सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( २८० ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २८० ) पञ्चतन्त्रम् ।
विधात्रा रचिता या सा ललाटेऽक्षरमालिका ।
न तां मार्जयितुं शक्ताः स्वबुद्ध्याप्यतिपण्डिताः ॥१८४॥”
विधाताने जो अक्षरमाला मस्तकमें लिखदी है पंडित जन उसको अपनी
बुद्धिसे कोई मेट नहीं सकता है ॥ १८४ ॥”
एवं तयोः प्रवदतोः सुहृद्व्यसनसन्तप्तहृदयो मन्थरकः शनैः
शनैः तं प्रदेशमाजगाम । तं दृष्ट्वा लघुपतनको हिरण्यक-
माह-, “अहो ! न शोभनमापतितं” । हिरण्यक आह-
“किं स लुब्धकः समायाति ?” । स आह- “आस्तां तावत्
लुब्धकवार्त्ता । एष मन्थरकः समागच्छति । तत् अनीतिः
अनुष्ठिता अनेन यतो वयमपि अस्य कारणात् नूनं व्यापा-
दनं यास्यामो यदि स पापात्मा लुब्धकः समागमिष्यति,
तदहं तावत् खमुत्पतिष्यामि । त्वं पुनर्बिलं प्रविश्य आ-
त्मानं रक्षिष्यसि । चित्रांगोऽपि वेगेन दिगन्तरं यास्यति ।
एष पुनर्जलचरः स्थले कथं भविष्यति इति व्याकुलोऽस्मि” ।
अत्रान्तरे प्राप्तोऽयं मन्थरकः । हिरण्यक आह- “भद्र ! न
युक्तं अनुष्ठितं भवता, यदत्र समायातः तद् भूयोऽपि द्रुत-
तरं गम्यतां, यावत् असौ लुब्धको न समायाति” । मन्थरक
आह- “भद्र ! किं करोमि ? न शक्नोमि तत्रस्थो मित्रव्यस-
नाग्निदाहं सोढुम् । तेनाहमत्रागतः। अथवा साधु इदमुच्यते ।
इस प्रकार उन दोनोंके कथनमें मित्रके दुःखसे तापित हृदय मन्थरकभी
शनैः २ उस स्थानमें आया । उसे देख लघुपतनक हिरण्यकसे बोला,-
“अहो ! यह अच्छा न हुआ” हिरण्यक बोला,-“क्या वह लुब्धक आया ?” ।
वह बोला- “व्याधेकी बात तो रहने दो । यह मन्थरक आरहा है । सो अनु-
चित किया इसने, हम भी इसके कारणसे अवश्य नाशको प्राप्त होंगे यदि वह
पापात्मा लुब्धक आगया तो । सो मैं तो आकामें उड जाऊंगा, तू बिलमें
प्रवेश कर जायगा, चित्राङ्ग दिशान्तरमें पलायन कर जायगा, इस जलचरकी
स्थलमें क्या दशा होगी इस कारण मैं व्याकुल हो रहाहूं” । इसी समय मन्थरक
प्राप्त हुआ । हिरण्यक बोला-“भद्र आपने अच्छा नहीं किया, जो यहां आगये,

भाषाटीकासमेतम् । ( २८१ )
सो बहुत शीघ्रतासे चले जाओ जबतक वह लुब्धक न आवे" मन्थरक
बोला,—"भद्र मैं क्या करू ? वहा स्थित हुआ मैं मित्रके दुःखरूपी अग्नि-
दाह सहनेको समर्थ नहीं हू। इस कारणसे मैं यहा आगया । अथवा अच्छा
कहा है–
दयितजनविप्रयोगो वित्तवियोगश्च केन सह्याः स्युः ।
यदि सुमहौषधकल्पो वयस्यजनसंगमो न स्यात् ॥१८९॥
प्रिय जनोंका वियोग और धनका वियोग कौन सह सकता है। जो यह
महौषधिकी समान मित्र जनका सगम न हो ॥ १८९ ॥
वरं प्राणपरित्यागो न वियोगो भवादृशैः ।
प्राणा जन्मान्तरे भूयो न भवन्ति भवद्विधाः ॥ १९० ॥”
प्राण त्यागन करना अच्छा है परन्तु आपसरीखोंका वियोग अच्छा नहीं
है। प्राण तो जन्मान्तरमे भी हो सक्ते हैं परन्तु आपसरीखे सुहृद् नहीं
मिलते है ॥ १९० ॥”
एवं तस्य प्रवदत आकर्णपूरितशरासनो लुब्धकोऽपि
उपागतः, तं दृष्ट्वा मूषकेण तस्य स्नायुपाशस्तत्क्षणात् ख-
ण्डितः । अत्रान्तरे चित्रांगः सत्वरं पृष्ठमवलोकयन् प्रधा-
वितः । लघुपतनको वृक्षमारूढः । हिरण्यकश्च समीपवर्त्ति
बिलं प्रविष्टः, अथ असौ लुब्धको मृगगमनात् विषण्णवदनो
व्यर्थश्रमः तं मन्थरकं मन्दं मन्दं स्थलमध्ये गच्छन्तं दृष्टवान्
अचिन्तयच्च । “यद्यपि कुरंगो धात्रा अपहृतः तथापि अयं
कूर्म आहारार्थं सम्पादितः । तदद्य अस्य आमिषेण मे कुटु-
म्बस्य आहारनिवृत्तिः भविष्यति” एवं विचिन्त्य तं दर्भैः
संच्छाद्य धनुषि समारोप्य स्कन्धे कृत्वा गृहं प्रति प्रस्थितः,
अत्रान्तरे तं नीयमानमवलोक्य हिरण्यको दुःखाकुलः पर्य्य-
देवयत् । “कष्टं भोः ! कष्टमापतितम्–
