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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ३६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ३६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
हमदृश्यो भवामि" । अथ मुनिना मेघमपि आहूय कन्या
अभिहिता,-"पुत्रिके ! अस्मै त्वां प्रयच्छामि?"। सा प्राह,-
"कृष्णवर्णोऽयं जड़ात्मा च । तदस्मात् अन्यस्य प्रधानस्य
कस्यचित् मां प्रयच्छ" । अथ मुनिना मेघोऽपि पृष्टः-"भो
भो मेघ ! त्वत्तोऽपि अधिकोऽस्ति कश्चित् ?" मेघेनोक्तं, "मत्तो-
ऽपि अधिकोऽस्ति वायुः । वायुना हतोऽहं सहस्रधा
यामि" । तच्छ्रुत्वा मुनिना वायुराहूतः । आह च,-"पुत्रिके !
किमेष वायुस्ते विवाहाय उत्तमः प्रतिभाति ?" सा अब्र-
वीत्-"तात ! अतिचपलोऽयं तदस्मादपि अधिकः कश्चित्
आनीयताम्" । मुनिराह,-"वायो ! त्वत्तोऽपि अधिकोऽ-
स्ति कश्चित् ?" पवनेन उक्तं,-"मत्तोऽपि अधिकोऽस्ति
पर्वतो येन संस्तभ्य बलवानपि अहं ध्रिये" । अथ मुनिः
पर्वतमाहूय कन्यामुवाच-"पुत्रिके ! त्वामस्मै प्रयच्छामि?"।
सा प्राह,-"तात ! कठिनात्मकोऽयं स्तब्धश्च । तत् अन्यस्मै
देहि मां"। मुनिना पर्वतः पृष्टः-"भोः पर्वतराज ! त्वत्तोऽपि
अधिकोऽस्ति कश्चित् " । गिरिणा उक्तम्-"मत्तोऽपि
अधिकाः सन्ति मूषिका ये मच्छरीरं बलात् विदारयन्ति"।
ततो मुनिः मूषिकमाहूय तस्या अदर्शयत् । आह च--
"पुत्रिके ! त्वामस्मै प्रयच्छामि किमेष प्रतिभाति ते मूषिक-
राजः ?" । सापि तं दृष्ट्वा स्वजातीय एष इति मन्यमाना
पुलकोद्भूषितशरीरोवाच-"तात ! मां मूषिकां कृत्वा अस्मै
प्रयच्छ । येन स्वजातिविहितं गृहधर्मम् अनुतिष्ठामि" ।
ततः सोऽपि स्वतपोबलेन तां मूषिकां कृत्वा तस्मै प्रादात् ।
अतोऽहं ब्रवीमि--
सो यदि इसको अच्छा लगे तो भगवान् सूर्यको बुलाकर उन्हें प्रदान करूं" ।
वह बोली- "इसमें क्या दोष है। यही करो" तब मुनिराजने सूर्यको बुलाया ।
वेदमंत्रके उच्चारणप्रभावसे उसी क्षणमें सूर्य आकर बोले- "भगवन्, मुझे क्यों
बुलाया है ?" । वह बोले-"यह मेरी कन्या है । जो यह तुमको वरण करे तो

[Header] भाषाटीकासमेतम् । ( ३६९ )

इसके संग विवाह करो”। ऐसा कह अपनी कन्यासे बोले-“पुत्रि ! क्या यह
त्रिलोकीके प्रकाशक भगवान् सूर्य तुमको रुचते हैं?” । पुत्रिका बोली-“पित.!
यह अधिक प्रज्वलित है। मैं इनकी अभिलाषा नहीं करती । सो इनसे अधिक
उत्कृष्ट कोई बुलाओ” तब उसके यह वचन सुन मुनि सूर्यसे बोले-“भगवन् !
कोई तुमसे भी अधिक शक्तिमान् है ?” सूर्य बोले-“मुझसे भी अधिक मेघ
है जिससे ढक कर मैं अदृश्य होता हूं ” । तब मुनिने मेघदेवताको बुलाकर
कन्यासे कहा-“पुत्रिके ! इसके निमित्त तुझे दू ?” । वह बोली । “-यह
कृष्णवर्ण जडात्मा है । सो इससे अधिक किसी प्रधानके निमित्त मुझे दो” ।
-तब मुनिने मेघसे पूछा-“भो मेघ ! तुझसे भी अधिक कोई है ?”। मेघने कहा
मुझसे भी अधिक वायुहै वायुसे हत हुआ मैं सहस्रधा हो जाता हूं”। यह सुनकर
मुनिने वायुको बुलाया । बोले भी-“पुत्रिके ! क्या यह वायु विवाहके निमित्त
तुझे अच्छा लगता है ?” वह बोली-“तात ! यह अधिक चपल है । सो इससे
अधिक कोई और बुलाओ”। मुनिने कहा-“वायो ! क्या कोई तुमसे भी
अधिक है ?”। वायुने कहा-“मुझसे अधिक पर्वत है जिससे निश्चल होकर बल-
वान् भी मैं धारित होता हूं” । तब मुनि पर्वतको बुलाकर कन्यासे बोले-
“पुत्रिके ! तुमको इसके निमित्त दू ?” । वह बोली-“तात ! यह कठिनात्मा
और निश्चल है, सो और किसीके निमित्त मुझे दो” । मुनिने पर्वतसे पूछा,-
“भो पर्वतराज ! कोई तुमसे भी अधिक है ?”। पर्वतने कहा-“मुझसे अधिक
मूषे हैं जो मेरे शरीरको बलसे विदीर्ण करते हैं”। तब मुनिने मुषकराजको
बुलाय उसे दिखाया और बोले-“पुत्रिके ! क्या इसके निमित्त तुझे दू यह-
मूषिकराज तुझको अच्छा लगता है ?” वह भी उसको देख यह स्वजातीय है
ऐसा मानकर पुलकावलीसे अलंकृत शरीरवाली उससे बोली,-“तात ! मुझे
मूषिका करके इसके निमित्त दो । जिससे अपनी जातिके योग्य गृहधर्मका अनु-
ष्ठान करूं” । तब वह भी अपने तपोबलसे उसे मूषिका करके उस ( मूषक-
राज ) को देते भये । इससे मैं कहता हू-
सूर्य्यं भर्तारमुत्सृज्य पर्जन्यं मारुतं गिरिम् ।
स्वजातिं मूषिका प्राप्ता स्वजातिर्दुरतिक्रमा ॥ २२१ ॥”
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