पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ८४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ८४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जां वेपमानां शय्यायामनयत् । ततश्च रात्रिशेषं यावद्
वात्स्यायनोक्तविधिना निषेव्य प्रत्यूषे स्वगृहमलक्षितो
जगाम । एवं तस्य तां नित्यं सेवमानस्य कालोयाति । अथ
कदाचित् कंचुकिनः तस्या अधरोष्ठप्रवालखण्डनं दृष्ट्वा
मिथः प्रोचुः-“अहो ! पश्यत अस्या राजकन्यायाः पुरुषो-
पभुक्ताया इव शरीरावयवाः विभाव्यन्ते । तत् कथमयं सुर-
क्षितेऽपि अस्मिन् गृहे एवंविधो व्यवहारः। तत् राज्ञे निवेद-
यामः”। एवं निश्चित्य सर्वे समेत्य राजानं प्रोचुः-“देव !
वयं न विद्मः । परं सुरक्षितेऽपि कन्यान्तःपुरे कश्चित् प्रवि-
शति । तद्देवः प्रमाणम्” इति । तच्छ्रुत्वा राजा अतीव
व्याकुलितचित्तो व्यचिन्तयत् ।
रथकारभी इसप्रकार सकाम उसके वचनको सुनकर हँसता भया । “मित्र !
यदि ऐसा है तो भाग्यसे हमारा मनोरथ सिद्ध हुआ । सो आजही उसके साथ
समागम करो”। कौलिक बोला-“मित्र ! जिस कन्याके अन्तःपुरमें वायुको
छोड अन्य वस्तुका प्रवेश नहीं है, वहां राजाके पुरुषोंसे युक्त स्थानमें मेरा उसके साथ
कैसा समागम होगा । सो क्यों मुझे असत्यवचनसे वंचित करताहै.”?। रथकार
बोला-“मित्र ! मेरी बुद्धि और बलको देखो” ऐसा कह उसीसमय कील घुमा-
नेसे चलनेवाले गरुड जो वायुज वृक्षके काष्ठकी दो भुजा शंख, चक्र, गदा,
पद्म, किरीट और कौस्तुभकोभी बनाताहुआ उसपर उस कौलिकको चढाकर
विष्णुचिन्हसे चिन्हितकर कील प्रवेशके विज्ञानकोभी दिखाकर बोला-“मित्र !
इस विष्णुरूपसे जाकर कन्याके अन्तःपुरमें अर्धरात्रिके समय उस राजकन्याको
जो इकली सतमहले मन्दिरमें प्राप्त हुई मुग्धस्वभावसे तुझे वासुदेव माननेवाली
उसको अपनी कुटिल उक्तिसे प्रसन्नकर वात्स्यायन मुनिके कहे कामशास्त्रके
विधानसे भोगो”। कौलिकभी यह वचन सुन उस रूपसे वहां जाकर उससे
बोला-“राजपुत्रि ! सोतीहो या जागती ? मैं तुम्हारे निमित्त समुद्रसे अनुराग
करनेवाली लक्ष्मीको त्याग करके आयाहूं । सो मेरे साथ समागम करो” ।
वहभी गरुडपर चढे चार भुजा आयुध लिये कौस्तुभसे युक्त देखकर विस्मयपू-
र्वक शयनसे उठकर बोली-“भगवन् ! मैं मानुषी कीटजाति अपवित्रहूं । आप
भाषाटीकासमेतम् । ( ८५ )
त्रिलोकीके नमस्कार करने योग्य पवित्र करनेवाले हैं, सो यह कैसे होसकता है?"।
कौलिक बोला—"सुभगे ! तुमने सत्य कहा, परन्तु राधा नामक मेरी भार्या जो
प्रथम गोपकुलमें उत्पन्न हुईथी, वही तू यहा अवतीर्ण हुई है । इसीकारण मैं
यहां आयाहू" ऐसा कहनेपर वह बोली,—"भगवन् ! यदि ऐसाहै तो मुझे मेरे
पितासे मांगो वह भी तत्काल तुमको प्रदान करेंगे"। कौलिक बोला—"सुभगे !
मैं मनुष्योंके दर्शनपथको प्राप्त नहीं होताहू फिर बात करनी तो कैसी ! तू गन्धर्व-
विवाहसे अपने आपको मुझे प्रदानकर, नहीं तो शापदेकर कुलसहित तेरे पिताको
भस्म करदूंगा" यह कह गरुडसे उतर सीधे हाथसे उसे ग्रहणकर उस भय
लज्जासे कंपित हुईको शय्यापर ले आया शेषरात्रिमें वात्स्यायन विधिके अनुसार
उसको सेवनकर बहुत प्रभातमे अलक्षितहो अपने स्थानको गया। इसप्रकार नित्य
उसको भोगते, समय बीतता भया । तब कभी कचुकी उसके अधरोष्ठ रक्त और
खंडित देखकर परस्पर कहने लगे—"अहो ! देखो तो इस राजकन्याके पुरुषसे
भोगे हुए शरीरके अगप्रत्यग दीखते हैं। सो कैसे यह सुरक्षित इस घरमें इस
प्रकारका व्योहारहै, सो हम राजासे निवेदन करें"। ऐसा निश्चयकर सब मिलकर
राजासे बोले—"देव हम नहीं जानते परन्तु सुरक्षिताभी कन्याके अन्तःपुरमे कोई
प्रवेश करता है, सो इसमें आपही प्रमाण है" यह सुन राजा महाव्याकुल हो
विचारने लगा.—
"पुत्रीति जाता महतीह चिन्ता
कस्मै प्रदेयेति महान्वितर्कः।
दत्त्वा सुखं प्राप्स्यति वा न वेति
कन्यापितृत्वं खलु नाम कष्टम् ॥ २२२ ॥
"इस संसारमें कन्या होना यह बडी चिन्ता है, कारण यह किसको दें यह
महान् वितर्क है, और भी देनेसे सुख पावेगी या नहीं यह भी नहीं जानाजाता
इसलिये कन्या पिताके निमित्त एक कष्टहीहै ॥ २२२ ॥
नद्यश्च नार्य्यश्च सहकप्रभावा-
स्तुल्यानि कूलानि कुलानि तासाम् ।
तोयैश्च दोषैश्च निपातयन्ति
नद्यो हि कूलानि कुलानि नार्य्यः ॥ २२३ ॥