियाँ, मक्खियों पर विश्व डाक्टर वाटयार्वी तथा फ्रानसिस हिउबर

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व्यास—योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।

कृष्णद्वैपायनः प्राह स्थावरत्वं स गच्छति ॥

अर्थ—जो अहिंसक पशु हिरन, शशा आदि इनको कोई अपने खानेके हेतु मारता है वह स्थावर योनिमें जावेगा ।

बृहस्पति—सन्तप्यते ततोऽजसं भजते च ददाति सः ।

मधुमांसनिवृत्तो यः प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥

अर्थ—जो आदमी मांस नहीं खाता, वह सर्वदा तप करता है यज्ञ और दान भी करता रहता है ।

वसिष्ठ—यावज्जीवति यो मांसं विषवत्परिवर्ज्यं येत् ।

वसिष्ठो भगवानाह स्वर्गलोकं स गच्छति ॥

अर्थ—आदमी जबतक जीवे तबतक मांस न खावे, विष जान कर त्याग दे. उसको स्वर्गकी प्राप्ति अवश्य होगी ।

जमदग्नि—यो भक्षयित्वा मांसानि स्वतश्चापि निवर्तते ।

जमदग्निर्महाहैनं सोऽपि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥

अथ—जो कोई मांस खाता हुआ स्वयं विचार कर अथवा किसीके कहनेसे मांस भक्षण छोड़ दे मृत्यु पर्यन्त न खावे, वह अवश्य स्वर्गको जावेगा ।

शुक्र—रूपमारोग्यमैश्वर्यं कान्तिं स्वर्यानमेव च ॥

प्राप्नोत्यहिंसः पुरुषः प्राहैवमुशना मुनिः ॥

अर्थ—जो हिंसा नहीं करता वह संसारमें सुन्दरता, लक्ष्मी, आरोग्यता, विद्या आदि शुभ गुणोंसे सम्पन्न होता है, मृत्युके बाद स्वर्गको जाता है ।

पराशर—सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं तथैव च ।

नोत्तमं प्राणदानाच्छ पराशरवचो यथा ॥

अर्थ—सोनादान, पृथिवीदान, गोदान ये सब श्रेष्ठ दान हैं, पर “जीवको न मारकर उसे प्राणदान देना” सबोंमें उत्कृष्ट है । यह पराशरजीका वचन है ।

इसी बातपर मार्कण्डेयजीकी भी साक्षी है —

स्वयंभू मनु—कर्मणा मनसा वाचा यो हंति न हि कश्चन ।

स मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥

अर्थ—जो कर्मसे, मनसे और वाणीसे किसी प्रकार हिंसा नहीं करता, वह सब प्राणियोंका मित्र कहलाता है ।

हत्याके दोषी—हन्ता' चैवनुमन्ता' च विश्वस्ता' 'कयविक्रयी' ।

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संस्कर्ता' चोपहन्ता च खादकश्चाष्ट' घातकाः ॥
धनेन क्रियको हन्ति द्युभोगेन च खादकः ।
घातको वधबन्धाभ्यामित्येवं भवि धेनुषः ॥

अर्थ—'मारनेवाला, 'मारनेका विचार करनेवाला, मारनेकी 'सम्मती देनेवाला, मांसका' बेचनेवाला, मांसका' मौल लेनेवाला, मांसको' पकानेवाला पकेहुये मांसका' परोसनेवाला, और मांसका' खानेवाला ये आठ घातक हैं ।

विशेष, करके हिंसा तीन प्रकारसे होती है । १—जो मांस मौल लेता है । वह तो दाम देकर जीवोंको मराता है क्योंकि, यदि मौल लेनेवाला न होता तो जीव न मारे जाय इससे मौल लेनेवाला पूरा पापी है । २—खानेवाला, खानेके स्वादके लिये मारता है, यदि वह न चाहे न मांसको खावे तो, जीव हत्या कौन करे ? । ३—हत्यारे वह हैं जो स्वयं जीवधारीको बाँधकर अथवा हथियारसे मारते हैं, सब भी एकही बात है, चोर और चोरके साथी न्यायमें तुल्यही है ।

जैसे स्वयंभू मनु कइयोंको हत्याका दोषी बताया है उसी तरह कबीर साहिबने भी अपनी साखीमें कई दोषी बनाये हैं कि—

आठ बाट बकरी गई मांस मुल्ला गयो खाय ।

अजहूँ खाल खटीकघर, विहिश्त कहो क्या जाय ॥

बकरी उपरोक्त आठ राहमें गई, उसका मांस मुल्ला खा गया अब तक उसकी खाल खटीकके घर है । वह खटीक निरञ्जन है उसीके हाथ उसकी खाल है, उसके कर्म तो उसके घरही है जिस मारनेवालेको बकरीकी योनिमें आवागमन अवश्य होगा तो बकरीके मारनेवाली विहिश्त क्योंकर जायगी, अपने कर्म के बीजसे फिर फिर देह धरेगा, जबतक उसकी खाल खटीकके घर रहेगी तबतक उनका विहिश्त प्राप्त न होगा । मारनेवालोंको वह खाल ओढ़नी पड़ेगी ।

मांस त्यागका फल ।

शाकमूलफलैर्मध्येः योवाऽदन्नेव भोजनम् ।

न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्ज्जनात् ॥

अर्थ—उपवास तथा शाक, कन्द, मूल, फल आदि भक्षोंके खानेसे इतना फल नहीं मिलता, जितना कि, मांसको छोड़ देनेसे होता है ।

मधु मांसं च ये नित्यं वर्ज्जयन्तीह मानवाः ।

जन्म प्रभृति मद्यं च सर्वं ते मुनयः स्मृताः ॥

अर्थ—जो लोग मांस और मदिरासे आयु भर बचे रहते हैं; वे साधुओंके तुल्य हैं। अवश्यही सद्गतिको पावेंगे ।

मधु मक्खियोंकी तीन जातियाँ हिउबर

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शतं समा यः पुरुषः तपस्तेषु सुदारुणम् ।

न भक्षयन्ति ये मांसं सममेतदुदाहृतम् ।

अर्थ—जो सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक तपस्या करे, दूसरा मांसका निरंतर त्यागी ही दोनोंका एक समान फल है ।

