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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

अथ नवमोऽध्यायः ।
पुरुषस्य स्त्रियाश्चैव धर्म्ये वर्त्मनि तिष्ठतोः ।
संयोगे विप्रयोगे च धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥ १ ॥
अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम् ।
विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाप्या आत्मनो वशे ॥ २ ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ ३ ॥
कालेऽदाता पिता वाच्यो वाच्यश्चानुपयन् पतिः ।
मृते भर्तरि पुत्रस्तु वाच्यो मातुररक्षिता ॥ ४ ॥
सूक्ष्मेभ्योऽपि प्रसङ्गेभ्यः स्त्रियो रक्ष्या विशेषतः ।
द्वयोर्हि कुलयोः शोकमावहेयुररक्षिताः ॥ ५ ॥
इमं हि सर्व वर्णानां पश्यन्तो धर्ममुत्तमम् ।
यतन्ते रक्षितुं भार्या भर्तारो दुर्बला अपि ॥ ६ ॥
नवाँ अध्याय ।
स्त्री-रक्षा ।
अपने सनातन धर्म में स्थित पुरुष और स्त्रियों के संयोग और
वियोग समय के धर्म कहे जाते हैं:—
पुरुष को अपनी स्त्रियों को कभी स्वतन्त्र न होने देना चाहिए ।
नाच गान में आसक्त स्त्रियों को अपने वशमें रखना चाहिए । बा-
लकपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापा में पुत्र रक्षा करे,

नवां अध्याय। ३१६

नवां अध्याय। ३१६
स्त्री स्वतन्त्र होने योग्य नहीं है। समय पर कन्यादान न करने से
पिता, ऋतुकाल में सहवास न करने से पति और पिता के बाद
माता की रक्षा न करने से पुत्र निन्दा का पात्र होता है। साधारण
कुसंगों से भी स्त्रियों को बचावे क्योंकि अरक्षित स्त्रियां दोनों
कुलों को दुःख देती हैं। इसप्रकार संपूर्ण वर्णों का धर्म है। दुर्बल
पति भी अपनी स्त्रियों की रक्षा का उपाय करते हैं ॥ १-६ ॥
स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च ।
स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥ ७ ॥
पतिर्भार्या संप्रविश्य गर्भो भूत्वेह जायते ।
जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ॥ ८ ॥
यादृशं भजते हि स्त्री सुतं सूते तथाविधम् ।
तस्मात्प्रजाविशुद्ध्यर्थं स्त्रियं रक्षेत् प्रयत्नतः ॥ ९ ॥
न कश्चिद्योषितः शक्तः प्रसह्य परिरक्षितुम् ।
एतैरुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् ॥ १० ॥
स्त्रियों की रक्षा करने से पुरुष अपनी संतान को वर्णसङ्कर
होने से बचाता है, अपने चरित्र को निर्दोष रखता है, अपने कुल
की मर्यादा बढ़ाता है, अपनी और अपने धर्म की रक्षा करता
है। पति स्त्री में वीर्यरूप से प्रवेश करके जगत् में पुत्ररूप से जन्म
लेता है। अपनी स्त्री में फिर जन्मता है इसीसे स्त्री जाया कह-
लाती है। जैसे पुरुष को स्त्री सेवन करती है उसी भांति का पुत्र
पैदा करती है। इसलिए प्रजा की पवित्रता के लिए स्त्री की रक्षा
यत्नपूर्वक करे। कोई बलात्कार से स्त्रियों की रक्षा नहीं कर स-
कता, किन्तु इन उपायों से उनकी रक्षा कर सकता है ॥ ७-१० ॥
अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् ।
शौचे धर्मेऽन्नपक्त्यां च पारिणाह्यस्य वैक्षणे ॥ ११ ॥

३२० मनुस्मृति ।
अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराप्तकारिभिः ।
आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः ॥ १२ ॥
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् ।
स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च नारीसंदूषणानि षट् ॥ १३ ॥
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थितिः ।
सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते ॥ १४ ॥
धन-संग्रह, खर्च, सफ़ाई, पतिसेवा, धर्म, रसोई और घरके
सँभाल में स्त्री को लगावै । विश्वास पात्र मनुष्यों से घरमें रखवाली
कराने से रक्षित नहीं होती किन्तु जो अपनी रक्षा आपही करे
वेही सुरक्षित होसकती हैं । मद्यपान, दुर्जनसंग, पति से वियोग,
घूमना, सोना, दूसरे के घर रहना ये छः भांति के स्त्रियों में दूषण
होते हैं । व्यभिचारिणी स्त्रियां रूप और अवस्था को नहीं देखतीं,
केवल पुरुष देखकर ही मोहित होजाती हैं, वह कुरूप हो या
सुरूप ॥ ११-१४ ॥
पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च नैस्नेह्याच्च स्वभावतः ।
रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ॥ १५ ॥
एवं स्वभावं ज्ञात्वाऽऽसां प्रजापतिनिसर्गजम् ।
परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषो रक्षणं प्रति ॥ १६ ॥
शय्यासनमलङ्कारं कामं क्रोधमनार्जवम् ।
द्रोहभावं कुचर्यां च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत् ॥ १७ ॥
नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्रैरिति धर्मो व्यवस्थितः ।
निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थितिः॥१८॥
व्यभिचारिणी होनेसे, चित्तकी चञ्चलतासे, स्वभावसे रूखापनसे,

