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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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आवां तावदप्रधानतां गतौ। एष पिंगलकः सञ्जीवकानुरक्तः
स्वव्यापारपराङ्मुखः सञ्जातः । सर्वोऽपि परिजनो गतः।
तत्किं क्रियते" । करटक आह--“यद्यपि त्वदीव्यवचनं न
करोति तथापि स्वामी स्वदोषनाशाय वाच्यः । उक्तञ्च--
सो स्वामीके प्रसादसे रहित भूखसे दुर्बल करटक और दमनक सम्मति करने
लगे । दमनक बोला--“आर्य्य करटक ! हम तो अब अप्रधानताको प्राप्तहुए और
यह पिंगलक संजीवकमें अनुरक्त होकर अपने कार्यसे विमुख हुआ । सब परिजन
चलेगये अब क्या करें” । करटक बोला--“यद्यपि आपके वचन नहीं मानता
तथापि अपने दोष नाशके लिये स्वामीसे कहना उचितहै । कहाहै कि--
अशृण्वन्नपि बोद्धव्यो मंत्रिभिः पृथिवीपतिः ।
यथा स्वदोषनाशाय विदुरेणाम्बिकासुतः ॥ १७१ ॥
मंत्रियोंको राजा न सुनतेहुएभी समझाना चाहिये जैसे विदुरने धृतराष्ट्र-
को अपने दोष नाश करनेके लिये समझाया था ॥ १७१ ॥
तथाच--
और देखो--
मदोन्मत्तस्य भूपस्य कुञ्जरस्य च गच्छतः ।
उन्मार्गं वाच्यतां यान्ति महामात्राः समीपगाः ॥ १७२ ॥
मदोन्मत्त राजा और हाथीके उन्मार्ग जानेमें उनके समीपी और महावत
वाच्यता ( निन्दा )को प्राप्त होते ह ॥ १७२ ॥
तत् त्वया एष शष्पभोजी स्वामिनः सकाशमानीतस्त-
त्स्वहस्तेन अङ्गाराः कर्षिताः”। दमनक आह--“सत्यमेतत ।
ममायं दोषो स्वामिनः । उक्तञ्च-
सो तैने यह घास खानेवाला स्वामीके निकट प्राप्त किया सो अपने हाथसे ही
तैने अंगारा खेंचा”दमनक बोला--“यह सत्य है इसमे मेरा दोषहै स्वामीका
नहीं । कहाहै--
जम्बूको हुडुयुद्धेन वयं चाषाढभूतिना ।
दूतिका परकार्य्येण त्रयो दोषाः स्वयंकृताः ॥ १७३ ॥”
हुडु ( जीवविशेष ) से जम्बूक और आषाढभूतिसे हम दूसरेके कार्यसे
दूती यह तीनों अपने दोषसे (दूषित हुए ) ॥ १७३ ॥'