पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( २३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( २३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
गृही यत्रागतं दृष्ट्वा दिशो वीक्षेत वाप्यधः ।
तत्र ये सदने यान्ति ते शृंगरहिता वृषाः ॥ ६८ ॥
जो गृही अपने यहां अतिथिको आया हुआ देखकर दिशाओंको अथवा
नीचेको देखता है उनके घर जो जाते हैं वे बिना सींगके बैल हैं ॥ ६८ ॥
नाभ्युत्थानक्रिया यत्र नालापा मधुराक्षराः ।
गुणदोषकथा नैव तत्र हर्म्ये न गम्यते ॥ ६९ ॥
जहां उठनेकी क्रिया नहीं है ( बडेको देख छोटोंका उठना ) मधुर अक्ष-
रोंसे बातचीत नहीं है तथा गुण दोषकी कथा जहां नहीं है उनके स्थानमें
जाना उचित नहीं है ॥ ६९ ॥
तदेकमठप्राप्त्या अपि त्वं गर्वितः, त्यक्तः सुहृत्स्नेहः ।
न एतत् वेत्सि यत् त्वया मठाश्रयव्याजेन नरकोपार्जनं
कृतम् । उक्तञ्च-
सो एक मठको प्राप्त होकरभी तू गर्वित हुआ है और सुहृत्का स्नेह त्याग
दिया है यह नहीं जानता कि मठ आश्रयके बहानेसे तेंने नरककी प्राप्ति की ।
कहा है-
नरकाय मतिस्ते चेत्पौरोहित्यं समाचर ।
वर्ष यावत्किमन्येन मठचिन्तां दिनत्रयम् ॥ ७० ॥
नरक जानेकी इच्छा हो तो पुरोहिती कर्म कर सो एकही वर्ष बहुत है
और मठपति होनेकी चिन्तासे तीनही दिनमें नरक होता है ॥ ७० ॥
तन्मूर्ख ! शोचितव्यः त्वं गर्वं गतः । तदहं त्वदीयं मठं
परित्यज्य यास्यामि" । अथ तत् श्रुत्वा भयत्रस्तमनाः ताम्र-
चूडः तमुवाच,-"भो भगवन् ! न त्वत्समोऽन्यो मम सुहृत्
कश्चिदस्ति, परं तत् श्रूयतां गोष्ठीशैथिल्यकारणम् । एष
दुरात्मा मूषकः प्रोन्नतस्थाने धृतमपि भिक्षापात्रमुत्प्लुत्य
आरोहति भिक्षाशेषञ्च तत्रस्थं भक्षयति। तदभावात् एव मठे
मार्जनक्रिया अपि न भवति । तन्मूषकत्रासार्थमेतेन वंशेन
भिक्षापात्रं मुहुर्मुहुः ताडयामि नान्यत् कारणमिति ।
अपरमेतत् कुतूहलं पश्य अस्य दुरात्मनो यन्मार्जारमर्कटा-
दयोऽपि तिरस्कृता अस्य उत्पतनेन” । बृहत्स्फिक् आह-
“अथ ज्ञायते तस्य बिलं कस्मिंश्चित् प्रदेशे ?” ताम्रचूड
आह-“भगवन् ! न वेद्मि सम्यक्” । स आह-“नूनं निधा-
नस्य उपरि तस्य बिलम् । निधानोष्मणा प्रकूर्दते । उक्तञ्च-
सो मूर्ख ! गर्वको प्राप्त होनेसे तू शोचनीय है सो मै तुम्हारे मठको त्याग
जाऊगा” । तब यह सुन भयसे घबडाया हुआ ताम्रचूड उससे बोला-“भो
भगवन् ! ऐसा मत कहो तुम्हारा समान मेरा अन्य प्रिय सुहृत् नहीं है । परन्तु
सुनो जिस कारणसे तुम्हारे वचनके मुझसे उत्तर नहीं दिये जाते । यह दुरात्मा
मूषक ऊचे स्थानमें धरे हुएभी भिक्षापात्रपर कूदकूद चढ जाता है और उसमें
रक्खी हुई शेष भिक्षाको खाजाता है इस कारणसे मठमे मार्जन (बुहारी) भी
नहीं लगती, सो मूषकके डरानेको इस वाससे बारवार भिक्षापात्रको ताडन
करताहू । और कारण नहीं है । और इस दुरात्माका यह कुतूहल तो देखो जो
विलाव वानर आदिभी इसने अपने कूदनेके आगे तिरस्कार कर दिये” । बृह-
त्स्फिक् बोला-“किस देशमें उसका बिलहै सो जानते हो?”। ताम्रचूड बोला-
“भगवन् मैं अच्छी प्रकार नहीं जानताहू” । वह बोला-“अवश्यही धनके
ऊपर उसका बिल है । धनकी गरमीसे कूदता है । कहा है-
उष्मापि वित्तजो वृद्धिं तेजो नयति देहिनाम् ।
किं पुनस्तस्य सम्भोगस्त्यागकर्मसमन्वितः ॥ ७१ ॥
धनकी गरमी मनुष्यके तेजको बढाती है और यदि उसका भोग और त्याग
हो तो क्या कहना ॥ ७१ ॥
तथाच-
और देखो-
नाकस्माच्छाण्डिलीमातर्विक्रीणाति तिलैस्तिलान् ।
लुञ्चितानितरैर्यैन हेतुरत्र भविष्यति ॥ ७२ ॥”
हे मात ! अकस्मात् शाण्डिली ब्राह्मणी धुले तिलोसे काले नहीं बदलती है
इसमें अवश्य कोई कारण होगा ॥ ७२ ॥
ताम्रचूड आह,-“कथमेतत् ?” स. आह-
ताम्रचूड बोला,-“यह कैसे” वह बोला-