यथा हृस्तिपदे यानि पदानि पदगामिनः ।

सर्वे धर्मास्त्वहिंसायां प्रविशन्ति तथा ध्रुवम् ॥ १ ॥

सर्ववेदाधिगमनं सर्वतीर्थविगाहनम् ।

सर्वयज्ञफलं चैव नैव तुल्यमहिंसया ॥ २ ॥

अहिंसा परमो यज्ञो अहिंसा परमं तपः ।

अहिंसा परमाक्षय्यमहिंसो यजते सदा ॥ ३ ॥

अहिंसा सर्वलोकस्य यथा माता पिता तथा ।

स्वमांसात्परमांसानि परिपाल्य दिवं गतः ॥ ४ ॥

तमेव परमं धर्ममहिंसां संप्रचक्षते ।

एवं परो महात्मा यो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ५ ॥

अर्थ—जैसे सब जीवधारियोंके पग हाथीके पगमें आजाते हैं उसी प्रकार अहिंसामें सर्वे धर्म समा जाते हैं ॥ १ ॥ अहिंसा अर्थात् किसी भी जीवधारियोंको दुःख न देना ही वेद पाठ है, तीर्थटन है, सर्वे यज्ञ, है, जीवधारियोंकी रक्षाके तुल्य कोई धर्म नहीं है ॥ २ ॥ अहिंसा परम यज्ञ है, जो हिंसा नहीं करता है वह यज्ञ और तप करता है ॥ ३ ॥ जो कोई जीव हिंसा नहीं करता, वह सबका ऐसा प्यारा होता है जैसे कि, माता पिता । जो अपने प्राणका लालच छोड़कर, अपना मांस देकर बच्चेकी जान बचाते हैं ऐसे परोपकारी लोग स्वर्ग जाते हैं ॥ ४ ॥ जिसमें जीव हिंसा न हो वही धर्म बड़ा है जो लोग इस धर्मको धारण करते हैं वे महात्मा लोग विष्णु लोकको चले जायेंगे ।

जग जाओ ।

आकाश और विष्णु सत्तोगुण रूप हैं, पृथिवी, और ब्रह्मा रजोगुण रूप हैं, पाताल और शिव तमोगुण रूप हैं । फारसीमें इनको तमीज शहवत और गजब कहते हैं । जो कोई सत्तोगुणका आश्रय करता है वह देवता है, जिसमें सत्तोगुण और रजोगुण हो वह मनुष्य है, जिसमें रजोगुण और तमोगुण हो वह राक्षस तथा नारकी जीव है, सत्तोगुण ऊपरको रजोगुण पृथिवीमें और तमोगुण नरकमें डालेगा । मांस खाना तमोगुणी है, अवश्य नरक ले जावेगा जीवकी जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति ये तीन अवस्था हैं, जाग्रत अवस्था मनुष्यकी, स्वप्न पशुकी

जलचर

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और जड़ स्थावरकी सुषुप्ति है । सतोगुणी मनुष्य विवेकके लिये बनाया गया है, मनुष्योंका मुख्य लक्षण सारासार विवेक ही है । यदि विवेक न करे तो मनुष्य नहीं कहाया जा सकता, मांस खाना पूर्ण अविवेकका लक्षण है, मांस खानेवाला मनुष्य कैसे कहला सकता है ? जो पाप जानकर करता है वह विष खाता है वह अधिक दण्डका भागी होता है । स्वप्नमें सहस्रों प्रकारके पाप होते हैं पर उसका कुछ हिसाब नहीं होता, सुषुप्तिमें तो भले बुरेका ज्ञानही नहीं होता. वहां हिसाब किताब की बात ही क्या है. जो तुरियामें हैं वे ज्ञानी हैं वे तो विधि निषेधसे मुक्त शुभ कर्मके स्वरूपही हैं, पर मनुष्य जबतक जाग्रत अवस्थाको पूर्ण रीतिसे धारण न करे, तबतक तुरिया अवस्थाको नहीं प्राप्त कर सकता । इसी कारण जाग्रत अवस्था दीपक है । मनुष्य शरीर पाता है, सूर्य्यके समान प्रकाशमान होता है । आँखवालोंको प्रकाशमें भी अन्धोंके समान व्यवहार करना उचित नहीं, प्रकाशमें भलीप्राकर सब पदार्थ देखे जाते हैं, देख करके चलना सार्थक है, जाग्रत अवस्थाहीमें भजन हो सकता है । इसपर कबीर साहबका वचन है कि,

शब्द—जाग अब भी भोर बन्द, जाग अब भव भोर ॥ टेक ॥

है अल्लाल तो यार हमारा, सर्व जनका नाम अधारा ।
काया मसजिद खूब सँवारा, दुई खम्भ दश लगे किवारा ॥
उसमें पढ़ले बाज़ू निमाजा, हर दम हर दम हर दम साजा ।
पांचों पीर बसें एक थाना, घटमें अनहद हने निशाना ॥
पांच पीरकी करले खोजा, तब तालीम तोर तीसो रोजा ।
लैलाऊँ पल नाहिं विसाहूँ, घड़ि घड़ि चितवन दृष्टि पसाहूँ ॥
ज्ञान छुरी महरम गढ़ पकड़े, तब वस करले पांचो बकरे ।
कहे कबीर मैं हरिगुण गाऊँ, हिन्दू तुर्क दोऊ समुझाऊँ ॥

यथा—जाग अब भव भोर बन्द, जाग अब भव भोर ॥ टेक ॥

बहुत सोवे जन्म खोवे, कोई न होगा तोर ॥ जा० ॥

काम क्रोध लोभ तृष्णा, बांधली भर झोर ।

बहुत सोये जाग देखो, दशो द्वार शोर ॥ जा० ॥

पकड़के यम कैद करिहैं, जाव कौन ओर ।

जठराग्निके जोरमें, जिन रक्षा कीन्ही तोर ॥ जा० ॥

एक घड़ी हरनाम न लीन्हों, बड़ा हुरामी खोर ।

कहे कबीर अब क्यों न जागो, जब घर २ मूसे चोर ॥ जा० ॥

तात्पर्य—सत्यगुरु कहते हैं कि, ऐ मनुष्यों ! तुम बहुत सोये, अब जागो.

घडियाल बिल्वी और लोमड़ी घरेला घडियाल, मानुषी भोगी आगस्तसका मछलियोंसे शकुन

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क्योंकि, यह मनुष्यका चोला चौरासी लाख योनिरूप रात्रिके प्रभातके समान है। अब क्यों सोते हो? चौरासी लाख शरीरमें तो सोतेही थे, अब तो बहुत सो चुके हानी दुःख बहुत उठा चुके, अब दुःख और हानियोंके निवारणका समय आया है। पर इस मनुष्यत्वरूपी धनको चुरानेवाले ठग और चोर भी तो बहुत पीछे लगे हुये हैं। जाग्रत होकर अपने धनकी रक्षा न करोगे तो दिन धाडे चोर डाकू डाँका मारकर ले जायेंगे। जीव दरिद्र होता है, पर इस शरीरमें तुम्हारे साथ अनन्त अमूल्य धन है, जिसके चुरानेके लिये चोरोंने पीछा किया है। यदि उनसे सचेत न रहोगे तो फिर कहीं ठिकाना न लगेगा, चौरासी लाख योनिरूप द्वारोंमें मँगलोंके समान भटकते फिरोगे, पर कुछ न पा सकोगे।"

