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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( १४२ ) पंचतन्त्रम् ।

( १४२ ) पंचतन्त्रम् ।
सञ्जीवक आह- "कथमेतत्" सोऽब्रवीत-
संजीवक बोला,- "यह कैसे" ? वह बोला-
कथा १२.
कस्मिंश्चित् समुद्रतीरैकदेशे टिट्टिभदम्पती प्रतिवसतः स्म।
ततो गच्छति काले ऋतुसमयमासाद्य टिट्टिभी गर्भमाधत्त ।
अथ आसन्नप्रसवा सती सा टिट्टिभमूचे- "भोः कान्त ! मम
प्रसवसमयो वर्तते तद्विचिन्त्यतां किमपि निरुपद्रवं स्थानं
येन तत्राहमण्डकविमोक्षणं करोमि।" टिट्टिभः प्राह- "भद्रे !
रम्योऽयं समुद्रप्रदेशः। तदत्रैव प्रसवः कार्य्यः”। सा आह-
“अत्र पूर्णिमादिने समुद्रवेला चरति । सा मत्तगजेन्द्रानपि
समाकर्षति तद्दूरमन्यत्र किञ्चित् स्थानमन्विष्यताम्” ।
तच्छ्रुत्वा विहस्य टिट्टिभ अ ह- "भद्रे ! युक्तमुक्तं भवत्या का
मात्रा समुद्रस्य या मम दूषयिष्यति प्रसूतिम् ? किं न श्रुतं
भवत्या ?
कहीं समुद्रके एक देशमें टटीहरी और उसका स्वामी रहताथा तब समय
बीतनेमें ऋतुसमयको प्राप्त होकर टिट्टिभीने गर्भ धारण किया। तब प्रसवके
समीप होनेसे सो वह टटीहरी स्वामीसे बोली,-- "भो स्वामिन् ! मेरे प्रसवका
समय वर्तमान है सो कोई उपद्रव रहित स्थान खोज किया जाय जिससे मैं
वहां अपने अण्डे त्यागन करूं"। टिट्टिभ बोला, - "भद्रे ! यह समुद्रस्थान बहुत
सुन्दर है सो यहीं बच्चे उत्पन्न करो" वह बोली,- "पूर्णमासीके दिन यहां समुद्र-
वेला प्राप्त होती है वह और तो क्या मतवाले हाथियोंकोभी आकर्षण करतीहै
सो कहीं दूर और स्थान खोज किया जाय"। यह सुन हँसकर वह टिट्टिभ
बोला,- "तुमने सत्य कहा परन्तु समुद्रकी क्या सामर्थ्य है जो मेरी सन्तानको
दूषित करे क्या तुमने न सुनाहै, कि-
बद्धाम्बरचरमार्गं व्यपगतधूमं सदा महद्भयदम् ।
मन्दमतिः कः प्रविशति हुताशनं स्वेच्छया मनुजः ॥३३८॥
आकाशचारियोंके मार्ग रोकनेवाले, धूमरहित महाभयदायक अग्निमें कौन
मन्दमति अपनी इच्छासे प्रवेश करता है ॥ ३३८ ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( १४३ )
मत्तेभकुम्भविदलनकृतश्रमं सुप्तमन्तकप्रतिमम् ।
यमलोकदर्शनैच्छुः सिंहं बोधयति को नाम ? ॥ ३३९ ॥
मतवाले हाथियोंके गण्डस्थलके विदीर्ण करनेमे श्रम किये सोते कालकी
समान सिंहको कौन यमलोक देखनेकी इच्छावाला जगावै ॥ ३३९ ॥
को गत्वा यमसदनं स्वयमन्तकमादिशत्यजातभयः ।
प्राणानपहर मत्तो यदि शक्तिः काचिदस्ति तव ॥ ३४० ॥
कौन यमलोकको जाकर स्वय भयरहित यमराजसे कहेगा कि, यदि तुझमें
कोई शक्ति हो तो मेरे प्राणोको हर ॥ ३४० ॥
प्रालेयलेशमिश्रे मरुति प्राभातिके च वाति जडे ।
गुणदोषज्ञः पुरुषं जलेन कः शीतमपनयति ॥ ३४१ ॥
शिशिरसे मिली जड भारी प्रभात वायुके चलनेसे गुण दोषको जाननेवाला
कौन पुरुष उस शीतको जलसे दूर करसकताहै ॥ ३४१ ॥
तस्मात् विश्रब्धा अत्रैव गर्भं मुञ्च । उक्तञ्च-
इस कारण निश्शंक हो यहीं गर्भ त्यागो । कहाहै-
यः पराभवसन्त्रस्तः स्वस्थानं सन्त्यजेन्नरः ।
तेन चेत्पुत्रिणी माता तद्वन्ध्या केन कथ्यते ॥ ३४२ ॥"
जो पराभवके डरसे मनुष्य अपना स्थान त्यागताहै यदि माता उसीके होनेसे
पुत्रिणीहै तो वंध्या किससे कही जायगी ॥ ३४२ ॥”
तच्छ्रुत्वा समुद्रश्चिन्तयामास अहो गर्वः पक्षिकीटस्यास्य ।
अथवा साधु चेदमुच्यते-
यह सुनकर समुद्र विचारने लगा, "अहो इस पक्षि कीट्का यह गर्वहै। अथवा
सत्य कहाहै-
उत्क्षिप्य टिट्टिभः पादावास्ते अंगभयाद्दिवः ।
स्वचित्तकल्पितो गर्वः कस्य नात्रापि विद्यते ॥ ३४३ ॥
कीट आकाशके गिरनेके भयसे आकाशकी ओरको चरण करके सोताहैं
वहा अपने चित्तसे कल्पित गर्व किसको नहीं है ॥ ३४३ ॥
तन्मया अस्य प्रमाणं कुतूहलादपि द्रष्टव्यम् । किं
मम एषोऽण्डापहारे कृते करिष्यति " इति चिन्तयित्वा