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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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बीज और नवातात जो तमाम जमीनपर है हर एक दरख्तको जिसमें बीजदार फल है देता हूँ । यह तुम्हारे खानेके लिये होगा (६००) जमीनके सब चरनेवाले और आकाशके उड़नेवाले पक्षियोंको जो कि, पृथिवीपर रहते हैं जिनमें जिन्दगी का दम है, सबजी उनके खानेके लिये सब तरहकी देता हूँ और ऐसाही होगा ।

एसियाह नबीकी किताबका ६६ बाब १०५ आयत तक-खुदावन्द फरमाता है कि, आसमान मेरा तख्त है जमीन मेरे पांवकी चौकी है, वह घर कहाँ है जो मेरे वास्ते बनाते हो मेरा आरामगाह कहाँ हैं, ये सब चीजें तो मेरे हाथने बनाई यह सब मौजूद हैं ।

खुदावन्द कहता है लेकिन मैं उस मनुष्यपर निगाह कलूंगा जो गरीब और टूटा दिल है, जो मेरे वचनसे काँप जाता है । वह जो एक बैल जबह करता है, उसके समान है जिसने एक आदमीको मार डाला वह जो बकरा कुरबानी करता है, उसके समान है, जिसने एक कुत्तेका शिर काटा । जो बलिदान चढ़ाता है वह उसके समान है जिसने शूकरका लोह चढ़ाया हो । लोबानका जलानेवाला उसके समान है जिसने एक पत्थरकी मूर्तिको मुबारक कहा है । हां ! उन्होंने अपनी राहें पसन्द कीं ।

अमूस नबीका ६ बाब ३ आयतमें लिखा है । अफसोस है उन लोगोंपर अपनेसे जो बुरा दिन दूर किया चाहते हैं, अपने पास जुल्मकी चौकीको खींचते हैं । वे जो हाथीदांतके पलंगपर लेटते हैं, अपनी अपनी चारपाइयोंपर फँल २ के सोते हैं गल्लेके थानमेंसे बछरों और बकरोंको निकाल निकाल कर खाते हैं रब्बाब आवाजके साथ गाते हैं, दाऊदकी तरह अपने अपने बजानेके लिये नये नये बाजे ईजाद करते हैं, प्यालोंमेंसे शराब पीते हैं, अपने बदनपर खालिस अतर मलते हैं, लेकिन युसफके शिकस्ता हालीके लिये शोक नहीं करते ।

इंजीलका कथन-मतीकी इञ्जीलका २२ बाब ७ आयतमें लिखा है कि मैं कुरबानी नहीं चाहता, बल्कि रहम चाहता हूँ ।

पोलूसके पहले खत, रोमियोंके १४ बाब २१ आयतमें लिखा है, कि, खानेके सबबसे खुदाके कामको मत बिगाड़ । सब कुछ तो पाक है, पर उस आदमीके लिये जो ठोकरके साथ खाता है बुरा है । गोस्त न खाना और न शराब पीना, ऐसा कुछ न करना जिससे तेरा भाई धक्का खाय, यही तेरे लिये बेहतर है

कुरान और हदीस - कुरान सिपारे पहला सूर फातेहा - (बिसमिल्लाहीं-रंहामानिरंहीम) ।

यही सारे ईमान मोहमदीकी जड़ है । इसका अर्थ है कि-मैं शुरू करता हूँ अल्लाहके नामसे वह अल्लाह कैसा है कि, दयालू है (रहीम) और रहमान है ।