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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। (५१७)
दूसरेसे बोला,-"हे निष्ठुर पुरुषोंमें नीच ! दूसरेके सुखकी अपेक्षासे रहित ! मैंने
विषफल पाया है । सो तेरे अपमानसे खाता हूँ"। दूसरेने कहा-"मूर्ख ! ऐसा मत
करे । ऐसा करनेसे दोनोंहीका नाश होगा"। तब ऐसा कहनेपरभी उसने अपमानसे
फल खा लिया ! बहुत कहनेसे क्या दोनोंही नष्ट हुए । इससे मैं कहता हूँ-
एकोदराः पृथग्ग्रीवा अन्योन्यफलभक्षिणः ।
असंहता विनश्यन्ति भारण्डा इव पक्षिणः ॥ १०२ ॥"
कि एक उदर पृथक् मुख परस्पर फलभक्षणकी इच्छावाले विना मेलके
भारण्ड पक्षीकी समान नष्ट होते हैं ॥ १०२ ॥"
चक्रधर आह,-"सत्यमेतत् । तद्गच्छ गृहम्, परमेकाकिना
न गन्तव्यम् । उक्तञ्च,-
चक्रधर बोला,-"यह सत्य है । सो घरको जाओ । परन्तु इकले न जाना ।
कहा है-

  • एकः स्वादु न भुञ्जीत नैकः सुप्तेषु जागृयात् ।
    एको न गच्छेदध्वानं नैकश्चार्थान् प्रचिन्तयेत् ॥ १०३ ॥
    स्वादु पदार्थ इकला न खाय, सोते हुओंमें इकला न जागे इकला मार्गमें न
    जाय और इकलाही कार्यको न विचारे ॥ १०३ ॥
    अपिच-
    औरभी-
    अपि कापुरुषो मार्गे द्वितीयः क्षेमकारकः ।
    कर्कटेन द्वितीयेन जीवितं परिरक्षितम् ॥ १०४ ॥
    मार्गमें दूसरे कायर पुरुषकोभी साथ ले जानेसे हित होता है, जैसे दूसरे सङ्गी
    कर्कटने जीवनकी रक्षा की ॥ १०४ ॥"
    सुवर्णसिद्धिः आह,-"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्,-
    स्वर्णसिद्धि बोला,-"यह कैसे ?" चक्रधर बोला,-
    कथा १५.
    कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने ब्रह्मदत्तनामा ब्राह्मणः प्रतिवसति
    स्म, स च प्रयोजनवशात् ग्रामे प्रस्थितः स्वमात्रा अभिहि-
    तः-"यत् वत्स ! कथमेकाकी व्रजसि ? तदन्विष्यतां कश्चित्
    द्वितीयः । सहायः स आह,-"अम्ब ! मा भैषीः । निरुत्पद्र-