पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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तब यह वणिक्शिशु स्नानकी सामग्री लेकर प्रसन्नहो उस अभ्यागतके साथ
चला । तब यह वणिक् ऐसा करनेपर स्नान कर उस बालकको नदीगुहामें रख
उसके द्वारको एक बडी शिलासे ढककर बहुत शीघ्र घर आया तब उस वैश्यने
पूछा-“भो अभ्यागत ! कहो कहां है वह मेरा बालक जो तेरे साथ नदीस्ना-
नको गयाथा” वह बोला-“नदीके किनारेसे उसको गिद्ध लेगया” । सेठ
बोला,-“मिथ्या वादिन् ! क्या कोई गिद्धभी बालकको हरण कर सकता है ।
सो मेरे पुत्रको दे नहीं तो राजकुलमें निवेदन करूंगा,” वह बोला,-“भो
सत्यवादिन् ! जैसे गिद्ध बालकको नहीं लेजा सकता इसी प्रकार मूषकभी लोहसे
बनी तराजूको नहीं खा सकते हैं । मेरी तराजू दे यदि बालकसे प्रयोजन है
तो” । इस प्रकार दोनोंही विवाद करते राजकुलमें गये । वहां सेठ ऊंचे स्वरसे
बोला “भो ! बडा अनुचित है ! बडा अनुचित है ! मेरा बालक इस चोरने
हरण कर लिया,” तब धर्माधिकारी उससे बोले,-“श्रेष्ठिका पुत्र समर्पण करो” ।
वह बोला,-“मैं क्या करूं मेरे देखते नदीतटसे गृध्रने बालक हरण किया,”
यह सुनकर वह बोले,-“भो ! तुमने सत्य नहीं कहा क्या गिद्ध बालक हरण
करनेको समर्थ हो सकता है ?” वह बोला,-“भो ! भो ! ! हमारे वचन सुनो-
तुलां लोहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषिकाः ।
राजन् तत्र हरेच्छ्येनो बालकं नात्र संशयः ॥ ४४८ ॥”
जहां सहस्र लोहकी तराजूको मूषे खा जाते हैं वहां बालककोभी श्येन हर
लेता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ४४८ ॥”
ते प्रोचुः-“कथमेतत् ?” ततः श्रेष्ठी सभ्यानामग्रे आदितः
सर्वं वृत्तान्तं निवेदयामास । ततः तैर्विहस्य द्वावपि तौ
परस्परं संबोध्य तुला शिशुप्रदानेन सन्तोषिताौ । अतोऽहं
ब्रवीमि, “तुलां लोहसहस्रस्य” इति ।
वह बोले,-“यह कैसे ?” तब श्रेष्ठी सभ्योंके आगे आदिसे सब वृत्तान्त
निवेदन करता भया, तब उन्होंने हँसकर उन दोनोंहीको तराजू और बालक
दिलवाकर सन्तुष्ट किया, इससे मैं कहताहूं “तुला लोहसहस्रकी इत्यादि” ॥
तन्मूर्ख ! सञ्जीवकप्रसादमसहमानेन त्वया एतत् कृतम् ।
अहो साधु चेदमुच्यते-