नवाँ अध्याय । ३२१

नवाँ अध्याय । ३२१
स्त्रियां रक्षित होनेपर भी अपने पति से विमन रहती हैं । ब्रह्मा
के रचे, ऐसे स्त्रियों के स्वभाव जानकर उनकी रक्षा का खूब उ-
द्योग करे । सोना, बैठे रहना, गहनेपर प्रेम, काम, क्रोध, अङ्कृतपना,
दूसरों से द्रोह और दुराचार ये स्त्रियों में स्वभाव से पैदा हैं—ऐसा
मनु ने कहा है । स्त्रियों के जातकमीदि संस्कार मन्त्रों से नहीं होते
इसलिए वे धर्मरहित होती हैं। असत्य के समान हैं—यह धर्म-
शास्त्र की मर्यादा है ॥ १५-१८ ॥
तथा च श्रुतयो बह्व्यो निगीता निगमेष्वपि ।
स्वालक्षण्यपरीक्षार्थं तासां शृणुत निष्कृतीः ॥ १६ ॥
यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यपतिव्रता ।
तन्मे रेतः पिता वृङ्क्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ॥ २० ॥
ध्यायत्यनिष्टं यत्किञ्चित्पाणिग्राहस्य चेतसा ।
तस्यैष व्यभिचारस्य निह्नवः सम्यगुच्यते ॥ २१ ॥
यादृग्गुणेन भर्त्रा स्त्री संयुज्येत यथाविधि ।
तादृग्गुणा सा भवति समुद्रेणेव निम्नगा ॥ २२ ॥
व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वभाव की परीक्षार्थ वेदों में बहुत
श्रुतियां पठित हैं । उनमें जो व्यभिचार के प्रायश्चित्तभूत हैं उन
को सुनो । कोई पुत्र माता का मानस व्यभिचार जानकर कहता है-
जो मेरी माता अपतिव्रता हुई परपुरुष को चाहनेवाली थी, उस
दुष्टा का मेरा पिता शुद्ध वीर्यसे शोधन करे-यह एक नमूना है ।
स्त्री अपने मनमें पतिके लिए जो अशुभ चिन्तन करती है (मान-
सिक व्यभिचार ) उसका प्रायश्चित्तरूप मन्त्र पुत्रको शुद्ध करने
वाला है, माता को नहीं। जिस गुणवाले पति के साथ स्त्री विवाह
करके रहे वैसेही गुणवाली वह होजाती है, जैसे समुद्र के साथ
नदी खारी होजाती है ॥ १६-२२ ॥
अक्षमाला वशिष्ठेन संयुक्ताऽधमयौनिजा ।
४१

३२२ मनुस्मृति ।
शारङ्गी मन्दपालेन जगामाभ्यर्हणीयताम् ॥ २३ ॥
एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः ।
उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥ २४ ॥
एषोदिता लोकयात्रा नित्यं स्त्रीपुंसयोः शुभा ।
प्रेत्येह च सुखोदर्कान् प्रजाधर्मान्निबोधत ॥ २५ ॥
अक्षमाला-अधम जाति की स्त्री वशिष्ठ को विवाहित होने से
पूज्य हुई। शारंगी पक्षीजाति की मन्दपाल को विवाहित होने से
पूज्य हुई। ये और दूसरी भी स्त्रियां इस लोक में अपने पतियों के
गुणों के कारण उन्नति को पहुँची हैं। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों का
उत्तम लौकिक आचार कहा गया है। अब लोक, परलोक में सुख
देनेवाले सन्तानधर्म को सुनो ॥ २३-२५ ॥
प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥ २६ ॥
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् ।
प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम् ॥ २७ ॥
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितॄणामात्मनश्च ह ॥ २८ ॥
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकानाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ॥ २९ ॥
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं चाप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ॥ ३० ॥
ये स्त्रियां पुत्र उत्पन्न करने के लिए बड़ी भाग्यवंती, सत्कार
योग्य और घर की शोभा हैं। स्त्रियों में और लक्ष्मी में कोई भेद

