पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ९८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ९८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जलचरैः पृष्टः–“भोः कुलीरक ! किं निवृत्तस्त्वम् ? स
मातुलॊऽपि न आयातः ? तत् किं चिरयति ?, वयं सर्वे
सोत्सुकाः कृतक्षणास्तिष्ठामः” । एवं तैरभिहिते कुलीरको-
ऽपि विहस्योवाच–“मूर्खाः सर्वे जलचरास्तेन मिथ्यावा-
दिना वञ्चयित्वा नातिदूरे शिलातले प्रक्षिप्य भक्षिताः ।
तन्मया आयुःशेषतया तस्य विश्वासघातकस्य अभिप्रायं
ज्ञात्वा ग्रीवेयमानीतां । तदलं सम्भ्रमेण । अधुना सर्वजलच-
राणां क्षेमं भविष्यति” । अतोऽहं ब्रवीमि–“भक्षयित्वा
बहून् मत्स्यान्” इति ।
सो यह सरोवर स्वल्प जलवाला है शीघ्र सूख जायगा और इसके सूखनेसे
जिनके साथ मैं वृद्धिको प्राप्त हुआ हूं, सदैव क्रीडा की है वे सब जलके न
होनेसे नाशको प्राप्त होंगे, सो उनका वियोग देखनेको मैं असमर्थ हूं । इसी
कारण यह मरनेका व्रत लिया है इस समय सबही स्वल्प सरोवरोंके जलचर
बडे २ जलाशयोंमे अपने स्वजनों द्वारा लेजाये जाते हैं; कोई मकर, गोधा,
घडियांल, जलहस्ति आदि स्वयमेवही जाते हैं और इस सरोवरके जो जलचर
है वे निश्चिन्त हैं; इस क्रारण मैं विशेष कर रोताहूं कि, इसका तो बीजमात्र न
बचेगा” । तब वह यह वचन सुनकर और जलचरोंसे उसके वचन निवेदन
करता भया, तब वे सब भयसे व्याकुल मन हुए मच्छ कच्छ आदि उसके पास
आनकर पूछने लगे–“मामा ! क्या कोई उपाय है ? जिससे हमारी रक्षाहो”
बगला बोला–“इस सरोवरसे थोटी ही दूर बहुत जलसे युक्त कमलिनीसे शोभा-
यमान सरोवर है, जो चौबीस वर्षकी अनावृष्टिमेभी नहीं सूखेगा सो यदि कोई
मेरी पीठपर चढे तो मैं उसे वहां लेजाऊँ” । तब वे वहां विश्वासको प्राप्त हुए
तात, मामा, भाई इस प्रकार बोलते हुए प्रथम मैं पहले मैं इस प्रकार उसके
चारों ओर स्थित हुए । वहभी दुष्टात्मा उनको पीठपर चढाय जलाशयके थोडी
दूर शिलापर आरोपणकर उसमें डाल अपनी इच्छासे भक्षण कर फिरभी
जलाशयको प्राप्त होकर जलचरोंकी मिथ्या वार्ताके सन्देशोंसे मन प्रसन्न करता
हुआ इस प्रकार अपनी आजीविका करता रहा । एक . दिन कुलीरकने कहा–
“मामा ! मेरे संग पहले तेरा स्नेह सम्भाषण हुआथा, सो क्यों मुझे छोडकर
[header] भाषाटीकासमेतम् । (९९) [/header]
अन्योंको लेजाता है ? सो आज मेरे प्राणोंकी रक्षा कर" । यह सुनकर
वहभी दुष्टात्मा विचारने लगा । "मछलियोंके मास खानेसे मेरा जीभी उकता
गयाहै, सो आज मैं इस कुलीरकको व्यञ्जनके स्थानमे करू" । यह विचार
उसको पीठपर चढाकर उस वध्यशिलाके उद्देश्य करके चला । कुलीरक भी
दूरसे अस्थिपर्वत शिलाआश्रयको देखकर मत्स्योंकी अस्थि पहचानकर उससे
पूछने लगा-“मामा ! वह जलाशय कितनी दूर है ? मेरे भारसे तुम अधिक
थकगये हो सो कहो ।" वहभी मन्दबुद्धि यह जलचर है ऐसा मानकर कि,
स्थलमें यह बलवान् न होगा हँसता हुआ यह बोला-"कुलीरक ! दूसरा
जलाशय नहीं है, यह मेरी प्राणयात्रा है। सो अब अपने इष्टदेवताका स्मरण
करो, तुझेभी इस शिलामें डालकर मैं भक्षण करजाऊंगा" । उसके यह कहने-
पर कुलीरकने अपने दोनो दांतोंसे कमलनालकी समान उसकी श्वेत मृदुग्रीवा
पकडी जिससे वह मरगया, तब वह उस बगलेकी गरदनको ग्रहणकर सहज
सहज उस जलाशयको प्राप्त हुआ, तब सम्पूर्ण जलाशयोंके रहनेवालोंने पूछा
"भो कुलीरक ! तू किसप्रकारसे लौट आया ? वह मातुलभी न आया, सो
क्यों देर करता है, हम सब बडे उत्कंठित क्षण २ मे वाट देखते स्थितहैं ।"
उनके ऐसा कहनेपर कुलीरक हँसकर बोला-“मूर्खो ! सम्पूर्ण जलचर उस
मिथ्यावादीने ठगकर थोडीही दूर शिलातलपर पटकर खाये । सो मैं आयुशेष
होनेसे उस विश्वासघातकका अभिप्राय जानकर यह उसकी गर्दन लेआयाहूं,
सो अब उद्वेग मत करो । अब सब जलचरोकी क्षेम होगी" इससे मैं कहता
हूं-"बहुतसे मत्स्योंको खाकर" इत्यादि ।
वायस आह-“भद्र ! तत्कथय कथं स दुष्टसर्पो वधमुपै-
ष्यति ?” । शृगाल आह-“गच्छतु भवान् कञ्चिन्नगरं राजा-
धिष्ठानम् । तत्र कस्यापि धनिनो राजामात्यादेः प्रमादिनः
कनकसूत्रं हारं वा गृहीत्वा तत् कोटरे प्रक्षिप येन । सर्पस्त-
द्ग्रहणेन वध्यते" । अथ तत्क्षणात् काकः काकी च तदा-
कर्ण्य आत्मેચ્છयोत्पतितौ । ततश्च काकी किञ्चित्सरः प्राप्य
यावत्पश्यति तावत् तन्मध्ये कस्यचिद्राज्ञोऽन्तःपुरं जलासन्नं
न्यस्तकनकसूत्रं मुक्तमुक्ताहारवस्त्राभरणं जलक्रीडां कुरुते ।