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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( २४० ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २४० ) पञ्चतन्त्रम् ।

पाश छेदन कर कूट ( कपट ) रचनाको त्याग बलसे बन्धनवृत्तिको तोड
निकट चारों ओर अग्निशिखाके समूहसे युक्त वनसे दूर जाकर तथा व्याधके
बाणके अगोचर होकरभी दौडता मृग कूपमें गिरगया विधाताके रुष्ट होनेमें
पुरुषार्थ क्या कर सकता है ॥ ९० ॥
अथ अहमेकोऽन्यत्र गतः शेषा मूढतया तत्रैव दुर्गे
प्रविष्टाः । अत्रान्तरे स दुष्टपरिव्राजको रुधिरबिन्दुचर्चितां
भूमिमवलोक्य तेनैव दुर्गमार्गेण आगत्य उपस्थितः । ततश्च
स्वहस्तिकया खनितुमारब्धः । अथ तेन खनता प्राप्तं तन्नि-
धानं यस्य उपरि सदा एवाहं कृतवसतिः यस्य उष्मणा महा-
दुर्गमपि गच्छामि। ततो हृष्टमनाः ताम्रचूडमिदमूचेऽभ्यागतः
“भो भगवन् ! इदानीं स्वपिहि निःशङ्कः अस्य उष्मणा
मूषकस्ते जागरणं सम्पादयति ” एवमुक्त्वा निधानमादाय
मठाभिमुखं प्रस्थितौ द्वौ अपि । अहमपि यावत् निधानर-
हितं स्थानमागच्छामि तावत् अरमणीयमुद्वेगकारकं तत्
स्थानं वीक्षितुमपि न शक्नोमि अचिन्तयं च । “किं करो-
मि ! क्व गच्छामि ! कथं मे · स्यात् मनसः प्रशान्तिः” एवं
चिन्तयतो महाकष्टेन स दिवसो व्यतिक्रान्तः । अथ अस्तं-
मितेऽर्के सोद्वेगो निरुत्साहस्तस्मिन् मठे सपरिवारः प्रविष्टः।
अथ अस्मत् परिग्रहशब्दमाकर्ण्य ताम्रचूड़ोऽपि भूयो
भिक्षापात्रं जर्जरवंशेन ताडयितुं प्रवृत्तः । अथ असौ अभ्या-
गतः प्राह-“सखे ! किम् अद्यापि निःशङ्को न निद्रां गच्छ-
सि” । स आह,-“भगवन् ! भूयोऽपि समायातः सपरिवारः
स दुष्टात्मा मूषकः । तद्भयात् जर्जरवंशेन भिक्षापात्रं ताड-
यामि” । ततो विहस्य अभ्यागतः प्राह-“सखे ! मा भैषीः ।
वित्तेन सह गतोऽस्य कूर्द्दनोत्साहः । सर्वेषामपि जन्तूनाम्।
इयमेव स्थितिः । उक्तञ्च-
सो मैं इकलाही अन्यत्र गया शेष मूढतासे उसी दुर्गमें प्रविष्ट हुए ।
इससमय वह दुष्ट परिव्राजक रुधिरकी बूंदोंसे चर्चित पृथ्वीको देख उसी दुर्ग-

भाषाटीकासमेतम् । (२४१)
मार्गसे आकर उपस्थित हुआ । और फिर अपने हाथसे खोदना प्रारंभ किया ।
तब खोदते हुए उसने वह निधि पाई जिसके ऊपर मैं अहंकारसे निवास करता
था, जिसकी गरमीसे महादुर्गकोभी जा सक्ता था । तब प्रसन्न होकर ताम्रचूडसे
अभ्यागत बोला,-"भो भगवन् ! अब निश्शंक शयन करो। इसीकी गरमीसे यह
मूषक आपको जगाताहै" । यह कह दोनो धनको ले मठकी ओरको चले और
मैंभी जबतक निधान रहित स्थानको प्राप्त होताहू तबतक अशोभित उद्वेगकारक
उस स्थानको देखनेमें भी समर्थ न होकर विचारने लगा" क्या करू कहा
जाऊ कैसे मेरे मनकी शान्ति हो ?"। इस प्रकार महाकष्टसे वह दिन बीता ।
फिर सूर्यके अस्तमें उद्वेगसे उत्साहहीन होकर उस मठमें परिवारसहित प्रविष्ट
हुआ तब हमारे परिवारके शब्दको सुनकर ताम्रचूड फिरभी भिक्षापात्रको जर्जर
वाससे ताडन करने लगा । तब यह अभ्यागत बोला-"सखे ! क्यों अब भी
निश्शंक होकर नहीं सोता है ?"। वह बोला-"भगवन् ! फिर भी आया यह
दुष्टात्मा मूषक परिवार सहित । उसके भयसे जर्जर बाशमे भिक्षापात्रको ताडन
करता हूँ"। तब हँसकर अभ्यागत बोला,-"सखे ! मत डर धनके सहितही
इसके कूदनेका उत्साह नष्ट हुआ है सब जन्तुओंकी यही स्थितिहै, कहाहै ।
यद्युत्साही सदा मर्त्यः पराभवति यज्जनान् ।
यदुद्धतं वदेद्वाक्यं तत्सर्वं वित्तजं बलम् ॥ ९१ ॥
जो मनुष्य सदा उत्साही है और मनुष्योंको पराभव करता है जो उद्धत
वाक्य कहता है वह सब धनका उत्पन्न हुआ बल जानो ॥ ९१ ॥
अथ अहं तत् श्रुत्वा कोपाविष्टो भिक्षापात्रमुद्दिश्य विशे-
षादुत्कूर्दितोऽप्राप्त एव भूमौ निपतितः । तत् श्रुत्वा
असौ मे शत्रुर्व्हिहस्य ताम्रचूड़मुवाच-“भोः पश्य पश्य
कौतूहलम् ” । आह च-
तब मैं यह सुन क्रोधित हो भिक्षापात्रकी ओरको विशेष कूदने लगा
पर वहा न पहुचकर भूमिमें गिरा यह सुन यह मेरा शत्रु हँसकर ताम्रचूड-
से बोला-“भो ! देखो २ कुतूहल-“बोला भी-
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