नवाँ अध्याय । ३२३

नवाँ अध्याय । ३२३
नहीं है। दोनों समान हैं। सन्तान पैदा करना, उनका पालन,
अतिथि, मित्र आदि का लौकिक आदर-भोजन का निर्वाह स्त्री
से ही हो सकता है यह प्रत्यक्ष है। सन्तान, धर्मकार्य, अतिथि-
सेवा, अच्छा काम सुख, अपने और पितरों को स्वर्ग-प्राप्ति स्त्री के
अधीन है। जो स्त्री मन, वाणी और शरीर को वश में रखकर
पति के अनुकूल रहती है वह पतिलोक पाती है और जगत् में
साध्वी कही जाती है। और पति के विरुद्ध करने से लोक में
निन्दा पाती है। सियार की योनि में जन्म लेती है और बुरे रोगों
से दुःखी होती है ॥ २६-३० ॥
पुत्रं प्रत्युदितं सद्भिः पूर्वजैश्च महर्षिभिः ।
विश्वजन्यमिमं पुण्यमुपन्यासं निबोधत ॥ ३१ ॥
भर्तुः पुत्रं विजानन्ति श्रुतिद्वैधं तु भर्तरि ।
आहुरुत्पादकं केचिदपरे क्षेत्रिणं विदुः ॥ ३२ ॥
क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान् ।
क्षेत्रबीजसमायोगात् संभवः सर्वदेहिनाम् ॥ ३३ ॥
विशिष्टं कुत्राचिद्बीजं स्त्रीयोनिस्त्वेव कुत्रचित् ।
उभयं तु समं यत्र सा प्रसूतिः प्रशस्यते ॥ ३४ ॥
बीजस्य चैव योन्याश्च बीजमुत्कृष्टमुच्यते ।
सर्वभूतप्रसूतिर्हि बीज लक्षणलक्षिता ॥ ३५ ॥
यादृशं तूप्यते बीजं क्षेत्रे कालोपपादिते ।
तादृग्रोहति तत्तस्मिन् बीजं स्वैर्व्यञ्जितं गुणैः ॥ ३६ ॥
इयं भूमिर्हि भूतानां शाश्वती योनिरुच्यते ।
न च योनिगुणान्कांश्चिद्बीजं पुष्यति पुष्टिषु ॥ ३७ ॥
भूमावप्येककेदारे कालोप्तानि कृषीबलैः ।

३२४ मनुस्मृति ।
नानारूपाणि जायन्ते बीजानीह स्वभावतः ॥ ३८ ॥
प्राचीनकाल के महात्मा-महर्षियों ने जो पुत्र को कहा था,
उस विश्वहितकारी, पवित्र विचार को सुनो—
क्षेत्र-बीजनिर्णय ।
मुनिगण उत्पन्न पुत्र को भर्ता का मानते हैं। परन्तु भर्ता के
विषय में दो प्रकार की श्रुति हैं—पहला मत है—पुत्र जिसके वीर्य
से हुआ हो उसका माना जाता है। दूसरा मत है—जिसकी स्त्री
में पैदा हो उसका होता है । स्त्री क्षेत्ररूप और पुरुष बीजरूप
कहा है, इस क्षेत्र और बीज के संयोग से सब प्राणियों की उत्पत्ति
है। कहीं बीज और कहीं क्षेत्र श्रेष्ठ माना जाता है। पर जिसमें
दोनों समान हों वह सन्तान श्रेष्ठ है। बीज और क्षेत्र में बीज
उत्तम गिना जाता है, क्योंकि—सब प्राणियों की उत्पत्ति में
बीज के रूप, रंग देखने में आते हैं। समय पर जैसा बीज खेत में
बोया जाता है, उसी भांति का गुण पैदा हुए में आता है। यह
भूमि प्राणियों की सनातन-योनि कही जाती है। परन्तु बीज
अपने खेत के गुणों को धारण नहीं करता । किसान लोग एक ही
भांति के खेत में समय पर अलग अलग बीज बोते हैं और वे
अपने स्वभाव से भांति भांति के उत्पन्न होते हैं अर्थात् एक ही
भूमि होने से एकसे नहीं होते ॥ ३१–३८ ॥
व्रीहयः शालयो मुद्गास्तिला माषास्तथा यवाः ।
यथाबीजं प्ररोहन्ति लशुनानीक्षवस्तथा ॥ ३९ ॥
अन्यदुप्तं जातमन्यदित्येतन्नोपपद्यते ।
उप्यते यद्धि यद्बीजं तत्तदेव प्ररोहति ॥ ४० ॥
तत्प्राज्ञेन विनीतेन ज्ञानविज्ञानवेदिना ।
आयुष्कामेन वप्तव्यं न जातु परयोषिति ॥ ४१ ॥
अत्र गाथा वायुगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।

