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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 983 of 1367

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Page 983

संस्कर्ता' चोपहन्ता च खादकश्चाष्ट' घातकाः ॥
धनेन क्रियको हन्ति द्युभोगेन च खादकः ।
घातको वधबन्धाभ्यामित्येवं भवि धेनुषः ॥

अर्थ—'मारनेवाला, 'मारनेका विचार करनेवाला, मारनेकी 'सम्मती देनेवाला, मांसका' बेचनेवाला, मांसका' मौल लेनेवाला, मांसको' पकानेवाला पकेहुये मांसका' परोसनेवाला, और मांसका' खानेवाला ये आठ घातक हैं ।

विशेष, करके हिंसा तीन प्रकारसे होती है । १—जो मांस मौल लेता है । वह तो दाम देकर जीवोंको मराता है क्योंकि, यदि मौल लेनेवाला न होता तो जीव न मारे जाय इससे मौल लेनेवाला पूरा पापी है । २—खानेवाला, खानेके स्वादके लिये मारता है, यदि वह न चाहे न मांसको खावे तो, जीव हत्या कौन करे ? । ३—हत्यारे वह हैं जो स्वयं जीवधारीको बाँधकर अथवा हथियारसे मारते हैं, सब भी एकही बात है, चोर और चोरके साथी न्यायमें तुल्यही है ।

जैसे स्वयंभू मनु कइयोंको हत्याका दोषी बताया है उसी तरह कबीर साहिबने भी अपनी साखीमें कई दोषी बनाये हैं कि—

आठ बाट बकरी गई मांस मुल्ला गयो खाय ।

अजहूँ खाल खटीकघर, विहिश्त कहो क्या जाय ॥

बकरी उपरोक्त आठ राहमें गई, उसका मांस मुल्ला खा गया अब तक उसकी खाल खटीकके घर है । वह खटीक निरञ्जन है उसीके हाथ उसकी खाल है, उसके कर्म तो उसके घरही है जिस मारनेवालेको बकरीकी योनिमें आवागमन अवश्य होगा तो बकरीके मारनेवाली विहिश्त क्योंकर जायगी, अपने कर्म के बीजसे फिर फिर देह धरेगा, जबतक उसकी खाल खटीकके घर रहेगी तबतक उनका विहिश्त प्राप्त न होगा । मारनेवालोंको वह खाल ओढ़नी पड़ेगी ।

मांस त्यागका फल ।

शाकमूलफलैर्मध्येः योवाऽदन्नेव भोजनम् ।

न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्ज्जनात् ॥

अर्थ—उपवास तथा शाक, कन्द, मूल, फल आदि भक्षोंके खानेसे इतना फल नहीं मिलता, जितना कि, मांसको छोड़ देनेसे होता है ।

मधु मांसं च ये नित्यं वर्ज्जयन्तीह मानवाः ।

जन्म प्रभृति मद्यं च सर्वं ते मुनयः स्मृताः ॥

अर्थ—जो लोग मांस और मदिरासे आयु भर बचे रहते हैं; वे साधुओंके तुल्य हैं। अवश्यही सद्गतिको पावेंगे ।