पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
(२००) पञ्चतन्त्रम् ।
(२००) पञ्चतन्त्रम् ।
और मैंने उसकी सभामे सदा प्रशंसा की अब उन सबके आगे क्या कहूंगा।
कहाहै-
उक्तो भवति यः पूर्वं गुणवानिति संसदि ।
न तस्य दोषो वक्तव्यः प्रतिज्ञाभङ्गभीरुणा ॥ ४५७ ॥”
जिसको पहले सभामें यह गुणवान् है ऐसा कहा है प्रतिज्ञाभंगभीरुओंको
फिर उनके दोष कहने उचित नहीं हैं ॥ ४५७ ॥”
एवंविधं प्रलपन्तं दमनकः समेत्य सहर्षमिदमाह-“ देव
कातरतमस्तव एष न्यायो यद्द्रोहकारिणं शष्पभुजं हत्वा इत्थं
शोचसि । तन्न एतदुपपन्नं भूभुजाम् । उक्तञ्च-
इस प्रकारसे प्रलाप करते हुएके निकट दमनक आकर प्रसन्नतासे यह बोला-
“देव ! आपका यह न्याय अत्यन्त कातरतम है जो इस द्रोहकारी घासभोजीको
मारकर इस प्रकार शोच करते हो राजाओंको यह उचित नहीं है । कहा है-
पिता वा यदि वा भ्राता पुत्रो भार्याथवा सुहृत् ।
प्राणद्रोहं यदा गच्छेद्धन्तव्यो नास्ति पातकम् ॥ ४५८ ॥
पिता, भ्राता, पुत्र, स्त्री वा सुहृत् जो यह अपने प्राणोंका द्रोह करें तो इनके
मारनेमें पातक नहीं है ॥ ४५८ ॥
तथाच-
और देखो-
राजा घृणी ब्राह्मणः सर्वभक्षी स्त्री चात्रपा दुष्टमतिःसहायः।
प्रेष्यःप्रतीपोऽधिकृतः प्रमादी त्याज्या अमी यश्च कृतं न वेत्ति॥
अति दयालु राजा, सर्वभक्षी ब्राह्मण, निर्लज्ज स्त्री, दुष्टमति सहायकारी,
प्रतिकूल भृत्य, असावधान अधिकारी और जो कार्यको नहीं जानता इनको
त्यागना चाहिये ॥ ४५९ ॥
अपिच-
औरभी-
सत्यानृता च पुरुषा प्रियवादिनी च
हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या ।
भाषाटीकासमेतम् । (२०१)
भूरिव्यया प्रचुरवित्तसमागमा च
वेश्याङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा ॥ ४६० ॥
सत्य, झूठ, कठोर, प्रियवादिनी, हिंसायुक्त, दया, भय, कभी स्वा-
र्थयुक्त, पुरस्कारवाली, बहुत व्यय, बहुत धनकी प्राप्तिवाली राजाओंकी नीति
वेश्याकी समान अनेकरूपवाली होतीहै ॥ ४६० ॥
अपिच-
और भी-
अकुर्वन्नोपद्रवः कश्चिन्महानपि न पूज्यते ।
पूजयन्ति नरा नागान्न तार्क्ष्यं नागघातिनम् ॥ ४६१ ॥
विना उपद्रवकरे कोई महान्भी पूजित नहीं होता है मनुष्य सर्पोंको
पूजते हैं सर्पघाती गरुडको नहीं पूजते हैं ॥ ४६१ ॥
तथाच-
तैसेही-
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ४६२ ॥
नहीं शोचवालोंका सोच करतेहो, बुद्धिमानोंके वचनोंको बोलते हो पंडितलोग
जीते मरे किसीकाभी शोच नहीं करते ॥ ४६२ ॥
एवं तेन सम्बोधितः पिंगलकः सञ्जीवकशोकं त्यक्त्वा
दमनकसाचिव्येन राज्यमकरोत् ॥
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रे मित्रभेदो नाम
प्रथमं तन्त्रं समाप्तम् ।
इस प्रकार उससे समझाया हुआ पिंगलक सञ्जीवकके शोकको त्यागनकर
दमनकको मन्त्री बनाय राज्य करता रहा ॥
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रे कामेश्वरपक्षकृतपाठशालायाः मुख्याध्यापकपंडित-
ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां मित्रभेदोनाम प्रथमं तन्त्रं समाप्तम्। शुभमस्तु ।