नवां अध्याय । ३२५

नवां अध्याय । ३२५
यथा बीजं न वप्तव्यं पुंसा परपरिग्रहे ॥ ४२ ॥
धान, साठा, मूंग, तिल, उड़द, जव, लसुन और ईख बोने पर
अपने बीज के अनुसार ही उगते हैं। वीज दूसरा, वृक्ष दूसरा उगे
यह नहीं होता। जो बीज होता है, उसीका वृक्ष पैदा होता है।
इसलिए बुद्धिमान् , विनीत, ज्ञान-विज्ञान-विशारद को परस्त्री
में बीज न बोना चाहिए। प्राचीन इतिहास के ज्ञाता ऋषि इस
विषय में वायु की गाई गाथा गाते हैं-परस्त्री में पुरुष को बीज
न बोना चाहिए ॥ ३६-४२ ॥
नश्यतीषुर्येथा विद्धः खे विद्धमनुविध्यतः ।
तथा नश्यति वै क्षिप्रं बीजं परपरिग्रहे ॥ ४३ ॥
पृथोरपीमां पृथिवीं भार्यां पूर्वविदो विदुः ।
स्थाणुच्छेदस्य केदारमाहुः शल्यवतो मृगम् ॥ ४४ ॥
एतावानेव पुरुषो यज्जायात्मा प्रजेति ह ।
विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सा स्मृताङ्गना ॥ ४५ ॥
न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते ।
एवं धर्मं विजानीमः प्राक् प्रजापतिनिर्मितम् ॥ ४६ ॥
जैसे दूसरे के वेधे मृग को फिर मारने से बाण निष्फल होता
है, ऐसे परस्त्री में बोया बीज शीघ्र निष्फल होता है। इस पृथिवी
को जो पहले राजा पृथुकी भार्या थी, अब भी लोग पृथुकी भार्या
ही जानते हैं। जो वृक्ष काटकर साफ़ करता है उसका खेत और
जिसका पहले बाण लगे उसका वह मृग कहलाता है। स्त्री आप और
सन्तान ये तीनों मिलकर एक पुरुष कहलाता है। वेदज्ञ ब्राह्मण
भी कहते हैं कि जो भर्ता है वही भार्या है * । बेंचने वा छोड़ने से

  • शतपथब्राह्मण में श्रुति है—'अर्धो ह वा एव आत्मनस्तस्माद्यायां न विन्दते
    नैतावत्प्रजायते, असर्वो हि तावद्भवति । अथ यदैव जायां विन्दतेऽथ प्रजायते तर्हि
    सर्वो भवति' ।

३२६ मनुस्मृति।
भार्या अपने पति से नहीं छूटती । ऐसी धर्ममर्यादा, प्रजापति
की रची हम जानते हैं ॥ ४३-४६ ॥
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते ।
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥ ४७ ॥
यथा गोऽश्वोष्ट्रदासीषु महिष्यजाविकासु च ।
नोत्पादकः प्रजाभागी तथैवान्याङ्गनास्वपि ॥ ४८ ॥
येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः ।
ते वै शस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ॥ ४६ ॥
यदन्यगोषु वृषभो वत्सानां जनयेच्छतम् ।
गोमिनामेव ते वत्सा मोघं स्कन्दितमार्षभम् ॥ ५० ॥
तथैवाक्षेत्रिणो बीजं परक्षेत्रप्रवापिणः ।
कुर्वन्ति क्षेत्रिणामर्थं न बीजी लभते फलम् ॥ ५१ ॥
भाइयों का बँटवारा एक बार ही होता है । कन्यादान एक
बार होता है और दान भी एकही बार कहने से होजाता है—सत्पु-
रुष इन तीन बातों को एकवार ही करते हैं । जैसे गौ, घोड़ी,
ऊंटनी, दासी, भैंस, बकरी और भेड़ आदि में सन्तान पैदा करने
वाला उस सन्तान का स्वामी नहीं माना जाता, ऐसेही परस्त्री
में सन्तान का भागी नहीं होता । जो क्षेत्र स्वामी न होकर, बीज
बोनेवाले हों, वे उस खेत के अन्नादि फल को नहीं पासकते हैं ।
एक बैल दूसरे की गायों में सैकड़ों बछड़े पैदा करता है, वे गौ
वालों के होते हैं और बैल का वीर्य निष्फल जाता है, वैसे ही
परक्षेत्र में बोनेवाले खेतवाले का काम करते हैं, बीजवाला फल
नहीं पाता ॥ ४७-५१ ॥
फलं त्वनभिसंधाय क्षेत्रिणां बीजिनां तथा ।

नवों अध्याय । ३२७

नवों अध्याय । ३२७
प्रत्यक्षं क्षेत्रिणोऽर्थो बीजाद्योनिर्गरीयसी ॥ ५२ ॥
क्रियाभ्युपगमाच्चैतद्बीजार्थं यत्प्रदीयते ।
तस्येह भागिनौ दृष्टौ बीजी क्षेत्रिक एव च ॥ ५३ ॥
ओघवाताहृतं बीजं यस्य क्षेत्रे प्ररोहति ।
क्षेत्रिकस्यैव तद्बीजं न वप्ता लभते फलम् ॥ ५४ ॥
खेत और बीजवालों में कोई ठहराव न हो तब तक सन्तान
खेतवाले की प्रत्यक्ष मानीजाती है। क्योंकि—बीज से खेत ही
प्रधान है। क्षेत्र में जो सन्तान होगी, वह हम दोनों की होगी—
ऐसा ठहराव हुआ हो तो सन्तान क्षेत्र और बीज दोनों की
होगी। जो बीज जल के वेग या वायु से गिरकर दूसरे के खेत
में पैदा हो, उसके फल का भागी खेतवाला होता है बोनेवाला
नहीं ॥ ५२-५४ ॥
एष धर्मो गवाश्वस्य दास्युष्ट्राजाविकस्य च ।
विहंगमहिषीणां च विज्ञेयः प्रसवं प्रति ॥ ५५ ॥
एतद्वः सारफल्गुत्वं बीजयोन्योः प्रकीर्तितम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि योषितां धर्ममापदि ॥ ५६ ॥
भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भार्या या गुरुपत्न्यनुजस्य सा ।
यवीयसस्तु या भार्या स्नुषा ज्येष्ठस्य सा स्मृता ॥ ५७ ॥
ज्येष्ठो यवीयसो भार्यां यवीयान् वाग्रजस्त्रियम् ।
पतितौ भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि ॥ ५८ ॥
देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ्नियुक्तया ।
प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ॥ ५९ ॥
विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्यतो निशि ।

