पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ५० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ५० ) पञ्चतन्त्रम् ।
मनुष्योंके न चाहनेसे, परिजनोंके भयसे, मर्यादा रहित स्त्रियें सदा मर्यादामें
रहती हैं ॥ १५३ ॥
नासां कश्चिदगम्योऽस्ति नासाञ्च वयसि स्थितिः ।
विरूपं रूपवन्तं वा पुमानित्येव भुज्यते ॥ १५४ ॥
इनको कोई अगम्य नहीं, न इनमें कुछ अवस्थाकी स्थिति है ( यह बूढ़ा है
या तरुण ) विरूप या रूपवान् है, केवल पुरुषमात्रको भोगती हैं ॥ १५४ ॥
रक्तो हि जायते भोग्यो नारीणां शाटको यथा ।
घृष्यते यो दशालम्बी नितम्बे विनिवेशितः ॥ १५५ ॥
रक्त ( प्रेमी वा लाल ) पुरुष शाटी ( धोती ) की समान स्त्रियोंको भोग्य
होता है जो उत्कृष्ट दशामें प्राप्त हो अवलंबिन होता है अथवा जो वस्त्र नित-
म्बमें आरोपण किया घर्षणको प्राप्त होता है ॥ १५५ ॥
अलक्तको यथा रक्तो निष्पीड्य पुरुषस्तथा ।
अबलाभिर्बलाद्रक्तः पादमूले निपात्यते ॥ १५६ ॥ ”
स्त्रियें जैसे लाखका रंग वलसे पीडन कर चरणोंमें लगाती हैं इसी प्रकार रक्त
( अनुरागी ) पुरुषको चरणोंमें डालती हैं ॥ १५६ ॥ ”
एवं स राजा बहुविधं विलप्य तत्प्रभृति दन्तिलस्य प्र-
सादपराङ्मुखः सञ्जातः । किं बहुना राजद्वारप्रवेशोऽपि
तस्य निवारितः । दन्तिलोऽपि अकस्मादेव प्रसादपराङ्मुख-
मवनिपतिमवलोक्य चिन्तयामास ।
इस प्रकार राजा अनेक परितापकर उसी दिनसे दन्तिलसे विगत अनुराग-
वाला हुआ । बहुत क्या राजद्वारमें उसका प्रवेश निवारित हुआ, दन्तिलभी
अकस्मात् रुष्टराजाको देखकर विचारने लगा ।
“ अहो ! साधु चेदमुच्यते-
"अहो ( आश्चर्य है ) किसीने सत्य कहा है-
कोऽर्थान् प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तङ्गताः
स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः ।
कः कालस्य न गोचरान्तरगतः कोऽर्थी गतो गौरवं
को वा दुर्जनवागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पुमान् ॥ १५७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ५१ )
धनको प्राप्त होकर कौन गर्वित न हुआ२ किस विषयी पुरुषकी आपत्ति नाश
हुई है ? पृथ्वीमें स्त्रियोंसे किसका मन खण्डित नहीं हुआ ? राजाका प्यारा
कौनहै २ कालके गोचर कौन नहीं हुआ २ कौन मांगनेवाला गौरवको प्राप्त
हुआहै ? और कौन पुरुष दुर्जनोंकी गोष्ठीमे बैठकर कुशलताको प्राप्त हुआहै ?
कोई नहीं ॥ १९७ ॥
तथा च-
और भी कहाहै-
काके शौचं द्यूतकारे च सत्यं
सर्पे क्षान्तिः स्त्रीषु कामोपशान्तिः ।
क्लीबे धैर्यं मद्यपे तत्त्वचिन्ता
राजा मित्रं केन दृष्टं श्रुतं वा ॥ १९८ ॥
कौएमें पवित्रता, जुएमे सत्य, सर्पमें सहनशीलता, स्त्रियोंमें कामशान्ति,
नपुंसकमे धैर्य, मद्यपमें तत्त्वचिन्ता, और राजा मित्र किसने देखा वा
सुना है २ ॥ १९८ ॥
अपरं मया अस्य भूपतेरथवा अन्यस्यापि कस्यचित
राजसम्बन्धिनः स्वप्नेऽपि न अनिष्टं कृतम् । तत्किमेतत् परा-
ङ्मुखो मां प्रति भूपतिः” इति । एवं तं दन्तिलं कदाचित्
राजद्वारे विस्तम्भितं विलोक्य सम्मार्जनकर्त्ता गोरम्भो
विहस्य द्वारपालानिदमूचे-“भो भो द्वारपालाः ! राजप्रसा-
दाधिष्ठितोऽयं दन्तिलः स्वयं निग्रहानुग्रहकर्त्ता च । तदनेन
निवारितेन यथा अहं तथा यूयमपि अर्द्धचन्द्रभाजिनो भवि-
ष्यथ” । तच्छ्रुत्वा दन्तिलश्चिन्तयामास । “नूनमिदमस्य
गोरम्भस्य चेष्टितम् । अथवा साध्विदमुच्यते-
मैंने इस राजाका तथा अन्य किसी राजसम्बन्धीका स्वप्नमेंभी अनिष्ट नहीं
किया सो यह क्या है जो राजा मुझसे विरुद्ध है” । इस प्रकार उस दन्तिलको
कभी राज द्वारमें स्तम्भित देखकर सम्मार्जनकर्ता वह गोरम्भ हँसकर द्वारपालसे
बोला-“हे द्वारपाल ! राजप्रसादमें प्राप्त हुआ यह दन्तिल स्वयं निग्रह और
अनुग्रहका कर्ता है, सो इसके निवारण करनेसे जैसे मैं इसी प्रकारसे तुमभी