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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ३५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ३५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

स्परस्य मर्माणि उद्घाटितवन्तौ। पुनः वल्मीकस्थोऽहिरब्रवीत्-
“भो दुरात्मन् ! भेषजमिदं ते किं कोऽपि न जानाति।
यत् जीर्णोत्कालिकातिक्राराजिकापानेन भवान् विनाशमु-
पयाति” । अथ उदरस्थोऽहिरब्रवीत्-“ तवापि एतद्भेषजं
किं कश्चिदपि न वेत्ति ? यत् उष्णतैलेन वा महोष्णोदके-
न तव विनाशः स्यादिति ” । एवञ्च सा राजकन्या
विटपान्तरिता तयोः परस्परालापान् मर्ममयान् आक-
र्ण्य तथा एव अनुष्ठितवती । विधाय अव्यङ्गं नीरोगं
भर्तारं निधिश्च परममासाद्य स्वदेशाभिमुखं प्रायात् ।
पितृमातृस्वजनैः प्रतिपूजिता विहितोपभोगं प्राप्य सुखेन
अवस्थिता। अतोऽहं ब्रवीमि-

किसी नगरमें देवशक्ति नामवाला राजा रहता था उसका पुत्र उदररूप (१)
वल्मीकमें रहनेवाले सर्पसे प्रतिदिन प्रत्यंगसे दुबला होता था, अनेक उपायोंसे
सवैद्यों द्वारा सच्छास्त्रोंमें कही औषधीसे युक्तभी चिकित्सा करा हुआ स्वस्थ-
ताको न प्राप्त होता । तब यह राजपुत्र निर्वेदसे देशान्तरको गया किसी एक
नगरमें भिक्षाटन कर बडे देवालयमें समय बिताता था । उस नगरमे बलिनाम
राजा है उसकी दो कन्या जवानथीं । वो प्रतिदिन सूर्योदयमें पिताके निकट
आकर नमस्कार करती हुईं । उनमेंसे एक बोली-“महाराजकी जय हो ।
जिसके प्रसादसे सब सुख प्राप्त होता है” । दूसरी-“महाराज ! अपने कर्मसे
उत्पन्न हुआ भोगो,” ऐसा बोली । यह सुन क्रोध कर राजा बोला,-“भो !
मन्त्रिन् इस दुष्ट बोलनेवाली कुमारिकाको किसी विदेशी पुरुषको दे दो ।
जिससे अपना किया हुआ यही भोगे” । तब “बहुत अच्छा” कहकर थोडी
सखियोंके सहित वह कुमारी मत्रियोंने उस देवमंदिरमें रहनेवाले राजपुत्रको
देदी । वह भी प्रसन्नमनसे उस पतिको देववत् प्राप्त हो लेकर और देशको
गई । तब किसी अत्यन्त दूर नगर देशमें सरोवरके तट राजपुत्रको स्थान-
रक्षाके लिये नियुक्तकर स्वयं घी तेल लवण तण्डुलादिक लेनेके निमित्त परिवार
सहित गई । क्रय विक्रय कर जब आने लगी तबतक वह राजपुत्र वल्मीकके-


१ उसके पेटमें सर्प रहताथा ।

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भाषाटीकासमेतम् । (३५७)

ऊपर शिर धरकर सो गया । उसके मुखसे सर्प फण निकालकर वायुभक्षण
करता था । उसी बॉवईसे दूसरा सर्प निकल कर भी इसी प्रकार करता । तब
उनके परस्पर दर्शनसे क्रोधसे लाल नेत्र कर वल्मीकमे स्थित सर्पने कहा- "भो
भो दुरात्मन् ! किस प्रकार सर्वांगसुन्दर इस राजपुत्रको क्लेश देता है ?"
मुखमें स्थित सर्प बोला,- "भो ! भो ! तुम दुरात्माने भी इस वल्मीकके मध्यमें
किस प्रकार यह सुवर्णसे पूर्ण दो कलश दूषित किये हैं ?" इस प्रकार परस्पर
दोनों भेद खोलते भये । फिर वल्मीकमे स्थित सर्प बोला,- "भो दुरात्मन् ! यह
तेरी औषधी क्या कोई नहीं जानता है ? जो कि पुरानी आलोड़ित राजकां-
जीके पानसे तू नाशको प्राप्त होगा" । तब वह मुखके भीतरका सर्प बोला-
"क्या तेरी यह औषधी कोई नहीं जानता है ? जो गरम जल वा गरमतेलसे
तेरा नाश होगा" । इस प्रकार वह राजकन्या वृक्षकी ओरसे उन दोनोंके पर-
स्पर भेदके वचन सुनकर, वैसाही करती हुई अव्यंग और निरोग स्वामीको
करके परम धनको प्राप्त हो अपने देशको चली । पिता माता सुजनोंसे पूजित
हो यथेच्छ भोगोंको प्राप्त होकर सुखसे रही । इससे मैं कहता हू-
परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः ।
त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ २०० ॥”
जो प्राणी परस्परमर्मोकी रक्षा नहीं करते हैं वह वल्मीक और उदरके
सर्पकी समान नष्ट होते हैं ॥ २०० ॥”
तच्च श्रुत्वा स्वयमरिमर्दनोंऽपि एवं समर्थितवान् । तथाच
अनुष्ठितं दृष्ट्वान्तर्लीनं विहस्य रक्ताक्षः पुनरब्रवीत्,-
“कष्टम् ! विनाशितोऽयं भवद्भिः अन्यायेन स्वामी ! उक्तञ्च-
यह सुनकर स्वयं अरिमर्दन भी इस बातको पुष्ट करता हुआ इस प्रकार
( शरणागत रक्षा ) के अनुष्ठानको देखकर अस्पष्ट स्वरसे हँसकर रक्ताक्ष
फिर बोला, - "कष्ट है कि तुमने अन्यायसे स्वामीका नाश किया । कहा है-
अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यानान्तु विमानना ।
त्रीणि तत्र प्रवर्त्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ॥ २०१ ॥
जहा अपूज्य पूजे जाते हैं पूज्योंका निरादर होता है वहा तीन होते हैं
दुर्भिक्ष, मरण और भय ॥ ३०१ ॥