एकमुत्पादयेत् पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ ६० ॥

३२८ मनुस्मृति ।
एकमुत्पादयेत् पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ ६० ॥
द्वितीयमेके प्रजनं मन्यन्ते स्त्रीषु तद्विदः ।
अनिर्वृतं नियोगार्थं पश्यन्तो धर्मतस्तयोः ॥ ६१ ॥
विधवायां नियोगार्थे निर्वृते तु यथाविधि ।
गुरुवच्च स्नुषावच्च वर्तेयातां परस्परम् ॥ ६२ ॥
यह व्यवस्था गौ, घोड़ी, दासी, ऊंटनी, बकरी, भेड़, पक्षी और
भैंस की संतति में जाननी चाहिए। इस प्रकार बीज और योनि
की प्रधानता और अप्रधानता का विषय कहा गया अब स्त्रियों का
आपद्धर्म कहा जाता है ।
स्त्रियों का आपद्धर्म, नियोग ।
बड़े भाई की स्त्री छोटे भाई को गुरुपत्नी के समान और छोटे
भाई की स्त्री बड़े भाई को पुत्रवधू के समान कही है। आपत्तिकाल
न हो अर्थात् पुत्र हो तो बड़ा भाई छोटे भाई की स्त्री के साथ
और छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री के साथ नियोगविधि से गमन
करे तो दोनों पतित होते हैं । सन्तान न हो तो नियोग की हुई
स्त्री देवर या सपिण्डपुरुष से अभीष्ट सन्तान प्राप्त करे। विधवा
स्त्री के साथ नियोग करनेवाला शरीर में घी लगाकर मौन होकर
रात्रि में भोग करे और इस भांति एक ही पुत्र पैदा करे, दूसरा
कभी न करे। नियोगविधि के ज्ञाता कोई ऋषि एक पुत्र से नियोग
का प्रयोजन सिद्ध न होते देखकर दूसरा पुत्र पैदा करना भी
धर्म मानते हैं। शास्त्र की रीति से विधवा स्त्री में नियोग का
प्रयोजन हो जाने पर छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री से माता
और बड़ा भाई छोटे की स्त्री से पुत्रवधू के समान बर्ताव
करे ॥ ५५-६२ ॥
नियुक्तौ यौ विधिं हित्वा वर्तेयातां तु कामतः ।
तावुभौ पतितौ स्यातां स्नुषागगुरुतल्पगौ ॥ ६३ ॥

नवां अध्याय । ३२६

नवां अध्याय । ३२६
नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः ।
अन्यस्मिन् हि नियुञ्जाना धर्मं हन्युः सनातनम् ॥ ६४॥
नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः ॥ ६५ ॥
अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।
मनुष्याणामपि प्रोक्तो वेने राज्यं प्रशासति ॥ ६६ ॥
स महीमखिलां भुञ्जन् राजर्षिप्रवरः पुरा।
वर्णानां संकरं चक्रे कामोपहतचेतनः ॥ ६७ ॥
ततः प्रभृति यो मोहात्प्रमीतपतिकां स्त्रियम् ।
नियोजयत्यपत्यार्थं तं विगर्हन्ति साधवः ॥ ६८ ॥
यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ।
तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ॥ ६६ ॥
यदि नियोग करनेवाले दोनों शास्त्रविधि को छोड़कर मन-
माना व्यवहार करें तो पतित होते हैं। और पुत्रवधू गुरुपत्नी के साथ
गमन करनेवाले माने जाते हैं। द्विजातियों को विधवा स्त्री का
नियोग दूसरे वर्णवाले से न करना चाहिए । अन्य जाति से नि-
योग की हुई स्त्रियाँ धर्म का नाश कर डालती हैं। विवाहसम्बन्धी
मन्त्रों में कहीं नियोग नहीं कहा है और विधवा का पुनर्विवाह भी
कहीं नहीं कहा है । यह नियोगविधि * राजा वेन के राज्य में