हिंसा पुण्य नहीं — वेद जीवदयाको बहुत प्रकारसे वर्णन करता है, सहस्रों श्रुतियाँ अहिंसाकी स्तुतिमें पाई जाती हैं। अहिंसाके तुल्य दूसरा कोई धर्म नहीं माना है। यद्यपि नरमेध, अश्वमेध, गोमेध, अजामेध इत्यादि यज्ञोंकी विधियाँ भी लिखी हुई मिलती हैं, उत्पत्ति कालसे इनका प्रचार चला आता है, यद्यपि इस समय बहुत कम हो गया है क्योंकि, उन यज्ञोंके माननेवालोंमें द्रव्यका पूर्ण अभाव हो रहा है इस कारण कोई भी वेदानुसार यज्ञ नहीं कर सकता पर वेदोंने हिंसाको निष्पाप कभी नहीं बताया जो हिंसामें पाप नहीं मानते यह उनकी भूल है। अब यज्ञादिक विधानके विरुद्ध नाना प्रकारकी हिंसा और बलिदानकी परिपाटी चल पड़ी है। सर्वहिंसा महाघोर नरकको ले जानेवाली है।

इस बातपर लोगोंका कुछ भी ध्यान नहीं कि, वेद अहिंसा बतलाता है तो फिर हिंसा बतलानेकी क्या आवश्यकता है? हिंसा और अहिंसा दोनों एक साथ नहीं हो सकती। जीवहत्या करता है तो दया कहाँ? जहां दया है वहां जीवोंको दुःख देना कहाँ? यह कौसी धोखेबाजी है यह छल किसने किया, किस कारण ऐसा कपट किया गया। इसका कारण स्वसंवेद पढ़े बिना कोई नहीं जान सकता। सर्व श्राह्यण, साधू, ऋषि-मुनि, जो उस हिंसाके पक्षमें हैं, वे सब छल और धोकेसे भरे पड़े हैं, आप नष्ट होते हैं दूसरोंको भी नष्ट कर रहे हैं। जबतक पारख गुरु न मिलें तबतक इस कपट जालसे छूट नहीं सकता।

जिस ठगने सर्व आचार्य ऋषि मुनि आदिको उत्पत्तिके दिन ठगा वह अब भी मौजूद है। जो कोई इसको पहचानेगा अलग हो जावेगा धोखेसे बचता रहेगा वही मनुष्य है उसीकी मुक्ति हो सकती है उसके बिना सबको बंधनमेंही रहना पड़ेगा।

परवाली शैलानी, ऐङ्गलर फिश

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पश्चिमकी पुस्तकें ।

मूसाकी पुस्तक — खून मत करो । तौरीतकी आज्ञा है कि, खून मत करो ।
समीक्षा — अब विचार करना चाहिये, जिसमें खून हो उसका खून न करना यदि ऐसी आज्ञा मिली तो इससे साबित हुआ कि खूनवालेके अतिरिक्त जिसमें कि, खून नहीं है उन्हें प्रयोगमें ला सकते हो जैसे साग, पात, फल फूल इत्यादि इससे उसके खानेकी आज्ञा साबित होती है रक्तवाले जितने जीवधारी हैं सब परस्परमें भाई हैं जो रक्तवाले नहीं हैं उनके बारेमें कोई ऐसा नहीं कहता कि, इनका खून मत करो क्योंकि, उनकी उत्पत्ति वीर्यसे नहीं, न उनमें लोहही है, उनकी उत्पत्ति मिट्टी और पानीसे है । इसीलिये वे सब मनुष्यके भक्ष्य हैं पर जो रक्तवाले हैं वे चाहे कहींसे हुए हों मनुष्यको न तो मारने चाहिये न खानेही चाहिये ।

मूसाके धर्मका नियम तो यही हुआ था कि, “खून मत करो” फिर कुर्बानीका प्रचारक उसे नहीं माना जा सकता ।

कुर्बानीके प्रचारक ।

सोखतनी कुर्बानी, खताकी कुर्बानी और इन्सानकी कुर्बानी करनेको किसने कहा । नूहने सोखतनी कुर्बानीकी पीछे दूसरोंने इब्राहीमको इन्सानकी कुर्बानी मनुष्यको बधकी आज्ञा हुई पर दया करके क्षमा कर दिया । इनका खुदा सर्वदास कुर्बानियोंका आदी है । पहिले कहता है कि खून मत करो, पीछे धोखा देकर कुर्बानी कराता है । इसके कपट जालसे हंस कबीरके सिवा दूसरा कोई नहीं बच सकता । प्रलयके पीछे नूह पृथिवीपर उतरा उसने पशुओंको जलाकर सोखतनी कुर्बानी की उसके सृष्टनेके वास्ते खुदा आसमानसे उतरा जलते हुये पशुओंकी सुगन्धी (दुर्गन्धि) को सृष्टकर खुश हुआ नूहको बरकत दी ।

समीक्षा — विचारवान् न्यायी लोग विचार करें कि, जब हाड, चाम, मांस, लोह जलता है तो सुगन्धी आती है अथवा दुर्गन्धी आती है । उसमें तो इतनी दुर्गन्धी आती है कि, उसको मनुष्य किसी प्रकार सहन नहीं कर सकता । ऐसी घृणित दुर्गन्धीको सुगन्धी जानकर सृष्टता एवं उससे प्रसन्न होता है, उस खुदासे ईश्वर रक्षा करे यह तो राक्षसोंके भी बाबा निकले । जिस धोखेमें इक्के दुक्के भारतवासी पड़े हैं उसी धोखेमें पश्चिम देशवाले भी पड़े हुए हैं । इसपर किसीने विचार किया है कि, हमारे धर्मकी जड़ अहिंसा है । हिंसा कभी भी धर्म नहीं हो सकता ।

खुदाने आदमको अपने रूपमें बनाया । तौरीतमें पेंदाइशकी किताबका

धोखेसे बचानेवाली

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पहिला बाब (२७-२८) आयत तक देखो फिर कुरान मजीदकी गवाही देख लो कि, जानना चाहिये कि, खुदा जागृत है इसलिये मनुष्यके लिये भी जागृत (विवेकी) होना चाहिये। जो जागृत नहीं वह मनुष्य ही नहीं, जागृतके लिये बनाया गया यदि स्वप्नका काम करे तो वह कैसे मनुष्य कहा जा सकता है। अविवेकतासे उसको वह प्रकाश कदापि नहीं मिल सकता, जिसके द्वारा उत्कण्ठ पद प्राप्त हो सकता है।

दूसरी पुस्तक जबूर।

दाऊदका जबूर सरदार मुगनीके लिये ४ बाबकी ६ आयतमें देखो। जबीहा और हदीयाको तू नहीं चाहता, तूने मेरी खोलें चढ़ा दी तू खतीबका तालिब नहीं।

