पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२९५)
यदेव एतद्वदति रिपुर्बलवान् तदप्यकारणम्। उक्तञ्च यतः-
जो ऐसा है यह कहते हैं कि शत्रु बलवान् है यहभी अकारण है। कहा है कि-
सोत्साहशक्तिसम्पन्नो हन्याच्छत्रुं लघुर्गुरुम् ।
यथा कण्ठीरवो नागे सुसाम्राज्यं प्रपद्यते ॥ २८ ॥
उत्साह शक्तिसे सम्पन्न क्षुद्र मनुष्यभी बडे शत्रुको मार सकता है, जैस
छोटे देहवाला सिंह बडे देहवाले हाथीपर स्वामित्व कर लेता है ॥ २८ ॥
मायया शत्रवो वध्या अवध्याः स्युर्बलेन ये ।
यथा स्त्रीरूपमास्थाय हतो भीमेन कीचकः ॥ २९ ॥
जो शत्रु वलसे अवध्यहो तो मायासे उनको वशमें करे जैसे स्त्रीरूप धारण
कर भीमसेनने कीचकको मारा ॥ २९ ॥
तथाच-
तैसेही-
मृत्योरिवोग्रदण्डस्य राज्ञो यान्ति वशं द्विषः ।
शष्पतुल्यं हि मन्यन्ते दयालुं रिपवो नृपम् ॥ ३० ॥
मृत्युकी समान उग्रदण्डवाले राजाके वशमें शत्रु होजाते हैं और दयालु राजाको
शत्रु तृणकी समान मानते हैं ॥ ३० ॥
न याति शमनं यस्य तेजस्तेजस्वितेजसा ।
वृथा जातेन किं तेन मातर्यौवनहारिणा ॥ ३१ ॥
जिसके तेजस्वी तेजसे तेजशत्रुका तेज शान्त नहीं होजाता है उस माताके
यौवन हरनेवालेको वृथा उत्पन्न होनेसे क्या लाभ है? ॥ ३१ ॥
या लक्ष्मीर्नानुलिप्तांगी वैरिशोणितकुंकुमैः ।
कान्तापि मनसः प्रीतिं न सा धत्ते मनस्विनाम् ॥ ३२ ॥
जो लक्ष्मी शत्रुओंके रुधिररूपी कुमकुमसे अनुलिप्त अंगवाली नहीं है वह
मनोहर होकरभी वीरोंके मनको आनंद नहीं देती ॥ ३२ ॥
रिपुरक्तेन संसिक्तारिस्त्रीनेत्राम्बुभिस्तथा ।
न भूमिर्यस्य भूपस्य का श्लाघा तस्य जीवने ॥ ३३ ॥”
शत्रुके रुधिरसे तथा शत्रुओंकी स्त्रियोंके नेत्रोंके जलसे जिस राजाकी भूमि
नहीं सींची गई उसके जीनेसे क्या श्लाघा है ॥ ३३ ॥”