  • नियोग और विधवा-विवाह वेद-स्मृति से विरुद्ध है । इसी लिए वेन के
    समय में प्रचलित नियोग का मनुने खण्डन किया है । दूसरी स्मृतियों से दश-पांच
    श्लोक विधवाविवाह के विषय में नवीन मतवाले प्रमाण देते हैं और ऋग्वेद
    या अथर्व के दो चार मन्त्र भी प्रमाण में उपस्थित करते हैं। पर वे सब दूसरे
    अभिप्राय के हैं, कोई भी विधवाविवाह वा नियोग को सिद्ध नहीं करते ।
    ‘उदीर्ध्वनार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुपशेष एहि । हस्तग्रामस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि संवभूथ ।’ ऋग्वेद, १० । १८ । ८ ।
    ‘उतयत्पतयो दशस्त्रियाः पूर्वे अब्राह्मणाः । ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत्स एव पतिरेकधा।’ अथर्व०
    ५।४।१७ इत्यादि मन्त्रों से सब कुछ सिद्ध करते हैं। परन्तु इनका प्रसङ्ग, सम्बन्ध, अर्थ
    दूसरा ही है । श्रीभीमसेनकृत ‘विधवा-विवाहमीमांसा’ में विस्तार से लिखा गया है ।
    ४२

३३० मनुस्मृतिः।
प्रचलित हुई थी। परन्तु विद्वान् द्विजों ने इस पशुधर्म की निंदा
की है। राजर्षि वेन जब सारी पृथिवी पर राज्य करता था, उस
समय कामवासना से नष्टबुद्धि होकर वर्णसङ्करता फैलाई थी।
तब से जो पुरुष विधवा स्त्री का सन्तान के लिए नियोग करता
है उसकी साधु पुरुष निंदा करते हैं। जिस कन्या का पति
वाग्दान करने बाद मर जाय तो उसको उस का देवर इस भांति
स्वीकार करे ॥ ६३-६९ ॥
यथाविध्यधिगम्यैनां शुक्लवस्त्रां शुचिव्रताम् ।
मिथो भजेताप्रसवात्सकृत्सकृदृतावृतौ ॥ ७० ॥
न दत्त्वा कस्यचित्कन्यां पुनर्दद्याद् विचक्षणः ।
दत्त्वा पुनः प्रयच्छन् हि प्राप्नोति पुरुषानृतम् ॥ ७१ ॥
विधिवत्प्रतिगृह्यापि त्यजेत्कन्यां विगर्हिताम् ।
व्याधितां विप्रदुष्टां वा छद्मना चोपपादिताम् ॥ ७२ ॥
यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्यायोपपादयेत् ।
तस्य तद्वितथं कुर्यात् कन्यादातुर्दुरात्मनः ॥ ७३ ॥
विधाय वृत्तिं भार्यायाः प्रवसेत् कार्यवान्नरः ।
अवृत्तिकर्षिता हि स्त्री प्रदुष्येत् स्थितिमत्यपि ॥ ७४ ॥
विधाय प्रोषिते वृत्तिं जीवेन्नियममास्थिता ।
प्रोषिते त्वविधायैव जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः ॥ ७५ ॥
प्रोषितो धर्मकामार्थं प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः ।
विद्यार्थं षट् यशोऽर्थं वा कामार्थं त्रींस्तु वत्सरान् ॥ ७
संवत्सरं प्रतीक्षेत द्विषन्तीं योषितं पतिः ।
ऊर्ध्वं संवत्सरात्त्वेनां दायं हृत्वा न संवसेत् ॥ ७७ ॥

नवाँ अध्याय । ३३१

नवाँ अध्याय । ३३१
श्वेत वस्त्र पहने मन, वाणी, शरीर से शुद्ध उस कन्या के साथ
उसका देवर * गमन करे और सन्तान होने तक ऋतुकाल में
उक्तरीति से एक एक बार गमन करे । चतुर पुरुष एक बार
कन्या देकर फिर दूसरे को न दें, क्योंकि एक बार वाग्दान करके
दूसरे को देने से चोरी का पाप लगता है । जो कन्या रोगी, दुष्ट
और छल से दी गई हो, उसको विधिपूर्वक ग्रहण करके भी
त्याग देवे । जो दोषवाली कन्या का बिना दोष कहे विवाह कर
दे उस दुरात्मा पुरुष के दानको त्याग दे । कार्यवश विदेश जाने
वाला मनुष्य स्त्री के भरण पोषण का प्रबन्ध करके जाय । क्योंकि
सदाचारी स्त्री भी अन्न-वस्त्र के लिए दुखी होकर बिगड़ जाती हैं।
प्रबन्ध करके पति के विदेश जाने पर स्त्री नियम से रहे, शृङ्गार
आदि न करे । और प्रबन्ध बिना किए चला गया हो तो सीना
कातना आदि उद्यम से निर्वाह करे । पति, धर्मकार्य के लिए
विदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या, यश के लिए गया हो
तो छः वर्ष और सुख के लिए गया हो तो तीन वर्ष बाट
देखकर पति के पास चली जाय । दुःखदायी स्त्री की पति
एक वर्ष प्रतीक्षा करे । उसके बाद आभूषणादि छीनकर
उसके साथ न रहे ॥ ७०-७७ ॥
अतिक्रामेत्प्रमत्तं या मत्तं रोगार्तमेव वा ।
सा त्रीन् मासान् परित्याज्या विसूपणापरिच्छदा॥७८॥
उन्मत्तं पतितं क्लीबमबीजं पापरोगिणम्।
न त्यागोऽस्ति द्विषन्त्याश्च न च दायापवर्तनम्॥७९॥
* ‘कुहस्विद्दोषा कुहवस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोपतुः । कोवांशयुत्रा
विधिवेवदेवरंमर्यन योषा कृणुते सधस्थआ ।’ ऋ० मं० १०; सू० ४० । मं० २ ।
इसी श्रुति के अभिप्राय से, वाग्दान के बाद मर जाने पर देवर के साथ विवाह
मनु ने लिखा है । इसका अर्थ नियोग नहीं है । यह मत सर्वदेशी है ।

