सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 345

( ३३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
हुए उसके महाकाय होनेसे दैव वशसे लघु विवर होनेसे उसके शरीरमें ( छिल-
नेसे ) व्रण होगये । तब व्रणके और शोणितकी गन्धके अनुसरण करनेवाली
चींटियोंने सबओरसे व्याप्त कर उसको व्याकुल करादिया । किनको मारे किनको
ताडन करे । तब उनके अधिक होनेसे व्रण बढगये सर्वाङ्गमें घाव होनेसे अति-
दर्प पंचत्वको प्राप्त होगया । इससे मैं कहता हूं कि-
“ बहवो न विरोद्धव्या दुर्जया हि महाजनाः ।
स्फुरन्तमपि नागेन्द्रं भक्षयन्ति पिपीलिकाः ॥ १२४ ॥”
“बहुतोंके साथ विरोध न करै महाजन दुर्जय होते हैं चीटियां तेजस्वी सर्प-
को भक्षण करगईं ॥ १२४ ॥”
तन्न अत्रास्ति किञ्चित् मे वक्तव्यमेव । तदवधार्य्य यथोक्त-
मनुष्ठीयताम्”। मेघवर्ण आह-“तत् समादिशय-तवादेशो
नान्यथा कर्त्तव्यः”। स्थिरजीवी प्राह-“ वत्स ! समाकर्णय
तर्हि सामादीनतिक्रम्य यो मया पञ्चम उपायो निरूपितः।
तन्मां विपक्षभूतं कृत्वा, अतिनिष्ठुरवचनैः निर्भर्त्स्य, यथा
विपक्षप्रणिधीनां प्रत्ययो भवति, तथा समाहतरुधिरैः आ-
लिप्य, अस्यैव न्यग्रोधस्य अधस्तात् प्रक्षिप्य मां गम्यतां
पर्वतम् ऋष्यमूकं प्रति, तत्र सपरिवारस्तिष्ठ । यावदहं सम-
स्तान् सपत्नान् सुप्रणीतेन विधिना विश्वास्य अभिमुखान्
कृत्वा कृतार्थो ज्ञातदुर्गमध्यः दिवसे तान् अन्धतां प्राप्तान्
ज्ञात्वा व्यापादयामि, ज्ञातं मया सम्यक्, नान्यथा अस्माकं
सिद्धिरिति । यतो दुर्गमेतत् अपसाररहितं केवलं वधाय
भविष्यति । उक्तञ्च यतः ।
“सो इस विषयमें मुझे कुछ वक्तव्य है । सो यह निश्चय करके यथोक्त अनुष्ठान
करो”। मेघवर्ण बोला-“तुम्हारा आदेश अन्यथा नही होगा”। स्थिरजीवी बोला-
“वत्स ! सुनो जो सामादि उपायोको छोड़कर मैंने पांचवा उपाय निरूपण किया
है । तू मुझे अपना शत्रुरूप कर निठुर बचनोंसे धुडक जिससे शत्रुपक्षी दूतोंके
विश्वास होजाय । और कहींसे लाये हुए रुधिरसे आलितकर इसी न्यग्रोधके नीचे