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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( १४३ )
मत्तेभकुम्भविदलनकृतश्रमं सुप्तमन्तकप्रतिमम् ।
यमलोकदर्शनैच्छुः सिंहं बोधयति को नाम ? ॥ ३३९ ॥
मतवाले हाथियोंके गण्डस्थलके विदीर्ण करनेमे श्रम किये सोते कालकी
समान सिंहको कौन यमलोक देखनेकी इच्छावाला जगावै ॥ ३३९ ॥
को गत्वा यमसदनं स्वयमन्तकमादिशत्यजातभयः ।
प्राणानपहर मत्तो यदि शक्तिः काचिदस्ति तव ॥ ३४० ॥
कौन यमलोकको जाकर स्वय भयरहित यमराजसे कहेगा कि, यदि तुझमें
कोई शक्ति हो तो मेरे प्राणोको हर ॥ ३४० ॥
प्रालेयलेशमिश्रे मरुति प्राभातिके च वाति जडे ।
गुणदोषज्ञः पुरुषं जलेन कः शीतमपनयति ॥ ३४१ ॥
शिशिरसे मिली जड भारी प्रभात वायुके चलनेसे गुण दोषको जाननेवाला
कौन पुरुष उस शीतको जलसे दूर करसकताहै ॥ ३४१ ॥
तस्मात् विश्रब्धा अत्रैव गर्भं मुञ्च । उक्तञ्च-
इस कारण निश्शंक हो यहीं गर्भ त्यागो । कहाहै-
यः पराभवसन्त्रस्तः स्वस्थानं सन्त्यजेन्नरः ।
तेन चेत्पुत्रिणी माता तद्वन्ध्या केन कथ्यते ॥ ३४२ ॥"
जो पराभवके डरसे मनुष्य अपना स्थान त्यागताहै यदि माता उसीके होनेसे
पुत्रिणीहै तो वंध्या किससे कही जायगी ॥ ३४२ ॥”
तच्छ्रुत्वा समुद्रश्चिन्तयामास अहो गर्वः पक्षिकीटस्यास्य ।
अथवा साधु चेदमुच्यते-
यह सुनकर समुद्र विचारने लगा, "अहो इस पक्षि कीट्का यह गर्वहै। अथवा
सत्य कहाहै-
उत्क्षिप्य टिट्टिभः पादावास्ते अंगभयाद्दिवः ।
स्वचित्तकल्पितो गर्वः कस्य नात्रापि विद्यते ॥ ३४३ ॥
कीट आकाशके गिरनेके भयसे आकाशकी ओरको चरण करके सोताहैं
वहा अपने चित्तसे कल्पित गर्व किसको नहीं है ॥ ३४३ ॥
तन्मया अस्य प्रमाणं कुतूहलादपि द्रष्टव्यम् । किं
मम एषोऽण्डापहारे कृते करिष्यति " इति चिन्तयित्वा