आसिफका जबूर ५० बाब, १३-से १५ आयत तक देखो - खुदा कहता है कि, क्या मैं बैलोंका मांस खाता हूँ? या बकरीका लोहू पीता हूँ? तू धन्यवादका बलिदान कर उसीको परमात्माके आगे भेंट चढ़ा।

आशिफकी जम्बूरका ५० वां बाब २३ आयतमें लिखा है कि, जो कोई धन्यवादका बलिदान चढ़ता है, मेरा प्रकाश प्रकट करता है उसको जो अपनी बोल चाल दुरस्त रखता है उसे खुदाकी निजात दिखलाऊंगा।

दाऊदका जबूर सरदार मुगनीके लिये ५१ बाब-१५ से १६ आयत तक लिखा है कि, ऐ खुदाबन्द! तू मेरी लबोंको खोल दे तो मेरा मुंह धन्यवाद करेगा। कहेगा कि, तू जीवहत्याके बलिदानसे खुश नहीं। नहीं तो मैं तेरी खुशनुदी देता नहीं! खुदाका बलिदान टूटा हुआ मन है। टूटा हुआ मन; ऐ खुदा! तू तुच्छ न जानेगा।

दाऊद गीत १०४ - तेरे कामका फल जो है उससे पृथ्वी आसूदः यानी (भरी हुई है)। चारपायोंके लिये घास और मनुष्योंके लिये शीक है।

दाऊद गीत मजमूर (५१) ऐ खुदा! तू खूनसे मुझे बचा ले मेरी सलामतीके लिये मेरी जबान तेरे रहमकी धन्यवाद करेगी। कुर्बानीसे तू राजी नहीं, न तो वह चढ़ाऊँ। कुर्बानीसे मालिक जरा भी खुश नहीं है।

दाऊद गीत मजमूर-४० देख। जबह और कुर्बानीसे तू रजामन्द नहीं था, एक जिस्म (शरीर) पाकको तूहीने मेरे वास्ते रखवा था, जब बशरसे कुर्बानी नहीं चाही बिलकुल।

जो कुछ मैंने पिछले प्रमाणमें लिखा, वही बात मूसाकी शरीअत और तौरतकी हुई, पैमाइशके १ बाब २९ से ४० आयत तक खुदाने कहा कि, प्रत्येक

पशु पक्षीके रूपमें ऋषिगण पशु पक्षी आदिका भजन

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बीज और नवातात जो तमाम जमीनपर है हर एक दरख्तको जिसमें बीजदार फल है देता हूँ । यह तुम्हारे खानेके लिये होगा (६००) जमीनके सब चरनेवाले और आकाशके उड़नेवाले पक्षियोंको जो कि, पृथिवीपर रहते हैं जिनमें जिन्दगी का दम है, सबजी उनके खानेके लिये सब तरहकी देता हूँ और ऐसाही होगा ।

एसियाह नबीकी किताबका ६६ बाब १०५ आयत तक-खुदावन्द फरमाता है कि, आसमान मेरा तख्त है जमीन मेरे पांवकी चौकी है, वह घर कहाँ है जो मेरे वास्ते बनाते हो मेरा आरामगाह कहाँ हैं, ये सब चीजें तो मेरे हाथने बनाई यह सब मौजूद हैं ।

खुदावन्द कहता है लेकिन मैं उस मनुष्यपर निगाह कलूंगा जो गरीब और टूटा दिल है, जो मेरे वचनसे काँप जाता है । वह जो एक बैल जबह करता है, उसके समान है जिसने एक आदमीको मार डाला वह जो बकरा कुरबानी करता है, उसके समान है, जिसने एक कुत्तेका शिर काटा । जो बलिदान चढ़ाता है वह उसके समान है जिसने शूकरका लोह चढ़ाया हो । लोबानका जलानेवाला उसके समान है जिसने एक पत्थरकी मूर्तिको मुबारक कहा है । हां ! उन्होंने अपनी राहें पसन्द कीं ।

अमूस नबीका ६ बाब ३ आयतमें लिखा है । अफसोस है उन लोगोंपर अपनेसे जो बुरा दिन दूर किया चाहते हैं, अपने पास जुल्मकी चौकीको खींचते हैं । वे जो हाथीदांतके पलंगपर लेटते हैं, अपनी अपनी चारपाइयोंपर फँल २ के सोते हैं गल्लेके थानमेंसे बछरों और बकरोंको निकाल निकाल कर खाते हैं रब्बाब आवाजके साथ गाते हैं, दाऊदकी तरह अपने अपने बजानेके लिये नये नये बाजे ईजाद करते हैं, प्यालोंमेंसे शराब पीते हैं, अपने बदनपर खालिस अतर मलते हैं, लेकिन युसफके शिकस्ता हालीके लिये शोक नहीं करते ।

इंजीलका कथन-मतीकी इञ्जीलका २२ बाब ७ आयतमें लिखा है कि मैं कुरबानी नहीं चाहता, बल्कि रहम चाहता हूँ ।

पोलूसके पहले खत, रोमियोंके १४ बाब २१ आयतमें लिखा है, कि, खानेके सबबसे खुदाके कामको मत बिगाड़ । सब कुछ तो पाक है, पर उस आदमीके लिये जो ठोकरके साथ खाता है बुरा है । गोस्त न खाना और न शराब पीना, ऐसा कुछ न करना जिससे तेरा भाई धक्का खाय, यही तेरे लिये बेहतर है

कुरान और हदीस - कुरान सिपारे पहला सूर फातेहा - (बिसमिल्लाहीं-रंहामानिरंहीम) ।

यही सारे ईमान मोहमदीकी जड़ है । इसका अर्थ है कि-मैं शुरू करता हूँ अल्लाहके नामसे वह अल्लाह कैसा है कि, दयालू है (रहीम) और रहमान है ।

चीटियोंका भजन, मूसा और पक्षी बकरी, तोता, भेड़, बैल, चील्ह कलगीदार छोटी चिड़िया

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समीक्षा — कृपालू जो खुदा रहीम है रहमान है, उस खुदाका हुकम जबह एवं कत्ल करनेका हरगिज नहीं हो सकता, नहीं तो रहीम और रहमान नह हो सकता. यह किसीको खबर नहीं कि, रहीम और रहमानके कौनसे गुण होते हैं वह खुदा कौन है। कत्ल (रक्तपात) करानेवाला खुदा कौन है। किसी जीवधारीके गलेपर छूरी चलाना ईमान और बुद्धिके विरुद्ध है। यह मानुषिक बुद्धिसे तो एक-दमही उलटा है। छूरी चलानेके समय, विसमिल्लाह जब्बारुल जब्बारही कहारुल कहार, कहना उचित है। क्योंकि, विसमिल्लाह हिरहेमानिरहीमकी यह जगह नहीं है। जिस समय हाथमें छूरी ली उसी समय रहीमुरहीमोंकी सिफत जाती रही। जिसके ऊपर विसमिल्लाह रहीमुरहीमोंके साथ कल्मा न पढ़ा जायगा तो वह बिलकुल हराम हो जायगा। जो कोई रहीमका नाम लेकर छूरी चलावेगा उसपर अलबत्त ईश्वरका कोप होगा, वह ईश्वरकी कृपाका पात्र कभी न होगा। जो कोई इस विसमिल्लाहके अर्थके ऊपर विचार न करेगा, चाहे कुरान हबीस फिकका आदि सब कुछ पढ़े पर सब निरर्थक है, अगर रहीमके नामसे जबह हुई तो भी हराम हुई। रहीमको छोड़कर दूसरा कुछ कहा तो भी हराम हुई, बस इससे साबित हुआ कि, जिसने मांस खाया हराम खाया वो मुसलमान नहीं है।

