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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ४४० ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४४० ) पञ्चतन्त्रम् ।
कर शीघ्रगतिसे चला । इस प्रकार उन दोनोंके जानेपर दो योजन चलकर
कोई नदी आई । उसे देखकर धूर्त विचारने लगा “यौवनके नष्ट होनेसे इसे
लेकर मैं क्या करूंगा । और कदाचित इसके पीछे कोई आवेगा । तो मेरा
महान् अनर्थ होगा । सो केवल इसका धनही लेकर जाऊं” ऐसा विचार
निश्चय कर उससे बोला,-“प्रिये ! यह महानदी दुस्तर है । सो पहले पार धन
रखकर पीछे लोटूं । फिर मैं तुझे इकलीको पीठपर चढाकर सुखसे पार उतार
दूंगा” । वह बोली-“सुभग ! ऐसाही करो” । ऐसा कह सम्पूर्ण धन उसको
अर्पण करती हुई । तब उसने कहा-“भद्रे ! पहननेके वस्त्रभी अर्पण करो
जिससे जलके बीचमें निश्शंक चलेगी” । ऐसा कह वह धूर्त धन और दोनों
वस्त्र ( लहंगा दुपट्टा ) लेकर यथाभिलषित स्थानको गया । वहभी अपने कंठमें
दोनों हाथ डाले उद्वेगसे नदीके किनारे जबतक बैठी रही । तबतक उसी
समय कोई गीदडी मुखमें मांसपिण्ड ग्रहण किये वहां आई । आकर जबतक
देखने लगी तबतक नदीके किनारे महामच्छ जलसे निकलकर बाहर स्थित
था । यह देख वह मांसपिंडको छोड़ उस मत्स्यके प्रति धावमान हुई इसी
समय आकाशसे उतर कर कोई गिद्ध उस मांसपिंडको लेकर फिर आकाशको
धावमान हुआ । मत्स्य भी शृगालिकाको देखकर जलमें प्रवेशकर गया तब वह
शृगाली व्यर्थश्रम होकर गृध्रको देखने लगी इस समय नग्निकाने हँसकर कहा-
गृध्रेणापहृतं मांसं मत्स्योऽपि सलिलं गतः ।
मत्स्यमांसपरिभ्रष्टे किं निरीक्षसि जम्बुके ॥ ६३ ॥
गृध्रने मांस हरण किया मत्स्य भी जलमें गया हे जम्बुके ! मत्स्य और
मांससे भ्रष्ट होकर अब क्या देखती है ॥ ६३ ॥
तच्छ्रुत्वा शृगालिका तामपि पतिधनजारपरिभ्रष्टां दृष्ट्वा
सोपहासमाह-
यह सुनकर शृगालिकाने उस पति, धन और जारसे भ्रष्ट हुईको देखकर
उपहाससे कहा-
“यादृशं मम पाण्डित्यं तादृशं द्विगुणं तव ।
माभूज्जारो न भर्त्ता च किं निरीक्षसि नग्निके ॥ ६४ ॥”

भाषाटीकासमेतम् । ( ४४१ )
जितना मेरा पांडित्य हे तेरा उससे दूना हे, हा जारभी गया और भर्ताभी
नहीं हे नाग्निके ! क्या देखती है ? ॥ ६४ ॥”
एवं तस्य कथयतः पुनरन्येन जलचरेण आगत्य निवे-
दितम्-“यदहो ! त्वदीयं गृहमपि अपरेण महामकरेण गृही-
तम्” । तत् श्रुत्वा असौ अतिदुःखितमनाः तं गृहात् निःसा-
रयितुं उपायं चिन्तयन् उवाच,-“अहो ! पश्यतां मे दैवोप-
हतत्वम् ।
इस प्रकार उसके कहनेपर फिर दूसरे जलचरने आकर कहा-“अहो ! तुम्हारा
घरभी दूसरे महामकरने ग्रहण कर लिया”। उसे सुन यह दुःखीमनसे उसे
घरसे निकालनेको उपाय विचारता हुआ बोला । मेरे प्रारब्धका घात तो देखो-
मित्रं ह्यमित्रतां यातमपरं मे प्रिया मृता ।
गृहमन्येन च व्याप्तं किमद्यापि भविष्यति ॥ ६५ ॥
मित्र अमित्र हुआ और प्रिया मेरी मरगई घर दूसरेको प्राप्त हुआ अब
क्या होगा ! ॥ ६५ ॥
अथवा युक्तमिदमुच्यते-
अथवा यह युक्तही कहा है-
क्षते प्रहारा निपतन्त्यभीक्ष्ण-
मन्नक्षये वर्द्धति जाठराग्निः ।
आपत्सु वैराणि समुद्भवन्ति
वामे विधौ सर्वमिदं नराणाम् ॥ ६६ ॥
घावके ऊपर वारवार प्रहार पडते हैं, अन्नके क्षयमें भूख बढती है आपदामें
वैरी वढते हैं, विधाताके वाम होनेमें मनुष्योंको यह सब कुछ होता है ॥ ६६ ॥
तत् किं करोमि ! किमनेन सह युद्धं करोमि ? किंवा
साम्ना एव सम्बोध्य गृहात् निःसारयामि । किंवा भेदं दानं
वा करोमि ? अथवा अमुमेव वानरमित्रं पृच्छामि ? उक्तञ्च-
सो क्या करूं ! क्या उसके साथ युद्ध करूं ? या साम उपायसे समझाकर
घरसे निकालू ?। अथवा भेद वा धनसे सन्तुष्ट करूं ?। अथवा इस वानर मित्रसे
ही पूछूं ? कहा है-