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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

भाषाटीकासमेतम् । ॰ ( ६१) ,
यच्च मां संसारसागरोत्तरणोपायं पृच्छसि तच्छ्रूयताम् ।
और जो मुझसे संसारसागरसे पार होनेका उपाय पूछताहै, तो सुन—
शूद्रो वा यदि वान्योऽपि चण्डालोऽपि जटाधरः ।
दीक्षितः शिवमन्त्रेण स भस्माङ्गी शिवो भवेत् ॥ १७८ ॥
शूद्र अथवा कोई अन्य चाण्डाल वा जटाधारी कोईहो शिवमन्त्रस दीक्षित
हो शरीरमें भस्म लगानेसे शिव होजाताहै ॥ १७८ ॥
षडक्षरेण मन्त्रेण पुष्पमेकमपि स्वयम् ।
लिंगस्य मूर्ध्नि यो दद्यान्न स भूयोऽभिजायते ॥ १७९ ॥
जो षडक्षरमंत्रसे एकभी फूल शिवलिंगपर चढाताहै उसका फिर जन्म नहीं
होताहै ॥ १७९ ॥
तच्छ्रुत्वा आषाढभूतिस्तत्पादौ गृहीत्वा सप्रश्रयमिदमाह-
"भगवन् ! तर्हि दीक्षया मे अनुग्रहं कुरु" । देवशर्मा आह-
"वत्स ! अनुग्रहं ते करिष्यामि परन्तु रात्रौ त्वया मठमध्ये न
प्रवेष्टव्यं यत्कारणं निःसङ्गता यतीनां प्रशस्यते तव च ममापि,
च । उक्तञ्च-
यह सुन आषाढभूति उसके चरणोंको ग्रहणकर आदरसे यह बोला-“भग-
वन् ! तो दीक्षा कर मेरे ऊपर अनुग्रहकरो"। देवशर्मा बोला-“वत्स ! तेरे
ऊपर मैं अनुग्रह करूंगा, परन्तु रात्रिमें तू मठमे प्रवेश न करना कारण यह है
कि, यतियोंकी निस्संगताही प्रशंसनीयहै सो तुम्हारी और मेरीभी । कहाहै-
दुर्मन्त्रान्नृपतिर्विनश्यति यतिः सङ्गात्सुतो लालनाद्
विप्रोऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् ।
मैत्री चाप्रणयात्समृद्धिरनयात्स्नेहः प्रवासाश्रयात्
स्त्री गर्वादनवेक्षणादपि कृषिस्त्यागात्प्रमादाद्धनम् ॥१८०॥
दुर्मन्त्रसे राजा नष्ट होता है, संगसे यति, लाडसे पुत्र, न पढनेसे ब्राह्मण,
कुपुत्रसे कुल, दुष्टोंके संगसे शील, अप्रणयसे मित्रता, अनयसे समृद्धि, परदेशमें
रहनेसे स्नेह, गर्वसे स्त्री, न देखनेसे खेती, त्याग और प्रमादसे धन नष्ट-
होताहै ॥ १८० ॥