कत्ल पर गैरके यह विसमिल्लाह। होवे हरगिज न तुझपर रहम अल्लाह।
बाशरअ और तिहारतो तकवा। सब अबस होवे अन्दरू स्याह ॥

११४ सूरते कुरानमें हैं सब सूरतोंके माथेपर यही है दूसरा कुछ नहीं। जिस सूरतमें जबह और कत्लका हुकम उत्तरा वह हुकम रहीम और रहमान अल्लाह के तरफसे कभी नहीं माना जा सकता. क्योंकि, रहीम यानी दयालू हत्यापर कभी भी प्रसन्न नहीं हो सकता, इससे यह सिद्ध हुआ कि, रहीम और रहमान अल्लाह दूसरा है जब्बार (अत्याचारी) खुदा दूसरा है, जिसके तरफसे अत्याचार है प्रत्येक सूरतके माथेके ऊपर यही है। ऊपर रहीम रहमान रखकर नीचे अत्याचार की आज्ञा देना धोखा नहीं तो और क्या हो सकता है।

कुरान सूरे हज-३७ सिपारा ४ स्कूअ ३७ आयतमें लिखा है अल्लाहको नहीं पहुँचेगा, उसका गोस्त या लौह, लेकिन उसको पहुँचता है तुम्हारे दिलको अधीनता, इसी तरह उनको दिया मैं तुम्हें कि अल्लाहकी बड़ाई पढ़ो, इस पर कि, तुमको राह समझावे और खुशी सुनानेवालेको।

कुरान सूरेबकर २१ सिपारा स्कूअ ६९ आयत लोगो खाओ जमीनकी चीजों में से जो हलाल और सुथरी है न चलो कदमों शैतानके कि, वह तुम्हारा पक्का शत्रु है।

भजनानन्दी बछड़ा, समय

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जमीनकी चीजोंमेंसे यहाँ आशय है साग, पात, अनाज, फल, फूल आदि। क्योंकि, पृथिवीमेंसे यही उगते हैं, जीवधारी नहीं उगते, पृथिवीको ही सुथरी और हलाल चीजें हैं दूसरी कोई नहीं है, यही मनुष्यका यथार्थ भी क्षण है ।

गुलजार आदममें लिखा है कि, हजरत आदमने खुदाके हुक्मको न माना, अपने आपको नंगा देख लज्जावान् हुये । वृक्षोंसे पत्ता मांगने लगे कि, मैं अपना परदा करूँ, स्वयं किसी वृक्षका पत्ता तोड़ा। जब स्वयं इंजीरके वृक्षके अपनी खुशीसे पत्ता दिया, तो उसके पत्तासे अपना परदा ढका । यह वही बात है कि, मुहम्मद साहबको वृक्ष दीवार और पत्थर आदि सब सलाम करते थे, उसको मुहम्मद साहबके सिवा दूसरा कोई भी मालूम न कर सका । जो कोई जैसा भला तथा किसी को दुख देनेकी इच्छा न रखता होगा, वही वृक्षोंकी बातचीत और आशयको समझ लेगा । दयालु ऐसे आदमकी सन्तान मुसलमान ऐसे अत्याचारी हो कि, जीवित जीवधारियोंको बलसे पकड़कर काटते हुए कहें कि, हजरत आदम मुसलमान थे तो क्या ? वे भी ऐसेही थे जैसे कि, अब हैं । वास्तविक बात तो यह है कि, ये लोग मुसलमानके अर्थ न समझते होंगे जिससे झूठा दावा करते होंगे ।

सिंहाका न्याय — हदीसोंसे प्रगट है कि, कयामतके दिन खुदा सबका न्याय करेगा, मनुष्यके अतिरिक्त दूसरे जीवधारियोंका भी हिसाब होगा, जो हिंसक पशु सींग और नखोंसे दूसरोंको कष्ट पहुँचाते हैं, उनको दण्ड मिलेगा, वे भी अपने २ पापके फलोंको भोगेंगे । सब अत्याचारी जीवधारी नरकमें डाले जावेंगे, शुभकर्मों पापरहित जीव स्वर्गको जावेंगे । जड़ जीवोंका भी हिसाब होगा, जैसे फलदार वृक्ष भले और काँटेवाले दुख पहुँचानेवाले वृक्ष क्रमशः स्वर्ग और नर्कको जावेंगे । जो हिंसक जीवधारी पशु कहलाते हैं तथा स्वप्नकी दशामें हैं। वे भी रक्तपातके कारण दोजखमें जावेंगे तो फिर जाग्रत और विवेकके लिये ही बनाया गया, मनुष्य जो कि, अपने कर्मोंका हिसाब देनेवाला है, वह पाप और अत्याचार से किस प्रकार छूट सकता है । उसे अपने कर्म अवश्य ही भोगने पड़ेंगे ।

गोहत्याका निषेध — महम्मद साहबने कहा है कि, चारकी सद्गति कभी न होगी । १—जाबिहुल बकर यानी गोहत्या करनेवाला, २—दायमुल खुमर यानी शराबका पीनेवाला, ३—बायेउल बशर यानी मनुष्य बेचनेवाला, ४—कातिउल शिजर यानी वृक्षका काटनेवाला गाय मारनेवाले क्रस्साई वगैरः नशा खानेवाले आदमी बेचनेवाले और वृक्षके काटनेवाले ये सब दोजकके जीव हैं ।

समीक्षा — मुसलमान कहते हैं कि, हमको कुरबानीका हुक्म है, यह उनको

सांप, शिवका, जपी, चिनगीबटेर बोलियोकै अर्थ स्यावर और जंगमोंकी एकता

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किस प्रकारसे साबित हुआ कि, खुदा कुरबानीसे राजी है। कुरबानीके लिये कोई आयत उत्तरी ? आकाशवाणी हुई ? अथवा कोई फिरिश्ता प्रगट हुआ ? या स्वप्न देखा ? कि, यह उसी खुदाकी तरफसे है। या और ही कोई है कुरान ५० सूरात रकूअमें लिखा है कि, हम बहुत नजदीक हैं तरफ उसके (इनसानके शहरगसे)।

