पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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हुआ सर्पके प्राण हरता हुआ । ब्राह्मण भी जबतक जागकर देखता है तो
समीपही काला सांप अपने निकट कपूरकी पोटलीके ऊपर स्थित है । "कर्क-
टने इसको मारा" ऐसा विचारकर प्रसन्न होके बोला,-"भो ! मेरी माताने
सच कहाथा कि, जो "पुरुषको कोई सहायकारी रखना चाहिये इकले न जाना
चाहिये" । और जो मैंने श्रद्धासे पूर्ण चित्तसे उसके वचन माने । इसीसे मैं
कर्कटद्वारा सर्पको मारनेसे बचा । अथवा यह अच्छा कहा है--
क्षीणः स्रवति शशी रविवृद्धौ वर्द्धयति पयसां नाथम् ।
अन्ये विपदि सहाया धनिनां श्रियमनुभवन्त्यन्ये ॥ १०५ ॥
आदमीको विपत्ति आनेपर सहायता करनेवाले और होतेहैं तथा संपत्तिके
अनुभव तो औरही करतेहैं, जैसे सूर्यकी सहायतासे बढाहुवा चन्द्रमा क्षीण
होनेपरभी अमृतको वर्षाताहै और समुद्रको बढाताहै ॥ १०५ ॥
मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ ।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ॥ १०६ ॥"
मन्त्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, औषधी, गुरु इनमें जैसी जिसकी
भावना होती है वैसेही सिद्धि होती है ॥ १०६ ॥"
एवमुक्त्वा असौ ब्राह्मणो यथाभिप्रेतं गतः । अतोऽहं
ब्रवीमि-
ऐसा कह यह ब्राह्मण अभिलाषित स्थानको गया । इससे मैं कहता हूं-
“अपि कापुरुषो मार्गे द्वितीयः क्षेमकारकः ।
कर्कटेन द्वितीयेन सर्पात्पान्थः प्ररक्षितः ॥ १०७ ॥"
"कि कायर पुरुष भी मार्गमें दूसरा हितकारक होता है दूसरे केंकड़ेने बटो-
हीकी सर्पसे रक्षा की ॥ १०७ ॥"
एवं श्रुत्वा सुवर्णसिद्धिः तमनुज्ञाप्य स्वगृहं प्रति निवृत्तः।
यह सुनकर सुवर्णसिद्धि उसकी आज्ञासे अपने घरके प्रति गया
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रे अपरीक्षित-
कारकं नाम पञ्चमं तन्त्रं समाप्तम् ।
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पंचतंत्रके पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां
अपरीक्षितकारक (विनाविचारेकरना) नाम पञ्चमंतंत्रं समाप्तम् ।
॥ शुभं भवतु ॥