पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ५१६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ५१६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
किं पारिजातहरिचन्दनतरुसम्भवं किं वा किञ्चित् अमृत-
मयफलम् अव्यक्तेनापि विधिना पतितम्”। एवं तस्य ब्रुवतो
द्वितीयमुखेन अभिहितम्,-“भो ! यदि एवं तत् ममापि
स्तोकं प्रयच्छ येन जिह्वासौख्यम् अनुभवामि”। ततो विह-
स्य प्रथमवक्त्रेण अभिहितम्,-“आवयोः तावदेकं उदरं एका
तृप्तिश्च भवति । ततः किं पृथग्भक्षितेन, वरमनेन शेषेण
प्रिया तोष्यते”। एवं अभिधाय तेन शेषं भारण्ड्याः प्रदत्तं
सापि तत् अस्वाद्य प्रहृष्टतमा आलिङ्गनचुम्बनसम्भावनाने-
कचाटुपरा बभूव । द्वितीयं मुखं तद्दिनादेव प्रभृति सोद्वेगं
सविषादञ्च तिष्ठति । अथ अन्येद्युः द्वितीयमुखेन विषफलं
प्राप्तम् । तद् दृष्ट्वा अपरमाह,-“भो! नित्रिंश पुरुषाधम निर-
पेक्ष ! मया विषफलम् आसादितम्। तत् तवापमानात् भक्षया-
मि”। अपरेण अभिहितम्,-“मूर्ख ! मा मा एवं कुरु, एवं
कृते द्वयोरपि विनाशो भविष्यति”। अथ एवं वदता तेन
अपमानेन फलं भक्षितं किं बहुना, द्वौ अपि विनष्टौ ।
अतोऽहं ब्रवीमि,–
किसी सरोवरमें भारण्ड नामवाला पक्षी एक उदर और दो शिरवाला रहता
था। उसने सागरके किनारे घूमते हुए कोई फल अमृतकी समान तरङ्गोंसे
फेंका हुआ प्राप्त किया वह भी उसे भक्षण करता यह बोला,-“अहो! बहुतसे
मैंने अमृतकी समान सागरकी लहरसे क्षिप्त हुए फल खाये हैं परन्तु इसका
स्वाद अपूर्व है । सो क्या पारिजात हरिचन्दनके वृक्षसे उत्पन्न हुआ है ? क्या
कोई अमृतमय फल ? वा मेरी अच्छी विधिसे प्राप्त हुआ है”। इस प्रकार उसके
कहनेसे उसके दूसरे मुखने कहा,-“भो ! यदि ऐसा है तो मुझे भी थोडासा दो
जिससे जिह्वाका सुख अनुभव करूंगा”। तब हँसकर प्रथम मुखने कहा-“हम
दोनोंका एकही उदर है एकही तृप्ति होती है। सो पृथक् भक्षण करनेसे क्या
है इस शेषसे प्रियाको सन्तुष्ट करेंगे”। ऐसा कहकर उसने शेष भारण्डीको
दिया। वहभी उसको खाकर प्रसन्न मनसे आलिंगन चुम्बनकी सम्भावनासे अनेक
चाटु वचन कहती हुई। दूसरा मुख उसी दिन लेकर उद्वेग और विषाद युक्त
रहने लगा। तब और दिन दूसरे मुखने एक विष फल पाया । उसको देखकर
भाषाटीकासमेतम्। (५१७)
दूसरेसे बोला,-"हे निष्ठुर पुरुषोंमें नीच ! दूसरेके सुखकी अपेक्षासे रहित ! मैंने
विषफल पाया है । सो तेरे अपमानसे खाता हूँ"। दूसरेने कहा-"मूर्ख ! ऐसा मत
करे । ऐसा करनेसे दोनोंहीका नाश होगा"। तब ऐसा कहनेपरभी उसने अपमानसे
फल खा लिया ! बहुत कहनेसे क्या दोनोंही नष्ट हुए । इससे मैं कहता हूँ-
एकोदराः पृथग्ग्रीवा अन्योन्यफलभक्षिणः ।
असंहता विनश्यन्ति भारण्डा इव पक्षिणः ॥ १०२ ॥"
कि एक उदर पृथक् मुख परस्पर फलभक्षणकी इच्छावाले विना मेलके
भारण्ड पक्षीकी समान नष्ट होते हैं ॥ १०२ ॥"
चक्रधर आह,-"सत्यमेतत् । तद्गच्छ गृहम्, परमेकाकिना
न गन्तव्यम् । उक्तञ्च,-
चक्रधर बोला,-"यह सत्य है । सो घरको जाओ । परन्तु इकले न जाना ।
कहा है-
- एकः स्वादु न भुञ्जीत नैकः सुप्तेषु जागृयात् ।
एको न गच्छेदध्वानं नैकश्चार्थान् प्रचिन्तयेत् ॥ १०३ ॥
स्वादु पदार्थ इकला न खाय, सोते हुओंमें इकला न जागे इकला मार्गमें न
जाय और इकलाही कार्यको न विचारे ॥ १०३ ॥
अपिच-
औरभी-
अपि कापुरुषो मार्गे द्वितीयः क्षेमकारकः ।
कर्कटेन द्वितीयेन जीवितं परिरक्षितम् ॥ १०४ ॥
मार्गमें दूसरे कायर पुरुषकोभी साथ ले जानेसे हित होता है, जैसे दूसरे सङ्गी
कर्कटने जीवनकी रक्षा की ॥ १०४ ॥"
सुवर्णसिद्धिः आह,-"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्,-
स्वर्णसिद्धि बोला,-"यह कैसे ?" चक्रधर बोला,-
कथा १५.
कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने ब्रह्मदत्तनामा ब्राह्मणः प्रतिवसति
स्म, स च प्रयोजनवशात् ग्रामे प्रस्थितः स्वमात्रा अभिहि-
तः-"यत् वत्स ! कथमेकाकी व्रजसि ? तदन्विष्यतां कश्चित्
द्वितीयः । सहायः स आह,-"अम्ब ! मा भैषीः । निरुत्पद्र-