पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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सञ्जीवकके साथ अनेक शास्त्रके अवगाहनसे बुद्धिकी प्रगल्भता अधिक
होनेके कारण थोडेही दिनोंमें उसने मूढमति पिंगलक इस प्रकार बुद्धिमान् कर
दिया कि, वनके धर्मोंसे पृथक् कर ग्राम्य धर्ममें लगादिया । बहुत कहनेसे क्या
प्रतिदिन संजीवक और पिंगलकही केवल एकान्तमें सम्मति करते, शेष सम्पूर्ण
मृगजन दूरस्थित रहते, करटक दमनकको भी प्रवेश न मिलता । और सिंहके
पराक्रम न करनेके कारण सम्पूर्ण मृग और वे दोनों शृगाल क्षुधारूप रोगसे
व्यथित हुए एक दिशामें आश्रित हो स्थितहुए । कहा है-
फलहीनं नृपं भृत्याः कुलीनमपि चोन्नतम् ।
सन्त्यज्यान्यत्र गच्छन्ति शुष्कं वृक्षमिवान्डजाः ॥ १६३ ॥
भृत्यजन फलहीन कुलीन और उन्नत राजाकोभी छोड़कर अन्यत्र चले
जाते हैं, जैसे शुष्क वृक्षको पक्षी ॥ १६३ ॥
तथाच-
तैसेही-
अपि सम्मानसंयुक्ताः कुलीना भक्तितत्पराः ।
वृत्तिभंगान्महीपालं त्यजन्त्येव हि सेवकाः ॥ १६४ ॥
सन्मानसेभी संयुक्त कुलीन भक्तिमे तत्पर सेवकभी आजीविका न मिलनेसे
स्वामीको त्याग देते हैं ॥ १६४ ॥
अन्यच्च-
औरभी-
कालातिक्रमणं वृत्तेर्यो न कुर्वीत भूपतिः ।
कदाचित्तं न मुञ्चन्ति भर्त्सिता अपि सेवकाः ॥ १६५ ॥
जो राजा मासिक देनेका कालातिक्रम नहीं करता है उसको धुड़कनेसेभी
सेवक कभी नहीं त्यागते हैं ॥ १६५ ॥
तथा न केवलं सेवका इत्थम्भूता यावत् समस्तमपि एत-
ज्जगत् परस्परं भक्षणार्थं सामादिभिरुपायैस्तिष्ठति । तद्यथा-
इस प्रकारसे सेवक सम्पूर्ण जगत्को परस्पर भक्षणके निमित्त सामादि उप-
योंसे स्थित रहते हैं । सो ऐसे कि-