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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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सुमधुर संधि की इच्छा करनेवाले शत्रुसे भी संधि न करे क्योंकि तत्ता
पानी भी अग्निको शान्त ही कर देता है ॥ २३ ॥
अपरं च स क्रूरोऽत्यन्तलुब्धो धर्मरहितः । तत् त्वया
विशेषात् न सन्धेयः । उक्तञ्च यतः-
और भी वह क्रूर अत्यन्त लोभी धर्मरहित है विशेषकर सन्धिके योग्य
नहीं। कारण कहा है-
सत्यधर्मविहीनेन न सन्दध्यात्कथञ्चन ।
सुसन्धितोऽप्यसाधुत्वादचिराद्याति विक्रियाम् ॥ २४ ॥
सत्य धर्मसे हीनके साथ कभी सन्धि नहीं करनी चाहिये अच्छी प्रकार संधी
किया हुआ असाधु होनेसे शीघ्र विकारको प्राप्त होता है ॥ २४ ॥
तस्मात् तेन सह योद्धव्यमिति मे मतिः । उक्तञ्च यतः-
इस कारण उसके साथ युद्ध करना चाहिये ऐसी मेरी मति है। कहा है कि-
क्रूरो लुब्धोऽलसोऽसत्यः प्रमादी भीरुरस्थिरः ।
मूढो युद्धावमन्ता च सुखोच्छेद्यो भवेद्रिपुः ॥ २५ ॥
खोटा, लोभी, आलसी, असत्यवादी, प्रमादी, डरपोक, चंचल, मूढ, युद्धमें
उत्साह न करनेवाला शत्रु सुखसे नाशके योग्य होता है ॥ २५ ॥
अपरं तेन पराभूता वयम् । तद्यदि सन्धानकीर्त्तनं करि-
ष्यामः स भूयोऽत्यन्तं कोपं करिष्यति । उक्तञ्च-
और उसने हमारा तिरस्कार किया है। सो यदि संधि होनेकी बात करेंगे-
तो वह फिर अत्यन्त क्रोध करेगा। कहा है-
चतुर्थोपायसाध्ये तु रिपौ सान्त्वमपक्रिया ।
स्वेद्यमामज्वरं प्राज्ञः कोऽम्भसा परिषिञ्चति ॥ २६ ॥
जो शत्रु चौथे उपाय (युद्ध) से साध्य होनेके योग्य हो उससे साम प्रयोग
करना कोपवृद्धिका कारण है, पसीनेसे साध्य नवीन ज्वरको कौन बुद्धिमान्
जलसे सींचता है ? ॥ २६ ॥
सामवादाः सकोपस्य शत्रोः प्रत्युत दीपकाः ।
प्रतप्तस्येव सहसा सर्पिषस्तोयबिन्दवः ॥ २७ ॥
क्रोधित शत्रुसे साम वचन कहना उसके क्रोधका बढाना है, और तप्ते
घृतमें एक साथ जल बिन्दु डालनेकी समान है ॥ २७ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२९५)
यदेव एतद्वदति रिपुर्बलवान् तदप्यकारणम्। उक्तञ्च यतः-
जो ऐसा है यह कहते हैं कि शत्रु बलवान् है यहभी अकारण है। कहा है कि-
सोत्साहशक्तिसम्पन्नो हन्याच्छत्रुं लघुर्गुरुम् ।
यथा कण्ठीरवो नागे सुसाम्राज्यं प्रपद्यते ॥ २८ ॥
उत्साह शक्तिसे सम्पन्न क्षुद्र मनुष्यभी बडे शत्रुको मार सकता है, जैस
छोटे देहवाला सिंह बडे देहवाले हाथीपर स्वामित्व कर लेता है ॥ २८ ॥
मायया शत्रवो वध्या अवध्याः स्युर्बलेन ये ।
यथा स्त्रीरूपमास्थाय हतो भीमेन कीचकः ॥ २९ ॥
जो शत्रु वलसे अवध्यहो तो मायासे उनको वशमें करे जैसे स्त्रीरूप धारण
कर भीमसेनने कीचकको मारा ॥ २९ ॥
तथाच-
तैसेही-
मृत्योरिवोग्रदण्डस्य राज्ञो यान्ति वशं द्विषः ।
शष्पतुल्यं हि मन्यन्ते दयालुं रिपवो नृपम् ॥ ३० ॥
मृत्युकी समान उग्रदण्डवाले राजाके वशमें शत्रु होजाते हैं और दयालु राजाको
शत्रु तृणकी समान मानते हैं ॥ ३० ॥
न याति शमनं यस्य तेजस्तेजस्वितेजसा ।
वृथा जातेन किं तेन मातर्यौवनहारिणा ॥ ३१ ॥
जिसके तेजस्वी तेजसे तेजशत्रुका तेज शान्त नहीं होजाता है उस माताके
यौवन हरनेवालेको वृथा उत्पन्न होनेसे क्या लाभ है? ॥ ३१ ॥
या लक्ष्मीर्नानुलिप्तांगी वैरिशोणितकुंकुमैः ।
कान्तापि मनसः प्रीतिं न सा धत्ते मनस्विनाम् ॥ ३२ ॥
जो लक्ष्मी शत्रुओंके रुधिररूपी कुमकुमसे अनुलिप्त अंगवाली नहीं है वह
मनोहर होकरभी वीरोंके मनको आनंद नहीं देती ॥ ३२ ॥
रिपुरक्तेन संसिक्तारिस्त्रीनेत्राम्बुभिस्तथा ।
न भूमिर्यस्य भूपस्य का श्लाघा तस्य जीवने ॥ ३३ ॥”
शत्रुके रुधिरसे तथा शत्रुओंकी स्त्रियोंके नेत्रोंके जलसे जिस राजाकी भूमि
नहीं सींची गई उसके जीनेसे क्या श्लाघा है ॥ ३३ ॥”