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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ११२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ११२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
दमनक आह-“अत एव अयं दोषः । उक्तञ्च-
दमनक बोला,-“इसीसे तो यह दोष है । कहाभी है-
यस्मिन्नेवाधिकं चक्षुरारोपयति पार्थिवः ।
अकुलीनः कुलीनो वा स श्रियो भाजनं नरः ॥ २६६ ॥
राजा जिसके ऊपर अधिक कृपादृष्टि करता है अकुलीन हो वा कुलीन वह
मनुष्य लक्ष्मीका भागी होता है ॥ २६६ ॥
अपरं केन गुणविशेषेण स्वामी सञ्जीवकं निर्गुणकमपि
निकटे धारयति?! अथ देव ! यदि एवं चिन्तयसि महाकायो
यमनेन रिपून् व्यापादयिष्यामि, तदस्मात् न सिध्यति,
यत्तोऽयं शष्पभोजी, देवपादानां पुनः शत्रवो मांसाशिनः ।
तत् रिपुसाधनमस्य साहाय्येन न भवति । तस्मादेनं दूष-
यित्वा हन्यताम्” इति । पिंगलक आह--
इस कारण कौनसे गुणसे स्वामी निर्गुण संजीवकको अपने निकट धारण
करते हो? सो देव ! यदि ऐसा विचारते हो कि,यह महाकायवान् है इसके द्वारा
शत्रुओंको मारूंगा सोभी इससे सिद्ध नहीं होता कारण कि, यह घासभक्षी और
श्रीमान्‌के चरणशत्रु मांसभक्षी हैं सो इसकी सहायतासे शत्रु साधन नहीं हो
सकता है सो इसको दूषित कर मारिये” । पिंगलक बोला-
“उक्तो भवति यः पूर्वं गुणवानिति संसदि ।
तस्य दोषो न वक्तव्यः प्रतिज्ञाभंगभीरुणा ॥ २६७ ॥
“यह गुणवान् है सभामे जिसके लिये ऐसा कहा है प्रतिज्ञाके भंगसे डरने-
वालेको उसके दोष कहने उचित नहीं हैं ॥ २६७ ॥
अन्यच्च-
और भी-
मया अस्य तव वचनेन अभयप्रदानं दत्तम् । तत्कथं
स्वयमेव व्यापादयामि। सर्वथा सञ्जीवकोऽयं सुहृदस्माकं
न तं प्रति कश्चित् मन्युरिति । उक्तञ्च-
मैंने तो तेरे वचनसे इसको अभय दिया है फिर कैसे स्वयं इसको मारूं। सब
प्रकार यह सञ्जीवक सुहृत् है हमारा कुछभी उस पर क्रोध नहीं है। कहा है कि-

भाषाटीकासमेतम् । ( ११३ )
इतः स दैत्यः प्राप्तश्रीनैत एवार्हति क्षयम् ।
विषवृक्षोऽपि संवर्द्धर्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतम् ॥ २६८ ॥
( तारकासुरसे पीडित उसके वधार्थी देवताओं प्रति ब्रह्माका वचन है ) कि,
वह दैत्य मुझसे ऐश्वर्य प्राप्त कर चुका है वधके योग्य नहीं है कारण कि, स्वयं
बढ़ाया हुआ विषवृक्षभी ( आप ) नहीं काटाजाता ॥ २६८ ॥
आदौ न वा प्रणयिनां प्रणयो विधेयो
दत्तोऽथवा प्रतिदिनं परिपोषणीयः ।
उत्क्षिप्य यत्क्षिपति तत्प्रकरोति लज्जां
भूमौ स्थितस्य पतनाद्भयमेव नास्ति ॥ २६९ ॥
प्रथम तो प्रणयिजनोंको प्रणय ( प्रेम ) नहीं करना चाहिये और करे तो
फिर प्रतिदिन उसका पालन करे जो करके छोड़ा जाता है वह लज्जा करताहै
कारण कि, पृथ्वीमे स्थितको गिरनेका भय नहीं है ॥ २६९ ॥
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः ।
अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते ॥ २७० ॥
जो उपकारियोंका भला करता है उसके उपकारीपनमें क्या गुणहै जो अप-
कारियोंमें साधु है सत्पुरुषोंने उसीको साधु कहा है ॥ २७० ॥
तद्द्रोहबुद्धेरपि मया अस्य न विरुद्धमाचरणीयम्” ।
दमनक आह-“स्वामिन् ! नैष राजधर्मो यद्द्रोहबुद्धेरपि
क्षम्यते । उक्तञ्च-
सो इस द्रोहबुद्धिपरभी मैं विरुद्ध आचरण नहीं करूंगा” । दमनक बोला,-
“स्वामिन् ! यह राजधर्म नहीं है कि, द्रोहबुद्धिको क्षमा किया जाय। कहाभी है-
तुल्यार्थं तुल्यसामर्थ्यं मर्मज्ञं व्यवसायिनम् ।
अर्द्धराज्यहरं भृत्यं यो न हन्यात्स हन्यते ॥ २७१ ॥
तुल्यधन, तुल्य सामर्थ्य, मर्म जाननेवाले उद्योगी अर्धराज हरनेवाले भृत्यको जो
'नहीं मारताहै वह मारा जाता है ॥ २७१ ॥
अपरं त्वया अस्य सखित्वात् सर्वोऽपि राजधर्मः परि-
त्यक्तो राजधर्माभावात सर्वोऽपि परिजनो विरक्तिं गतो यः
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