पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ४३४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४३४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तत् भो दुष्टमकर ! त्वमपि नन्दवररुचिवत् स्त्रीवश्यः
ततो भद्र ! आगतेन त्वया मां प्रति वधोपायप्रयासः प्रारब्धः
परं स्ववाग्दोषेण एव प्रकटीभूतः । अथवा साधु इदमुच्यते-
सो हे दुष्टजलचर ! तूभी नन्द और वररुचिकी समान स्त्रीके वशीभूत है ।
सो भद्र ! आतेही तुमने मेरे निमित्त वधके उपायका श्रम प्रारम्भ किया परन्तु
तुम्हारी वाणीके दोषसेही वह प्रगट होगया है । अथवा यह अच्छा कहा है-
आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः ।
बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वार्थसाधनम् ॥ ५० ॥
तोते और मैना अपने मुख ( वाणी ) के दोषसे ही बन्धनमें पड़ते हैं और
बगले नहीं बंधते मौनही सब अर्थका साधक है ॥ ५० ॥
तथाच-
और देखो-
सुगुप्तं रक्ष्यमाणोऽपि दर्शयन्दारुणं वपुः ।
व्याघ्रचर्मप्रतिच्छन्नो वाक्कृते रासभो हतः ॥ ५१ ॥”
गुप्त रक्षित हुआभी अपना दारुण शरीर दिखाता हुआ व्याघ्रके चर्मसे
ढका गधा अपनी वाणीके दोषसे मारा गया ॥ ५१ ॥”
मकर आह-“कथमेतत् ?” वानरः कथयति-
मकर बोला-“यह कैसे ?” वानर कहने लगा-
कथा ८.
कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने शुद्धपटो नाम रजकः प्रतिवसति
स्म । तस्य च गर्दभः एकोऽस्ति, सोऽपि घासाभावात् अति
दुर्बलतां गतः । अथ तेन रजकेन अटव्यां परिभ्रमता मृत-
व्याघ्रो दृष्टः । चिन्तितञ्च, “अहो ! शोभनमापतितम् ।
अनेन व्याघ्रचर्मणा प्रतिच्छाद्य रासभं रात्रौ यवक्षेत्रेषु उत्स्र-
क्ष्यामि, येन व्याघ्रं मत्वा समीपवर्तिनः क्षेत्रपाला एनं न
निष्कासयिष्यन्ति” । तथा अनुष्ठिते रासभो यथेच्छया यव-
भक्षणं करोति प्रत्यूषे भूयोऽपि रजकः स्वाश्रयं नयति । एवं
गच्छता कालेन स रासभः पीवरतनुर्जातः । कृच्छ्राद् बन्ध-
भाषाटीकासमेतम् । ( ४३५ )
नस्थानमपि नीयते । अथ अन्यस्मिन् अहनि स मदोद्धतो
दूरात रासभीशब्दमशृणोत् । ततश्रवणमात्रेण एव स्वयं
शब्दयितुमारब्धः । अथ ते क्षेत्रपाला रासभोऽयं व्याघ्रचर्म-
प्रतिच्छन्न इति ज्ञात्वा लगुडशरपाषाणप्रहारैः तं व्यापादित-
वन्तः । अतोऽहं ब्रवीमि-
किसी एक स्थानमें शुद्धपट नाम धोबी रहता था । उसका एक गधा था वह
घासके विना अतिदुर्बलताको प्राप्त हुआ । तब उस धोबीने वनमें घूमते हुए
एक मरा व्याघ्र देखा विचारामी, “अहो ! बहुत अच्छा हुआ । इस व्याघ्र
(चीते) के चमड़ेसे ढककर रात्रिमें गधेको जौके क्षेत्रमें छोड़ दूंगा । जिससे
इसको व्याघ्र मानकर समीपवर्ती क्षेत्रपाल इसको न निकालेंगे”। ऐसा करनेपर
गधा यथेच्छ धान्य खेत भक्षण करने लगा सवेरे धोबी उसे अपने स्थानमें लाता।
इस प्रकार समय बीतनेपर गधा पुष्ट शरीर होगया । कठिनतासे बंधन स्थानमें
ले जाया जाता । तब और दिन उस मदोद्धतने दूरसे गधैयाका शब्द सुना
उसके सुनतेही वह स्वयं शब्द करने लगा । तब वे क्षेत्रपाल यह तो गधा है
व्याघ्रचर्मसे ढका है ऐसा जानकर लठिया बाण तथा पत्थरके प्रहारोंसे उसे
मारते हुए । इससे मैं कहता हूं-
सुगुप्तं रक्ष्यमाणोऽपि दर्शयन्दारुणं वपुः ।
व्याघ्रचर्मप्रतिच्छन्नो वाक्कृते रासभो हतः ॥ ५२ ॥”
अच्छी प्रकार रक्षा होकर भी अपना दारुण शरीर दिखाता हुआ व्याघ्रचर्मसे
प्रच्छन्न हुआ गधा वाणीके दोषसे मारा गया ॥ ५२ ॥”
अथ एवं तेन सह वदतो मकरस्य जलचरेण एकेन
आगत्य अभिहितं-“भो मकर ! त्वदीया भार्या अनशनो-
पविष्टा त्वयि चिरयति प्रणयाभिभवाद्दिपन्ना”। एवं तद्वज्र-
पातसदृशवचनमाकर्ण्य अतीव व्याकुलितहृदयः प्रलपितमेवं
चकार । “अहो ! किमिदं सञ्जातं मे मन्दभाग्यस्य । उक्तञ्च-
तब ऐसे उसके साथ कहते मकरके एक जलचरने आकर उससे कहा-“भो
मकर ! तुम्हारी स्त्री अनशन व्रतमें बैठी हुई तुम्हारे चिरकालतक न आनेसे
प्रेमकी अवमाननाके कारण मर गई”। इस प्रकार उसके वज्रपातकी समान