पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
(६०) पञ्चतन्त्रम् ।
(६०) पञ्चतन्त्रम् ।
देकर मैं इसका शिष्यबनूं, जिससे यह विश्वासको प्राप्तहुआ कदाचित् मेरे
विश्वासमें आजाय । कहाहै-
निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः ।
नाविदग्धः प्रियं ब्रूयात्स्फुटवक्ता न वञ्चकः ॥ १७५ ॥”
निस्पृह अधिकारी नहीं होता, अकामी श्रृंगारप्रिय नहीं होता, मूर्ख कभी
प्रिय नहीं बोलसकता, साफ कहनेवाला ठग नहीं होता ॥ १७५ ॥”
एवं निश्चित्य तस्यान्तिकमुपगम्य “ॐनमः शिवायति”
प्रोच्चार्य साष्टांगं प्रणम्य च सप्रश्रयमुवाच-“भगवन् ! अ-
सारः संसारोऽयं, गिरिनदीवेगोपमं यौवनं, तृणाग्निसमं जी-
वितम्, शरदभ्रच्छायासदृशा भोगाः, स्वप्नसदृशो मित्रपुत्र-
कलत्रभृत्यवर्गसम्बन्धः । एवं मया सम्यक् परिज्ञातम् । तत्
किं कुर्वतो मे संसारसमुद्रोत्तरणं भविष्यति”। तच्छ्रुत्वा देव-
शर्मा सादरमाह- “वत्स ! धन्योऽसि यत्प्रथमे वयसि एवं
विरक्तिभावः । उक्तञ्च-
यह विचारकर उसके समीप जाय “ॐ नमः शिवाय” यह उच्चारणकर
साष्टांग प्रणाम कर नम्रतासे बोला-“भगवन् ! यह असार संसार है, गिरिन-
दीके वेगकी समान यौवन है, तृणकी अग्निकी समान जीवन है, शरदके मेघकी
समान भोगहैं, स्वप्नकी समान मित्र, पुत्र, कलत्र (स्त्री) वर्गका सम्बन्धहै, यह मैंने
भली प्रकार जान लिया सो क्या करनेसे मैं संसारसागरके पार हूंगा” यह
सुन देवशर्मा आदरसे बोला-“हे पुत्र ! धन्य है जो पहली अवस्थामें ही तुझको
यह विरक्तता उत्पन्न हुईहै । कहाहै-
पूर्वे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मे मतिः ।
धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते ॥ १७६ ॥
जो प्रथम अवस्थामें शान्तहै वही शान्त है ऐसा मैं मानताहूं और धातुओंके
क्षीण होनेमें कौन शान्त नहीं होताहै ॥ १७६ ॥
आदौ चित्ते ततः काये सतां सम्पद्यते जरा ।
असतान्तु पुनः काये नैव चित्ते कदाचन ॥ १७७ ॥
जरा सत्पुरुषोंके पहले चित्तमें, पीछे कायामें प्रवृत्त होतीहै, जरा अशान्तोंके
शरीरमें प्राप्तहोकरभी चित्तमें नहीं होती ॥ १७७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ॰ ( ६१) ,
यच्च मां संसारसागरोत्तरणोपायं पृच्छसि तच्छ्रूयताम् ।
और जो मुझसे संसारसागरसे पार होनेका उपाय पूछताहै, तो सुन—
शूद्रो वा यदि वान्योऽपि चण्डालोऽपि जटाधरः ।
दीक्षितः शिवमन्त्रेण स भस्माङ्गी शिवो भवेत् ॥ १७८ ॥
शूद्र अथवा कोई अन्य चाण्डाल वा जटाधारी कोईहो शिवमन्त्रस दीक्षित
हो शरीरमें भस्म लगानेसे शिव होजाताहै ॥ १७८ ॥
षडक्षरेण मन्त्रेण पुष्पमेकमपि स्वयम् ।
लिंगस्य मूर्ध्नि यो दद्यान्न स भूयोऽभिजायते ॥ १७९ ॥
जो षडक्षरमंत्रसे एकभी फूल शिवलिंगपर चढाताहै उसका फिर जन्म नहीं
होताहै ॥ १७९ ॥
तच्छ्रुत्वा आषाढभूतिस्तत्पादौ गृहीत्वा सप्रश्रयमिदमाह-
"भगवन् ! तर्हि दीक्षया मे अनुग्रहं कुरु" । देवशर्मा आह-
"वत्स ! अनुग्रहं ते करिष्यामि परन्तु रात्रौ त्वया मठमध्ये न
प्रवेष्टव्यं यत्कारणं निःसङ्गता यतीनां प्रशस्यते तव च ममापि,
च । उक्तञ्च-
यह सुन आषाढभूति उसके चरणोंको ग्रहणकर आदरसे यह बोला-“भग-
वन् ! तो दीक्षा कर मेरे ऊपर अनुग्रहकरो"। देवशर्मा बोला-“वत्स ! तेरे
ऊपर मैं अनुग्रह करूंगा, परन्तु रात्रिमें तू मठमे प्रवेश न करना कारण यह है
कि, यतियोंकी निस्संगताही प्रशंसनीयहै सो तुम्हारी और मेरीभी । कहाहै-
दुर्मन्त्रान्नृपतिर्विनश्यति यतिः सङ्गात्सुतो लालनाद्
विप्रोऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् ।
मैत्री चाप्रणयात्समृद्धिरनयात्स्नेहः प्रवासाश्रयात्
स्त्री गर्वादनवेक्षणादपि कृषिस्त्यागात्प्रमादाद्धनम् ॥१८०॥
दुर्मन्त्रसे राजा नष्ट होता है, संगसे यति, लाडसे पुत्र, न पढनेसे ब्राह्मण,
कुपुत्रसे कुल, दुष्टोंके संगसे शील, अप्रणयसे मित्रता, अनयसे समृद्धि, परदेशमें
रहनेसे स्नेह, गर्वसे स्त्री, न देखनेसे खेती, त्याग और प्रमादसे धन नष्ट-
होताहै ॥ १८० ॥