जो खुदा व्यापक और शहरगसे नजदीक हो फिर उसखुदाका बचन भी शहरगसे निकट होना चाहिये, न कि, खुदा तो मेरे पास हो उसका कलाम फिरिश्तों के द्वारा आकाशसे आवे। इन सब बातोंसे साबित होता है कि, खुदाको न पहचान करकेही नबियोंने जबह और क़त्लकी आज्ञा दी है। ऐसी आज्ञाएं उसकी ओरसे नहीं हैं।

हजका यम - महम्मदी लोग हजको जाते हैं मक्काके निकट पहुंचते हैं, किसी वृक्षका पत्ता नहीं तोड़ते, घास नहीं उखाड़ते किसी जीवधारीको किसी प्रकारका भी दुःख नहीं देते, वरन् जूँ भी नहीं मारते। जो कोई इसके विरुद्ध कुछ करता है तो उसका हज पूरा हुआ नहीं समझते। इन बातोंसे जाना जाता है कि, मुसलमानोंका खुदा व्यापक और सर्व दृष्टा नहीं है, इसीलिये केवल मक्कामेंही उसके नियमोंका पालन होता है। यदि व्यापक है तो वही नियम सब जगह होने चाहिये, यदि खुदा केवल मक्कामें ही है तो सब जगह निमाज पढ़ना और रोजा रखना व्यर्थ है। इस कारण यह स्वीकार करना पड़ेगा कि, हजके नियमोंका सर्वत्र पालन होना चाहिये।

अनुचितका विधाता - इब्राहीम और मूसा आदिकका खुदा प्रगटही खाता पीता था, पर मुहम्मदका खुदा जो बेचून और बेचारा है, छिपाकर खाता था परदेसे बातचीत भी करता था। यह सर्वदासे सभी नबियोंको भिन्न २ कानून और बातें बतलाकर छल कपटसे लड़ाता आता है। किसीको शराब पीना सिखलाया, तो किसीको मांस खाना बतलाया, किसीको जना (व्यभिचार) करनेकी आज्ञा दी, किसीको उत्तम खानेको भी मना कर दिया। किसीको जीवहत्या करने की आज्ञा देता है। खरकईल नबीको विष्ठाकी पकी रोटी खिलाता है। यह बात खरकईल नबीकी किताबका बाब - १२ आयत-ईसाके शिष्य पितरसको डोंगर ढोर. कीड़े, मकोड़े आदि खानेकी आज्ञा दी। देखो रसूलोंका अमाल- ११ बाब ५१३ आयत-इसियाह नबीको जनाकार (व्यभिचारिणी) औरतसे मित्रता रखनेकी और व्यभिचारकी लड़कीसे विवाह करनेका आदेश दिया।

समीक्षा - इन नबियोंमेंसे किसीसे दरियापत किया जावे कि, आप कभी

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कुछ कभी कुछ कानून प्रचलित करते हो, इसका क्या कारण है ? यथार्थमें इन नब्रियोंमेंसे किसीने भी खुदाको न जाना क्या ? भला जो खुदाको पहचाने वो ढोंगर, ढोर, कीड़े, मकोड़े इत्यादि तथा गृहकी पकी रोटी खावे ? पृश्चली स्त्रीसे मित्रता रखे ? उनकी पुत्रीसे विवाह करे ? किसीको जबह करने और कत्ल करनेकी आज्ञा दे ? कदापि नहीं । ईश्वर शुद्ध है उसका जाननेवाला भी शुद्ध होता है उसके कर्म भी शुद्ध और उज्ज्वल होते हैं ।

समता - मनुष्य और पशुओंका मांस एक समान है, जिसने एकका खाया उसने सबका खा लिया, देखो तौरीतमें इस तसनाका १२-बाब २०-से-२३ आयत तक लिखा है कि, खानेमें पाक और नापाक जानवर बराबर हैं यही बात इज्जीलमें रसूलोंके आमालमें इसी बाबमें लिखी है कि, जो कोई खाता है उसके लिये सब जीवधारी मनुष्यके मांसके समान है ।

कबीर साहब - जस मांस नर की, तस मांस पशुकी, मांस मांस एक सारा हो ।

सात्विक भोजन - जो ऋषीश्वर लोग जङ्गलमें रहते हैं वे साग, पात, कन्द, मूल, फल आदिक खाकर जीते हैं। उन्हींका अन्तःकरण शुद्ध तथा हृदय प्रकाशमय और कान्ति तेज युक्त होती है । उन्हींको सब प्रकारकी सामर्थ्य मिलती है, तपस्या, भजन और संयम सब प्रकारकी शक्तिको प्रदान करता है । दानियल नबीकी किताब २ बाब-८२१ आयत तक देखो-दानियल नबी केवल फलियां खाकर दिन बिताता था, उसने कभी भी बादशाही भोजन स्वीकार नहीं किया, तिसपर भी उसका चेहरा बादशाही खाना खानेवालोंसे अधिक प्रकाशमान रहता था । नियुकद नजर बादशाहके सन्मुख परीक्षाके समय उसीको अधिक प्रतिष्ठा मिली । नबीसे बहुतसे आश्चर्यमय कौनक प्रगट हुये ।

धारणा - मांसाहारियोंके मनमें यह बात समाई हुई है कि, मांस खानेसे बल कान्ती बढ़ती है दानियल नबीकी उपरोक्त बातोंका विचार करें जाने कि, उनका कहना सब झूठ है ।

श्रेणियाँ और भोजन -- प्रथम श्रेणीमें पुण्य स्वरूप देवते हैं, उनको परमात्माने अमृत और कल्पवृक्ष प्रदान किया है । दूसरी श्रेणीमें मनुष्य हैं जिनको ईश्वरने अनाज फल शाक पात आदिक प्रदान किया है । तीसरी श्रेणी राक्षसोंकी है, जो कि, मांस शराबको ग्रहण करते हैं बुरे कर्मोंकोही अपना कर्तव्य समझते हैं इनमेंसे पहले श्रेणीवालोंको स्वर्ग मिलता है दूसरे मध्यमें रहते हैं एवं तीसरी श्रेणीवाले नरकमें पड़ते हैं ।

सप्राण स्यावरादि तारा और पालपी, विद्वानोंका मत

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स्वसंवेदमें—सृष्टिके स्थितिकी सात शाखायें लिखी हैं— १ अनाज, २ घास, ३ पानी, ४ मिट्टी, ५ पत्तियाँ, ६ फल, ७ फूल इन्हीं सातों प्रकारके भोजनोंसे सर्व जीवधारियोंका जीवन है, अनाजसे मनुष्य, घाससे पशु, पानीसे जलचर पलते हैं कितने ऐसे भी जीवधारी हैं जो मिट्टी खाकर ही रहते हैं, कितनेही कीड़े पत्तियोंसेही जीवन व्यतीत करते हैं. बन्दर आदि पशु फल खाकर रहते हैं कितने अपने जीवनकी रक्षा फूलहीसे करते हैं।

