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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( १०६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( १०६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
भूमिर्मित्रं हिरण्यञ्च विग्रहस्य फलत्रयम् ।
नास्त्यैकमपि यद्येषां न तं कुर्यात्कथञ्चन ॥ २४९ ॥
भूमि, मित्र, सुवर्ण यह तीन विग्रहके फल हैं और जो इनमेंसे एकभी न हो
तो वहां विग्रह न करे ॥ २४९ ॥
यत्र न स्यात्फलं भूरि यत्र च स्यात्पराभवः ।
न तत्र मतिमान्युद्धं समुत्पाद्य समाचरेत् ॥ २५० ॥”
जहां विशेष फल न मिले और पराभव हो, मतिमान्‌को चाहिये कि, वहां
युद्ध न करे ॥ २५० ॥”
शशक आह-“स्वामिन् ! सत्यमिदम्, स्वभूमिहेतोः
परिभवाच्च युध्यन्ते क्षत्रियाः, परं स दुर्गाश्रयः, दुर्गान्निष्क्रम्य
वयं तेन विष्कम्भिताः । ततो दुर्गस्थो दुःसाध्यो भवति
रिपुः । उक्तञ्च-
खरगोश बोला,-“स्वामिन् ! यह सत्य है, अपनी भूमिके हेतु परिभवसे क्षत्रिय
युद्ध करते हैं, परन्तु वह दुर्गमें रहता है, दुर्गमेंसे निकलकर उसने हमको रोक-
लिया, इससे दुर्गमें स्थित शत्रु दुःसाध्य होता है । कहाहे कि-
न गजानां सहस्रेण न च लक्षेण वाजिनाम् ।
यत्कृत्यं साध्यते राज्ञां दुर्गेणैकेन सिध्यति ॥ २५१ ॥
जो कार्य सहस्र हाथी, लक्ष घोडोंसे सिद्ध नहीं होता है, वह एक दुर्गसे
राजाओंका कार्य सिद्ध होताहै ॥ २५१ ॥
शतमेकोऽपि सन्धत्ते प्राकारस्थो धनुर्धरः ।
तस्माद्दुर्गं प्रशंसन्ति नीतिशास्त्रविचक्षणाः ॥ २५२ ॥
किलेमें स्थित एक धनुषधारी सौसे युद्ध करसकता है, इस कारण नीति-
शास्त्रके जाननेवाले दुर्गकी प्रसंशा करते है ॥ २५२ ॥
पुरा गुरोः समादेशाद्धिरण्‍यकशिपोर्भयात् ।
शक्रेण विहितं दुर्गं प्रभावाद्विश्वकर्मणः ॥ २५३ ॥
प्रथम गुरुकी आज्ञासे हिरण्यकशिपुके भयसे इन्द्रने विश्वकर्माकी सहायतासे
दुर्ग निर्माण कियाथा ॥ २५३ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (१०७)
तेनापि च वरो दत्तो यस्य दुर्गं स भूपतिः ।
विजयी स्यात्ततो भूमौ दुर्गाणि स्युः सहस्रशः ॥ २५४ ॥
और उसनेभी यह वर दिया था कि, जिसके दुर्ग होगा वही राजा विजयी
होगा इस कारण पृथ्वीमें सैकडों दुर्ग होगये ॥ २५४ ॥
दंष्ट्राविरहितो नागो मदहीनो यथा गजः ।
सर्वेषां जायते वश्यो दुर्गहीनस्तथा नृपः ॥ २५५ ॥"
जैसे डाढोंसे रहित सर्प, मदसे हीन हाथी इसी प्रकार दुर्गहीन राजा शीघ्र
अन्योंके वशमें होजाता है ॥ २५५ ॥"
तच्छ्रुत्वा भासुरक आह-"भद्र ! दुर्गस्थमपि दर्शय तं
चौरसिंहं येन व्यापादयामि । उक्तञ्च-
यह सुनकर भासुरक बोला,-"भद्र ! किलेमे स्थितभी उस चोर सिंहको
दिखाओ जिससे मै उसे मारडालू । कहा है-
जातमात्रं न यः शत्रुं रोगञ्च प्रशमं नयेत् ।
महाबलोऽपि तेनैव वृद्धिं प्राप्य स हन्यते ॥ २५६ ॥
जो उत्पन्न होतेही शत्रु और रोगको अपने वशमे नहीं करता है, वह
महाबली हो तथापि उसके साथ वृद्धिको प्राप्तहोकर हनन करता है ॥ २५६ ॥
तथाच-
औरभी कहा है-
उत्तिष्ठमानस्तु परो नोपेक्ष्यः पथ्यमिच्छता ।
समौ हि शिष्टैराम्नातौ वर्त्स्यन्तावामयः स च ॥ २५७ ॥
हितकी इच्छा करनेवाले पुरुषको उठे हुए शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये,
श्रेष्ठ पुरुषोंने वृद्धिको प्राप्त होते हुए शत्रु और रोग समान कहे हैं ॥ २५७ ॥
अपिच-
और देखो-
उपेक्षितः क्षीणबलोऽपि शत्रुः
प्रमाददोषात्पुरुषैर्मदान्धैः ।
साध्योऽपि भूत्वा प्रथमं ततोऽसौ
असाध्यतां व्याधिरिव प्रयाति ॥ २५८ ॥