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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

भाषाटीकासमेतम् । (५१९)
हुआ सर्पके प्राण हरता हुआ । ब्राह्मण भी जबतक जागकर देखता है तो
समीपही काला सांप अपने निकट कपूरकी पोटलीके ऊपर स्थित है । "कर्क-
टने इसको मारा" ऐसा विचारकर प्रसन्न होके बोला,-"भो ! मेरी माताने
सच कहाथा कि, जो "पुरुषको कोई सहायकारी रखना चाहिये इकले न जाना
चाहिये" । और जो मैंने श्रद्धासे पूर्ण चित्तसे उसके वचन माने । इसीसे मैं
कर्कटद्वारा सर्पको मारनेसे बचा । अथवा यह अच्छा कहा है--
क्षीणः स्रवति शशी रविवृद्धौ वर्द्धयति पयसां नाथम् ।
अन्ये विपदि सहाया धनिनां श्रियमनुभवन्त्यन्ये ॥ १०५ ॥
आदमीको विपत्ति आनेपर सहायता करनेवाले और होतेहैं तथा संपत्तिके
अनुभव तो औरही करतेहैं, जैसे सूर्यकी सहायतासे बढाहुवा चन्द्रमा क्षीण
होनेपरभी अमृतको वर्षाताहै और समुद्रको बढाताहै ॥ १०५ ॥
मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ ।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ॥ १०६ ॥"
मन्त्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, औषधी, गुरु इनमें जैसी जिसकी
भावना होती है वैसेही सिद्धि होती है ॥ १०६ ॥"
एवमुक्त्वा असौ ब्राह्मणो यथाभिप्रेतं गतः । अतोऽहं
ब्रवीमि-
ऐसा कह यह ब्राह्मण अभिलाषित स्थानको गया । इससे मैं कहता हूं-
“अपि कापुरुषो मार्गे द्वितीयः क्षेमकारकः ।
कर्कटेन द्वितीयेन सर्पात्पान्थः प्ररक्षितः ॥ १०७ ॥"
"कि कायर पुरुष भी मार्गमें दूसरा हितकारक होता है दूसरे केंकड़ेने बटो-
हीकी सर्पसे रक्षा की ॥ १०७ ॥"
एवं श्रुत्वा सुवर्णसिद्धिः तमनुज्ञाप्य स्वगृहं प्रति निवृत्तः।
यह सुनकर सुवर्णसिद्धि उसकी आज्ञासे अपने घरके प्रति गया
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रे अपरीक्षित-
कारकं नाम पञ्चमं तन्त्रं समाप्तम् ।
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पंचतंत्रके पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां
अपरीक्षितकारक (विनाविचारेकरना) नाम पञ्चमंतंत्रं समाप्तम् ।
॥ शुभं भवतु ॥

( ९२० ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ९२० ) पञ्चतन्त्रम् ।
दोहा-सीतापति रघुनाथश्री, भरत लषण हनुमान ।
हिये शत्रुसूदन सुमर, सज्जनको सुखदान ॥ १ ॥
पञ्चतन्त्रभाषा तिलक, कीन्हों मति अनुसार ।
बारबार शिवपद सुमर, बुधजन प्राण अधार ॥ २
रामनवमि तिथिमेषरवि, कियो संक्रमण आज ।
प्रेम सहित पूजे सबन, अवधराज महाराज ॥ ३ ॥
सम्वत् युगशर अंकविधु, चैत्रशुक्ल रविवार ।
नवमीतिथिको ग्रंथ यह, कीन्हों पूर्ण विचार ॥ ४ ॥
वसत राम गंगा निकट, नगर मुरादाबाद ।
कियो तिलक अतिशोध कर, द्विज ज्वालाप्रसाद॥५॥
वेंकटेश्वर यंत्र पति, खेमराज गुणवान ।
तिनको कीन्हों भेंट यह, सकलसुमंगल खान ॥ ६ ॥
रामराम सियराम कहु, रामराम सियराम ।
राम राम के कहतही, सिद्ध होत सब काम ॥ ७ ॥
बहुरिशारदा शिवाश्री, जगदम्बा गुणगाय ।
करहुं प्रार्थना जोरकर, कीजे सदा सहाय ॥ ८ ॥
सन्तसमागम जगतमें, सकल सुमंगल मूल ।
करहिं जो तिनपर लषन युत, राम रहहिं अनुकूल ॥९॥
॥ शुभमस्तु ॥
पञ्चतन्त्रं भाषाटीकासमेतं समाप्तम् ।
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पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-बंबई.

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