मांसकी पेसाबसे तुलना—दो प्रकारकी सृष्टि है। एक जलसे दूसरी वीर्यसे होती है जलकी वह सृष्टि है जो जलसे उत्पन्न होती है। वीर्यकी सृष्टि वीर्य और लोहसे उत्पन्न होती है। जलसे उत्पन्न होनेवाली सृष्टिको लोग अशुद्ध नहीं समझते। वीर्यसे उत्पन्न होनेवालीको अशुद्ध जानते हैं अनाज फल आदि सब जलकी सृष्टि है। पशु पक्षरू आदिकी उत्पत्ति वीर्यसे है। प्रायः मुसलमानोंको देखा जाता है कि, पिशाब करनेके समय एक मिट्टीका डला हाथमें ले जाते हैं, जिससे पिशाब करके उपस्थ इन्द्रियको पोंछते रहते हैं, जिसमें पिशाबकी बूँद कपड़ेमें लगकर उसे अशुद्ध न कर दे आश्चर्यकी बात है कि, जिस पिशाबकी एक बूँदसे भजनमें हानि होनेके भयसे डला लेकर घण्टों खड़े रहते हैं उसी पिशाबसे उत्पन्न हुआ महा निकृष्ट पदार्थ मांससे आध सेर पेटमें रखकर निमाजके लिये खड़े होते हैं ऐसी बुद्धि और समझको धिक्कार है।

४० दिनके बाद काफिर—हदीसमें आया है कि, जो कोई चालीस दिनतक बराबर मांस खाता रहे दिन भी दिन न छूटने दें तो वह अवश्यही काफिर हो जायगा। मैं कहता हूँ कि, जो कोई एक बार मांस खानेकी इच्छा करेगा अथवा खायगा तो वह काफिरोंमें भी काफिर हो जायगा। आदमने एकही बार खाया था जिसके कारण बिहिश्तसे निकाले गये थे।

जीवके देखते जीवहत्याका निषेध—मुसलमान कहते हैं कि, रसूलिल्लाहने फरमाया है कि, तुम किसी जानदारको दूसरे जीवधारीके सामने जबह मत करो “ऐसा करनेसे उसके दिलमें भय उत्पन्न होगा कि, आज यह उसको कत्तल करता है कल मेरे साथ भी ऐसा व्यवहार करेगा” अफसोस है मुसलमानोंकी बुद्धि और समझ पर कि, पशुओंके डरनेसे तो डरना खुदा जो व्यापक सर्व द्रष्टा (हाजिर-नाजिर) खुदा है उससे तनिक भी भय न करना।

न मिलनेका कारण—इसहाकका बेटा ईशू बड़ा शिकारी था, इसी कारण अपना ज्येष्ठांश खो बैठे पितासे उसको बरकत नहीं मिली जो याकूब चरवाहा था उसे मिली। शिकारी कठोर हृदय—मांसाहारी कभी कल्याण न पायेंगे।

एनी मोन

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युक्ति प्रमाण ।

भारत वर्षके इतिहाससे प्रगट होता है कि देवता और दैत्य सर्वदासे लड़ते आये हैं देवता सर्वदा जय पाते थे, जब संयोगन देवतोंकी हार होती थी तो उनको अन्तरिक्षसे सहायता मिलती थी, भलोंका सहायक परमेश्वर है। वह बुरोंको कभी भी सहायता नहीं देता ।

लोहूके निषेधका तात्पर्य—हजरत नूह मूसा आदिकको खुदाने हुकम दिया था कि, तुमको अनाज, फल, मांस आदिक खानेको दिया मांस खाना और लोहू फेंक देना क्योंकि, लोहूका बदला लिया जावेगा। लोहू पशुका जीवन है। न्यायका स्थान है, जब कि, किसी जीवधारीको मारा तो उसका लोहू खाओ चाहे फेंक दो, उसकी जान तो गई। क्या प्राणसे लोहू अधिक है कि, फेंक देनेसे उसका बदला न लिया जायगा कौसी अन्यायकी बात है, प्राणके साथही तो उसका सब शरीर है, हाड, चाम, मांस, लोहू, रग, आंत इत्यादि, जो चाहो सो खाओ अथवा फेंक दो। हत्या तो उसके मारतेही गरदनपर सवार हो गई, ऐसे कपटी और छली खुदाके छल कपटको हंस कबीरके बिना दूसरा कोई नहीं जान सकता, इस खुदाके भेष धारण करनेवाले अखुदाने सबकी बुद्धिपर परदा डाल दिया है ख्यमु बात तो यह है कि, रहीम हत्यारा नहीं हो सकता ।

याकूबको गऊका शाप—दीन इसलामसे प्रगट है कि, एक दिन हजरत याकूबने एक गायके बछड़ेको मारकर खा लिया ये जिस समय बछड़ेको मार रहे थे वहाँही उसकी माँ खड़ी देख रही थी, गायने याकूबको शाप दिया, जिसका यह फल हुआ कि, याकूबका बेटा ईसुफ मार कूटकर कूवामें डाला गया उसके शोकसे याकूब रोते रोते अन्धा हो गया। विचारनेकी बात है कि, जब एक बछड़ेके मारनेसे याकूबकी यह दशा होगई तो जो लोग हजारों जीवोंकी हिंसा करते हैं उनकी दशा क्या होगी ?

शिकारीकी हिंसक पशुओंसे तुल्यता—जितने हिंसक और शिकारी पशु हैं सब अशुद्ध हैं। मूसा और मुहम्मदकी शरियतसे भी प्रगट होता है कि, मांसाहारी सब पशु नापाक हैं, यह बात प्रगट भी है कि, शेर भेड़िया, कुत्ता, बिल्ली, बाघ और शाहीन आदिक मांसाहारी शिकारी और हिंसक पशु अशुद्ध ठहरे, तो मांस खानेवाला, शिकार करनेवाला और हिंसा करनेवाला, कैसे शुद्ध हो सकता है ? जिसको कि, अपने भले बुरे कर्मका ईश्वरके सम्मुख हिसाब देना है ।

कब—जब मुहम्मद साहब जहाद और लड़ाईको जाया करते थे वहाँ अनाज नहीं मिलता था तो जानवरोंको जबह करके खानेकी आज्ञा दिया करते

