सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 298

भाषाटीकासमेतम् । ( २८३ )
यदि तावत् कृतान्तेन मे धननाशो विहितः तन्मार्ग-
श्रान्तस्य मे विश्रामभूतं मित्रं कस्मात् अपहृतम् ?
अपरमपि मित्रं परं मन्थरकसमं न स्यात् । उक्तञ्च-
जो दैवने मेरा धन नाश कर दिया है तो मार्गमें थके हुए मेरे विश्रामभूत
मित्रको क्यों हरण किया? और भी मन्थरककी समान कोई दुसरा मित्र न होगा।कहा है-
असम्पत्तौ परो लाभो गुह्यस्य कथनं तथा ।
आपद्विमोक्षणं चैव मित्रस्यैतत्फलत्रयम् ॥ १९५ ॥
निर्धनतामें धनका महान् लाभहै, गुह्य ( रहस्य ) बातका कथन और आपत्ति
दूरकरना यहही मित्रताके तीन फलहैं ॥ १९५ ॥
तदस्य पश्चान्नान्यः सुहृत् मे।तत् किं मम उपरि अन-
वरतं व्यसनशरैर्वर्षति हन्त विधिः ? यत आदौ ताव-
द्वित्तनाश, ततः परिवारभ्रंशः, ततो देशत्यागः, ततो
मित्रवियोग इति । अथवा स्वरूपमेतत् सर्वेषामेव
जन्तूनां जीवितधर्मस्य । उक्तंच-
सो इससे अधिक श्रेष्ठ मेरा और कोई मित्र नहीं है सो क्यो मेरे ऊपर निर-
न्तर दुःखरूपी बाणोंकी वर्षा विधाता करताहै ? ( हन्त ) खेदहै । जो आदिमें
धनका नाश, फिर परिवारभ्रंश, फिर देशत्याग, पीछे मित्रवियोग हुआ । अथवा
सम्पूर्ण जन्तुओंको जीवित धर्मका यह लक्षणहीह । कहाहै-
कायः सन्निहितांपायः सम्पदः क्षणभंगुराः ।
समागमाः सापगमाः सर्वेषामेव देहिनाम् ॥ १९६ ॥
शरीर क्षणमात्रमें विध्वंस होनेवाला है, सम्पत्ति क्षणमात्रमे नाश होनेवाली
हैं, सम्पूर्ण देहधारियोंके संयोग वियोगवाले हैं ॥ १९६ ॥
तथाच-
तैसेही-
क्षते प्रहारा निपतन्त्यभीक्ष्णं
धनक्षये दीव्यति जाठराग्निः ।
आपत्सु वैराणि समुल्लसन्ति
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ १९७ ॥