पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
(१९४) पञ्चतन्त्रम् ।
(१९४) पञ्चतन्त्रम् ।
तब यह वणिक्शिशु स्नानकी सामग्री लेकर प्रसन्नहो उस अभ्यागतके साथ
चला । तब यह वणिक् ऐसा करनेपर स्नान कर उस बालकको नदीगुहामें रख
उसके द्वारको एक बडी शिलासे ढककर बहुत शीघ्र घर आया तब उस वैश्यने
पूछा-“भो अभ्यागत ! कहो कहां है वह मेरा बालक जो तेरे साथ नदीस्ना-
नको गयाथा” वह बोला-“नदीके किनारेसे उसको गिद्ध लेगया” । सेठ
बोला,-“मिथ्या वादिन् ! क्या कोई गिद्धभी बालकको हरण कर सकता है ।
सो मेरे पुत्रको दे नहीं तो राजकुलमें निवेदन करूंगा,” वह बोला,-“भो
सत्यवादिन् ! जैसे गिद्ध बालकको नहीं लेजा सकता इसी प्रकार मूषकभी लोहसे
बनी तराजूको नहीं खा सकते हैं । मेरी तराजू दे यदि बालकसे प्रयोजन है
तो” । इस प्रकार दोनोंही विवाद करते राजकुलमें गये । वहां सेठ ऊंचे स्वरसे
बोला “भो ! बडा अनुचित है ! बडा अनुचित है ! मेरा बालक इस चोरने
हरण कर लिया,” तब धर्माधिकारी उससे बोले,-“श्रेष्ठिका पुत्र समर्पण करो” ।
वह बोला,-“मैं क्या करूं मेरे देखते नदीतटसे गृध्रने बालक हरण किया,”
यह सुनकर वह बोले,-“भो ! तुमने सत्य नहीं कहा क्या गिद्ध बालक हरण
करनेको समर्थ हो सकता है ?” वह बोला,-“भो ! भो ! ! हमारे वचन सुनो-
तुलां लोहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषिकाः ।
राजन् तत्र हरेच्छ्येनो बालकं नात्र संशयः ॥ ४४८ ॥”
जहां सहस्र लोहकी तराजूको मूषे खा जाते हैं वहां बालककोभी श्येन हर
लेता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ४४८ ॥”
ते प्रोचुः-“कथमेतत् ?” ततः श्रेष्ठी सभ्यानामग्रे आदितः
सर्वं वृत्तान्तं निवेदयामास । ततः तैर्विहस्य द्वावपि तौ
परस्परं संबोध्य तुला शिशुप्रदानेन सन्तोषिताौ । अतोऽहं
ब्रवीमि, “तुलां लोहसहस्रस्य” इति ।
वह बोले,-“यह कैसे ?” तब श्रेष्ठी सभ्योंके आगे आदिसे सब वृत्तान्त
निवेदन करता भया, तब उन्होंने हँसकर उन दोनोंहीको तराजू और बालक
दिलवाकर सन्तुष्ट किया, इससे मैं कहताहूं “तुला लोहसहस्रकी इत्यादि” ॥
तन्मूर्ख ! सञ्जीवकप्रसादमसहमानेन त्वया एतत् कृतम् ।
अहो साधु चेदमुच्यते-
भाषाटीकासमेतम् । (१९५)
सो मूर्ख ! सजीवककी प्रसन्नता न सहनेवाले तैने यह किया । अहो अच्छा
कहा है कि-
प्रायेणात्र कुलान्वितं कुकुलजाः श्रीवल्लभं दुर्भगा
दातारं कृपणा ऋजूननृजवो वित्ते स्थितं निर्धनाः ।
वैरूप्योपहताश्च कान्तवपुषं धर्माश्रयं पापिनो
नानाशास्त्रविचक्षणञ्च पुरुषं निन्दन्ति मूर्खाः सदा॥४४९॥
बहुधा इस जगत्में खोटे कुलमें उत्पन्न हुए कुलीनोंकी, दुर्भागी भाग्यवान्
पुरुषोंकी, कंजूस दाताओंकी, कुटिल सीधोंकी, निर्धनी धनियोंकी, विरूप सुन्द-
रोंकी, पापी धर्मात्माओंकी, मूर्ख नाना शास्त्रमें चतुर पुरुषोंकी सदा निन्दा
करते हैं ॥ ४४९ ॥
तथाच-
तैसेही-
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या निर्धनानां महाधनाः ।
व्रतिनः पापशीलानामसतीनां कुलस्त्रियः ॥ ४५० ॥
मूर्ख पंडितोंसे सदा द्वेष करते हैं, निर्धन धनवानोंसे, पापात्मा व्रतवालोंसे,
असती कुलस्त्रियोंसे सदा द्वेष करती हैं ॥ ४५० ॥
तन्मूर्ख ! त्वया हितमपि अहितं कृतम् । उक्तञ्च-
सो हे मूर्ख ! तने हितभी अहित किया. कहा है-
पण्डितोऽपि वरं शत्रुर्न मूर्खो हितकारकः ।
वानरेण हतो राजा विप्राश्चौरेण रक्षिताः ॥ ४५१ ॥
पंडित शत्रुभी अच्छा, हितकारी मूर्ख भला नहीं वानरने राजाको मारा
और ब्राह्मणोंकी चौरने रक्षा की ॥ ४५१ ॥
दमनक आह-"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्-
दमनक बोला-"यह कैस ?" वह बोला-
कथा २२.
कस्यचित् राज्ञो नित्यं वानरोऽतिभक्तिपरोऽङ्गसेवकोऽ-
न्तःपुरेऽपि अप्रतिषिद्धप्रसरोऽतिविश्वासस्थानमभूत् । एकदा
राज्ञो निद्रां गतस्य वानरे व्यजनं नीत्वा वायुं विदधति