प्राणधारी फूल, एनथो जुआ

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थे उनके सैनिकोंको मांसको खानेसे, कामका वेग हुआ तो उन्होंने हुकुम दिया कि, जब आदमीको तीन रोज भूखे मरते बीत जाय खानेको कुछ न मिले, भूँखसे प्राणान्तकी दशा हो, तब चौथे दिन जो कुछ मिले खा लो, तो हलाल है मांस खाना ऐसेही समयके लिये हलाल हो सकता है ? दूसरे समयके लिये नहीं हो सकता । इसी प्रकार कितनी रीति रसम है जो किसी समय विशेषके लिये हैं दूसरे समयके लिये अनुचित हैं ।

पाक नापाककी समता—तौरीत और इञ्जीलसे प्रगट है कि, खाने में पाक और नापाक सब जीवधारी एक समान हैं । तौरीतमें तो कुछ विवरण भी है, पर इञ्जीलमें किसी प्रकारका बिलग विवरण नहीं है तो भी ईसाई लोग अपनी बुद्धिसे अपने भीतरी ईमानसे कुत्ता, बिल्ली, गदहा आदिक खाना नापसन्द करते हैं ।

निष्कर्ष—शिकारी पशु अर्थात् हिंसक जानवर और कञ्जरियाँ (वेश्यायें), जिनका कि गोशत खाना और वेश्यापन करनाही काम है, इनका अपराध तो शायद क्षमा हो भी, पर हिंसक और दुराचारी मनुष्य कभी क्षमा न किये जायेंगे । उनको ईश्वर अवश्य महान् दण्ड देगा । हाँ इतना तो है कि, जिस स्थानपर, अनाज घास, पात, फल, फूल, न होगा । प्रयत्नसे मिलना भी दुस्तर होगा वहाँके मनुष्य क्षमाके योग्य समझे जा सकते हैं ।

दोष—मांस अहारी अशुद्ध अन्तःकरण वाले होते हैं । प्रथम तो उनका मनही भक्तिमें नहीं लगता, उनमें सांसारिक छल, कपट और विषयवासनाकी प्रबल इच्छा होती है । यदि वे भक्तिकी ओर भी लगते हैं तो वाममार्गमें सम्मिलित होते हैं । मांस मदिरामेंही निमग्न रहकर तमोगुणी बने रहते हैं, उनको सत्तोगुणी भक्ति नहीं मिलती इसी कारण लोक परलोकसे सुख और मोक्ष यह भी प्राप्ति कभी नहीं होती ।

नानक०—जो पीते प्याले और खाते कबाब, सोदे खोरे लोगो वह होते खराब सो तोबा पुकारे कि, पावे निमाज, जो लेखा मँगीज क्या कीजे जबाब ॥

संस्कृतमें तम अज्ञानको कहते हैं इसीसे सारा संसार हुआ है । तमके न होतेही संसारका परदा नष्ट हो जाता है । फिर ज्ञान होकर मोक्ष मिल जाता है यह निश्चित बात है कि, मांस आदि तमोगुणी भोजनोंसे कभी भी मुक्ति नहीं हो सकती ।

मनुष्यसे भेड़िया—मांस खानेकी इच्छा रखनेवाले हिंसक पशुओंकी योनिमें जाते हैं । नानक साहबकी जन्म साखीमें लिखा है किः— एक

एन्टेनिया, जो फिस्टस बैलिमेन्स, एनकेरेनेटे मुंगिया या कोरल

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समय नानक साहब यमन आबाद नामक बस्ती जो इस समय गुजराँ बालाके निकट है, वहाँ पर आपका मलिक भागू नाम करोरी खत्री मिला । उसने नानकजीसे कहा कि, आज मेरे पिताके श्राद्धका दिन है, आप मेरे घर भोजन कीजिये नानक साहबने कहा कि, यह भोजन तुम्हारे पिताको पहुँच गया, उस खत्रीने उत्तर दिया कि, महाराज ! ब्राह्मण वचनानुसार तो अवश्य पहुँच गया नानक साहबने कहा कि, असज्जनोंको कदापि नहीं पहुँचता तेरा पिता भेड़ियाकी योनिमें गया है, यहाँसे पांचकोसपर अमुक स्थानमें तीन दिनका भूखा प्यासा झाड़ीमें बैठ आ हुआ है । खत्रीने कहा कि मैं इस बातका कैसे विश्वास करूँ ? नानक साहबने कहा कि, तू भोजन लेकर उसके पास जा, वह भोजन करेगा तेरे साथ मानुषिक भाषामें बातचीत करेगा । नानक साहबकी आज्ञानुसार खत्री भोजन लेकर वहाँ पहुँचा वहाँ भेड़िया मिला उसने खूब पेटभर भोजन किया । पेट भर खाने पर भेड़ियेने खत्रीके पूछनेसे कहा कि, मैं अमुक खत्री हूँ । एक वैष्णवके उपदेश मैंने मांस खाना त्याग दिया था । एक समय बीमार पड़ा उस समय मेरा पड़ोसी मांस पकाता था, मेरे नाकमें उसके मसालेकी गन्ध पहुँची, मेरा मन मांस पर चल गया, इतनेही मैं मेरे प्राण निकल गये । मांस खानेके सकलपसे मैं भेड़िया हो गया । फिर वही खत्री नानकसाहबका उपदेश लेकर भक्त हो गया ।

कबसे—जम्बूद्वीपके भरतखण्डको भारतवर्ष भी कहते हैं । यह देश पृथिवीके सभी प्रदेशोंसे उत्तम है । भारत वर्षके चारों ओर मुसलमान म्लेच्छोंकी बस्ती है, किसीकी भी ऐसी श्रेष्ठता नहीं है । भारतमें दयाका पूर्ण प्रचार होनेके कारण, यह सर्वोत्कृष्ट एवं सर्व गुण सम्पन्न हुआ है । शोककी बात है कि, मुसलमानोंके राज्य कालसे भारतमें भी मांस भक्षणका प्रचार और बढ़ गया जो दिन २ बढ़ता ही जाता है ।

हानिके कारण—दया कम हो गयी, लोगोंके अन्तःकर अशुद्ध हो गये । भक्ति लुप्त हो गई । साधु सेवा और सच्ची गुरु भक्तीका चिह्न भी नहीं मिलता, ऊपरसे गुरु भक्ति सेवाकी दिखावट और दम्भसे धर्मकी पुकार थोड़ी बहुत रह गई है । देखें आगे क्या होता है, शोक ! ज्ञान, भक्ति और मुक्ति आदि सत्य पदार्थकी खोजको भूलकर भारतवासियोंने मांस और शराब तथा नाना प्रकारके निषिद्ध मादक पदार्थोंको ग्रहण कर लिया है

उपदेश—परमात्माके सब गुणोंमें श्रेष्ठ गुण दयालुता और कृपालुता है सब मनुष्य तथा अन्य जीवधारी उसी दया और कृपाका आसरा रखते हैं । यदि वह कृपा न करे तो ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर, साधु, महात्मा कोई भी न छूटें