इस प्रकार उनके वचन कहते कर्णपर्यन्त धनुष चढाये लुब्धक भी आया ।
उसको देखकर मूषकने उसके तातके बधन उसी क्षण छेदन कर दिये । उसी
समय चित्राग बहुत शीघ्र पीछे देखता हुआ धावमान हुआ । लघुपतनक पेड़

पर चढगया । हिरण्यक समीपवर्ती बिलमें प्रविष्ट हुआ । तब यह लुब्धक मृगके
गमनसे दुःखीमुख व्यर्थश्रम होनेसे उस मन्थरकको मन्द मन्द स्थलमें जाता
देखकर विचारने लगा । “यद्यपि विधाताने हरिणको हरण कर लिया है तथापि
यह कूर्म भोजनके निमित्त प्राप्त हुआ है । सो आज इसीके मांससे हमारे कुटु-
म्बकी आहारवृत्ति होगी” । ऐसा विचार उसको कुशोंसे बांधकर धनुषपर
आरोपण कर कंधेपर रख घरकी ओरको चला । इसी समय उसको ले जाता
हुआ देख हिरण्यक दुःखसे व्याकुल हो विलाप करने लगा । “भो ! बड़ा
कष्ट आपदा—
एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं
गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य ।
तावद्द्वितीयं समुपस्थितं मे
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ १९१ ॥
सागरकी समान जबतक एक दुःखके पारको प्राप्त नहीं होता हूं तबतक
दूसरा मुझे उपस्थित हुवाहै विपत्तिमें अनर्थकी प्राप्ती बहुत करके होती है॥१९१॥
तावदस्खलितं यावत्सुखं याति समे पथि ।
स्खलिते च समुत्पन्ने विषमञ्च पदे पदे ॥ १९२ ॥
तभीतक नहीं गिरता है जबतक समान मार्गमें गमन करता है और पतन
होनेमें पद पदमें विषम मार्गही उपस्थित होता है ॥ १९२ ॥
यन्नम्रं सरलञ्चापि तच्चापत्सु न सीदति ।
धनुर्मित्रं कलत्रं च दुर्लभं शुद्धवंशजम् ॥ १९३ ॥
जो नम्र और सरल है वह आपत्तिमें भी विकारको प्राप्त नहीं होता है,
पवित्र कुल ( शुद्धवंश ) से उत्पन्न धनु, मित्र और स्त्री दुर्लभ हैं ( यह आपदा में
भी विकृत नहीं होते ) ॥ १९३ ॥
न मातरि न दारेषु न सौदर्ये न चात्मजे ।
विश्रम्भस्तादृशः पुंसां यादृङ्मित्रे निरन्तरे ॥ १९४ ॥
माता, स्त्री, सगेभाई, पुत्रमें भी पुरुषका ऐसा विश्वास नहीं होता जैसा निरन्तर
मित्रमें होता है ॥ १९४ ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( २८३ )
यदि तावत् कृतान्तेन मे धननाशो विहितः तन्मार्ग-
श्रान्तस्य मे विश्रामभूतं मित्रं कस्मात् अपहृतम् ?
अपरमपि मित्रं परं मन्थरकसमं न स्यात् । उक्तञ्च-
जो दैवने मेरा धन नाश कर दिया है तो मार्गमें थके हुए मेरे विश्रामभूत
मित्रको क्यों हरण किया? और भी मन्थरककी समान कोई दुसरा मित्र न होगा।कहा है-
असम्पत्तौ परो लाभो गुह्यस्य कथनं तथा ।
आपद्विमोक्षणं चैव मित्रस्यैतत्फलत्रयम् ॥ १९५ ॥
निर्धनतामें धनका महान् लाभहै, गुह्य ( रहस्य ) बातका कथन और आपत्ति
दूरकरना यहही मित्रताके तीन फलहैं ॥ १९५ ॥
तदस्य पश्चान्नान्यः सुहृत् मे।तत् किं मम उपरि अन-
वरतं व्यसनशरैर्वर्षति हन्त विधिः ? यत आदौ ताव-
द्वित्तनाश, ततः परिवारभ्रंशः, ततो देशत्यागः, ततो
मित्रवियोग इति । अथवा स्वरूपमेतत् सर्वेषामेव
जन्तूनां जीवितधर्मस्य । उक्तंच-
सो इससे अधिक श्रेष्ठ मेरा और कोई मित्र नहीं है सो क्यो मेरे ऊपर निर-
न्तर दुःखरूपी बाणोंकी वर्षा विधाता करताहै ? ( हन्त ) खेदहै । जो आदिमें
धनका नाश, फिर परिवारभ्रंश, फिर देशत्याग, पीछे मित्रवियोग हुआ । अथवा
सम्पूर्ण जन्तुओंको जीवित धर्मका यह लक्षणहीह । कहाहै-
कायः सन्निहितांपायः सम्पदः क्षणभंगुराः ।
समागमाः सापगमाः सर्वेषामेव देहिनाम् ॥ १९६ ॥
शरीर क्षणमात्रमें विध्वंस होनेवाला है, सम्पत्ति क्षणमात्रमे नाश होनेवाली
हैं, सम्पूर्ण देहधारियोंके संयोग वियोगवाले हैं ॥ १९६ ॥
तथाच-
तैसेही-
क्षते प्रहारा निपतन्त्यभीक्ष्णं
धनक्षये दीव्यति जाठराग्निः ।
आपत्सु वैराणि समुल्लसन्ति
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ १९७ ॥