३३२ मनुस्मृति ।
मद्यपाऽसाधुवृत्ता च प्रतिकूला च या भवेत् ।
व्याधिता वाधिवेत्तव्या हिंस्रार्थघ्नी च सर्वदा ॥ ८० ॥
वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याऽब्दे दशमे तु मृतप्रजा ।
एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥ ८१ ॥
या रोगिणी स्यात्तु हिता संपन्ना चैव शीलतः ।
सानुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कर्हिचित् ॥८२॥
अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् ।
सा सद्यः संनिरोद्धव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ॥८३॥
प्रतिषिद्धापि चेद्यातु मद्यमभ्युदयेष्वपि ।
प्रेक्षासमाजं गच्छेद्वा सा दण्ड्या कृष्णलानि षट् ॥८४॥
यदि स्वाश्चापराश्चैव विन्देरन् योषितो द्विजाः ।
तासां वर्णक्रमेण स्याज्ज्यैष्ठ्यं पूजा च वेश्म च ॥८५॥
जो स्त्री अपने जुआरी, मद्यप और रोगातुर पति की सेवा न
करे उसके भूषण आदि लेकर तीन महीने के लिए त्याग दे ।
परन्तु जो पागल, पतित, नपुंसक, वीजहीन, पापरोगी भी अपने
पति की सेवा करे उसको न त्यागे, न कोई चीज़ छीने । जो स्त्री
मद्यप, दुराचारिणी, उलटा बर्ताव करनेवाली, रोगिणी मार पीट
करनेवाली, फ़िज़ूल खर्च करनेवाली हो उसके जीतेही दूसरा
विवाह करलेवे । ऋतुकाल से आठ वर्ष तक वंध्या रहे, दशवर्ष तक
बालक होकर मरते जायँ, कन्या उत्पन्न होते ग्यारह वर्ष होजायँ
और स्त्री कटुभाषी हो तो दूसरा विवाह करलेवे । परन्तु जो
रोगी होकर भी पति का हित करे, सुशीला हो तो उसकी संमति
से दूसरा विवाह करे और उसका अपमान कभी न करे ।
दूसरी स्त्री के आने पर पूर्व स्त्री रूठकर घरसे निकल जाती
हो तो उस को रोके या सब के समक्ष त्याग दे । उत्सवों के

नवां अध्याय । ३३३

नवां अध्याय । ३३३
समय मना करने पर भी जो स्त्री मद्यपान करे, गान आदि
में शरीक हो, उस पर छः कृष्णल दण्ड राजा करे । कोई
द्विज अपनी या दूसरी जाति की स्त्री से विवाह करे तो उस
की जाति मर्यादा के अनुसार आदर, आभूषण, घर का
प्रबन्ध करे ॥ ७८-८५ ॥
भर्तुः शरीरशुश्रूषां धर्मकार्यं च नैत्यकम् ।
स्वा चैव कुर्यात्सर्वेषां नास्वजातिः कथञ्चन ॥ ८६ ॥
यस्तु तत्कारयेन्मोहात्सजात्या स्थितयान्यया ।
यथा ब्राह्मणचाण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ॥ ८७ ॥
उन स्त्रियों में जो अपनी जाति की हों वे पतिसेवा और धर्मकर्म
करें; दूसरे जाति की कभी न करें । पर जो मूर्खता से अपनी
जाति की स्त्री रहते दूसरी से कर्म कराता है उसको चाण्डाल
समान जाने--यह ऋषियों ने कहा है ॥ ८६-८७ ॥
उत्कृष्ठायाभिरूपाय वराय सदृशाय च ।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधि ॥ ८८ ॥
काममामरणात्तिष्ठेत् गृहे कन्यर्तुमत्यपि ।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥ ८९ ॥
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती ।
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥ ९० ॥
अदीयमानां भर्तारमधिगच्छेद्यदि स्वयम् ।
नैनः किञ्चिदवाप्नोति न च यं साधिगच्छति ॥ ९१ ॥
अलङ्कारं नाददीत पित्र्यं कन्या स्वयंवरा ।
मातृकं भ्रातृदत्तं वा स्तेना स्याद्यदि तं हरेत् ॥ ९२ ॥

