पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ५१ )
धनको प्राप्त होकर कौन गर्वित न हुआ२ किस विषयी पुरुषकी आपत्ति नाश
हुई है ? पृथ्वीमें स्त्रियोंसे किसका मन खण्डित नहीं हुआ ? राजाका प्यारा
कौनहै २ कालके गोचर कौन नहीं हुआ २ कौन मांगनेवाला गौरवको प्राप्त
हुआहै ? और कौन पुरुष दुर्जनोंकी गोष्ठीमे बैठकर कुशलताको प्राप्त हुआहै ?
कोई नहीं ॥ १९७ ॥
तथा च-
और भी कहाहै-
काके शौचं द्यूतकारे च सत्यं
सर्पे क्षान्तिः स्त्रीषु कामोपशान्तिः ।
क्लीबे धैर्यं मद्यपे तत्त्वचिन्ता
राजा मित्रं केन दृष्टं श्रुतं वा ॥ १९८ ॥
कौएमें पवित्रता, जुएमे सत्य, सर्पमें सहनशीलता, स्त्रियोंमें कामशान्ति,
नपुंसकमे धैर्य, मद्यपमें तत्त्वचिन्ता, और राजा मित्र किसने देखा वा
सुना है २ ॥ १९८ ॥
अपरं मया अस्य भूपतेरथवा अन्यस्यापि कस्यचित
राजसम्बन्धिनः स्वप्नेऽपि न अनिष्टं कृतम् । तत्किमेतत् परा-
ङ्मुखो मां प्रति भूपतिः” इति । एवं तं दन्तिलं कदाचित्
राजद्वारे विस्तम्भितं विलोक्य सम्मार्जनकर्त्ता गोरम्भो
विहस्य द्वारपालानिदमूचे-“भो भो द्वारपालाः ! राजप्रसा-
दाधिष्ठितोऽयं दन्तिलः स्वयं निग्रहानुग्रहकर्त्ता च । तदनेन
निवारितेन यथा अहं तथा यूयमपि अर्द्धचन्द्रभाजिनो भवि-
ष्यथ” । तच्छ्रुत्वा दन्तिलश्चिन्तयामास । “नूनमिदमस्य
गोरम्भस्य चेष्टितम् । अथवा साध्विदमुच्यते-
मैंने इस राजाका तथा अन्य किसी राजसम्बन्धीका स्वप्नमेंभी अनिष्ट नहीं
किया सो यह क्या है जो राजा मुझसे विरुद्ध है” । इस प्रकार उस दन्तिलको
कभी राज द्वारमें स्तम्भित देखकर सम्मार्जनकर्ता वह गोरम्भ हँसकर द्वारपालसे
बोला-“हे द्वारपाल ! राजप्रसादमें प्राप्त हुआ यह दन्तिल स्वयं निग्रह और
अनुग्रहका कर्ता है, सो इसके निवारण करनेसे जैसे मैं इसी प्रकारसे तुमभी