पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ३३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
हुए उसके महाकाय होनेसे दैव वशसे लघु विवर होनेसे उसके शरीरमें ( छिल-
नेसे ) व्रण होगये । तब व्रणके और शोणितकी गन्धके अनुसरण करनेवाली
चींटियोंने सबओरसे व्याप्त कर उसको व्याकुल करादिया । किनको मारे किनको
ताडन करे । तब उनके अधिक होनेसे व्रण बढगये सर्वाङ्गमें घाव होनेसे अति-
दर्प पंचत्वको प्राप्त होगया । इससे मैं कहता हूं कि-
“ बहवो न विरोद्धव्या दुर्जया हि महाजनाः ।
स्फुरन्तमपि नागेन्द्रं भक्षयन्ति पिपीलिकाः ॥ १२४ ॥”
“बहुतोंके साथ विरोध न करै महाजन दुर्जय होते हैं चीटियां तेजस्वी सर्प-
को भक्षण करगईं ॥ १२४ ॥”
तन्न अत्रास्ति किञ्चित् मे वक्तव्यमेव । तदवधार्य्य यथोक्त-
मनुष्ठीयताम्”। मेघवर्ण आह-“तत् समादिशय-तवादेशो
नान्यथा कर्त्तव्यः”। स्थिरजीवी प्राह-“ वत्स ! समाकर्णय
तर्हि सामादीनतिक्रम्य यो मया पञ्चम उपायो निरूपितः।
तन्मां विपक्षभूतं कृत्वा, अतिनिष्ठुरवचनैः निर्भर्त्स्य, यथा
विपक्षप्रणिधीनां प्रत्ययो भवति, तथा समाहतरुधिरैः आ-
लिप्य, अस्यैव न्यग्रोधस्य अधस्तात् प्रक्षिप्य मां गम्यतां
पर्वतम् ऋष्यमूकं प्रति, तत्र सपरिवारस्तिष्ठ । यावदहं सम-
स्तान् सपत्नान् सुप्रणीतेन विधिना विश्वास्य अभिमुखान्
कृत्वा कृतार्थो ज्ञातदुर्गमध्यः दिवसे तान् अन्धतां प्राप्तान्
ज्ञात्वा व्यापादयामि, ज्ञातं मया सम्यक्, नान्यथा अस्माकं
सिद्धिरिति । यतो दुर्गमेतत् अपसाररहितं केवलं वधाय
भविष्यति । उक्तञ्च यतः ।
“सो इस विषयमें मुझे कुछ वक्तव्य है । सो यह निश्चय करके यथोक्त अनुष्ठान
करो”। मेघवर्ण बोला-“तुम्हारा आदेश अन्यथा नही होगा”। स्थिरजीवी बोला-
“वत्स ! सुनो जो सामादि उपायोको छोड़कर मैंने पांचवा उपाय निरूपण किया
है । तू मुझे अपना शत्रुरूप कर निठुर बचनोंसे धुडक जिससे शत्रुपक्षी दूतोंके
विश्वास होजाय । और कहींसे लाये हुए रुधिरसे आलितकर इसी न्यग्रोधके नीचे
: मुझको डालदे। और तू ऋष्यमूक पर्वतके निकट जाकर वहा परिवारके सहित
: स्थित हो। जबतक मै सब शत्रुओंको अपने आचरणकी विधिसे विश्वासी कर
: सन्मुख कर कृतार्थहो दुर्गको जानकर दिनके मध्यमे अघताको प्राप्त हुए उनको
: जानकर मार डालू। जाना है मैने भली प्रकार। हमारी सिद्धि अन्यथा न होगी।
: कारण कि हमारा आवास दुर्गम निकलनेके उपायसे शून्य केवल वधके लिये
: होगा। कारण कहा है कि-
: अपसारसमायुक्तं नयज्ञैर्दुर्गमुच्यते।
: अपसारपरित्यक्तं दुर्गं व्याजेन बन्धनम् ॥ १२५ ॥
: नीति जाननेवालोंने निकलनेके उपायसे युक्त ही दुर्गकी प्रशसा की है (१)
: अपसारके बिना दुर्ग कारावासकी समान है ॥ १२५ ॥
: न च त्वया मदर्थे कृपा कार्या। उक्तञ्च-
: तुझे मेरे निमित्त कृपा करनी नहीं चाहिये। कहाहै-
: अपि प्राणसमानिष्टान्पालिताँल्लालितानपि।
: भृत्यान्युद्धे समुत्पन्ने पश्येच्छुष्कमिवेन्धनम् ॥ १२६ ॥
: प्राणोंकी समान प्यारे पालित और लालित भृत्योंको युद्धके उत्पन्न होनेमें
: सूखे काठको अग्निमे जैसे प्रेरण करे ॥ १२६ ॥
: तथाच-
: और देखो-
: प्राणवद्रक्षयेद्भृत्यान्स्वकायमिव पोषयेत्।
: सदैकदिवसस्यार्थे यत्र स्याद्रिपुसंगमः ॥ १२७ ॥
: भृत्योंको प्राणकी समान रक्षा करे अपने कायाकी नाई पुष्ट करे यह उसी
: एक दिनके निमित्त है जब शत्रु का संगमहो ॥ १२७ ॥
: तत् त्वया अहं न अत्रविषये प्रतिषेधनीयः"। इत्युक्त्वा तेन
: सह शुष्ककलहं कर्तुमारब्धः। अथ अन्ये तस्य भृत्याः स्थिर-
: जीविनमुच्छ्रंखलवचनैर्जल्पन्तमवलोक्य तस्य वधाय उद्यताः
: मेघवर्णेन अभिहिताः- "अहो ! निवर्तध्वं यूयम्। अहमेव
: अस्य शत्रुपक्षपातिनो दुरात्मनः स्वयं निग्रहं करिष्यामि”।
: १-निकलनेका मार्ग।