३३४ मनुस्मृति ।
पित्रे न दद्याच्छुल्कं तु कन्यामृतुमतीं हरन् ।
स हि स्वाम्यादतिक्रामेदृतूनां प्रतिरोधनात् ॥ ९३ ॥
कन्या-विवाह ।
कुलीन, सुंदर और समान जाति का वर मिले तो पिता विवाह-
योग्य अवस्था न होने पर भी शास्त्ररीति से कन्यादान कर दे।
कन्या को ऋतुमती होने पर भी मरणपर्यन्त बैठी रक्खे पर
गुणहीन वर को कभी दान न करे । यदि पिता गुणी वर मिलने
पर विवाह न करे और कन्या ऋतुमती होती हो तो वह तीनवर्ष
तक प्रतीक्षा करके अपनी इच्छानुसार पति से विवाह कर ले ।
जिस कन्या का विवाह पिता न करता हो वह यदि स्वयं विवाह
कर ले तो कन्या पुरुष को कोई दोष नहीं लगता । स्वयं वर को
स्वीकार करनेवाली कन्या पिता-माता या भाई का दिया आभूषण
न ले; अगर ले तो चोर है । ऋतुमती कन्या का विवाह करनेवाला
उसके पिता को धन न दे । क्योंकि ऋतुकाल में सन्तान का रोक
पिता के कारण होनेसे उसका हक्क जाता रहा ॥ ८८-९३ ॥
त्रिंशद्वर्षो वहेत्कन्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् ।
त्र्यष्टवर्षोऽष्टवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥ ९४ ॥
देवदत्तां पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छयात्मनः ।
तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं देवानां प्रियमाचरन् ॥ ९५ ॥
प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः संतानार्थं च मानवाः ।
तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः ॥ ९६ ॥
कन्यायां दत्तशुल्कायां म्रियेत यदि शुल्कदः ।
देवराय प्रदातव्या यदि कन्याऽनुमन्यते ॥ ९७ ॥
तीस वर्ष का पुरुष बारह वर्ष की सुन्दरी कन्या से विवाह करे।
या चौबीस वर्ष का आठवर्ष की कन्या से करे। और अग्निहोत्रादि

नवां अध्याय। ३३५

नवां अध्याय। ३३५
धर्म का नाश होता हो तो शीघ्रही करले । पति देवताओं की दी
हुई स्त्री को पाता है अपनी इच्छा से नहीं * इसलिए देवताओं
के प्रीत्यर्थ उस सती का पालन पोषण नित्य करे। ईश्वर ने गर्भ-
धारणार्थ स्त्रियों को रचा और सन्तान पैदा करने को पुरुष रचा
इसलिए स्त्री-पुरुष साथ में धर्माचरण करें—यह वेद में कहा है।
आसुरविवाह के लिए कन्या का मूल्य दिया हो और उसका पति
मर जाय तो कन्या की इच्छा से देवर का विवाह कर दे ॥ ९४-९७ ॥
आददीत न शूद्रोऽपि शुल्कं दुहितरं ददत् ।
शुल्कं हि गृह्णन् कुरुते छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ ९८ ॥
एतत्तु न परे चक्रुर्नापरे जातु साधवः ।
यदन्यस्य प्रतिज्ञाय पुनरन्यस्य दीयते ॥ ९९ ॥
नानुशुश्रुम जात्वेतत् पूर्वेष्वपि हि जन्मसु ।
शुल्कसंज्ञेन मूल्येन छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ १०० ॥
अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिकः ।
एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः ॥ १०१ ॥
कन्यादान में शूद्र भी धन न ले । जो लेता है वह छिपा हुआ
कन्या बेंचता है। यह कर्म पहले सत्पुरुषों ने नहीं किया और न
इस समय करते हैं जोकि एक को कन्यादान करके दूसरे को
दीजावे । पूर्व कल्पों में भी कन्या-विक्रय नहीं सुना गया। स्त्री-
पुरुष मरण पर्यन्त आपस में प्रेमपूर्वक रहकर धर्म आदि चतुर्वर्ग
फल को प्राप्त करें। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों का परम-धर्म संक्षेप
से कहा गया है ॥ ९८-१०१ ॥
तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ ।
यथा नाभिचरेतां तौ वियुक्तावितरेतरम् ॥ १०२ ॥

  • मन्त्र है:-' भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः । ' इत्यादि ।

३३६ मनुस्मृति ।
एष स्त्रीपुंसयोरुक्तो धर्मो वो रतिसंहितः ।
आपद्यपत्यप्राप्तिश्च दायभागं निबोधत ॥ १०३ ॥
स्त्री-पुरुष विवाह करके ऐसा व्यवहार करें, जिसमें धर्माचरण में
अलग न हों। यह स्त्री-पुरुषों का धर्म और आपत्काल में सन्तान-
विधि कही गई है। अब दायभाग की व्यवस्था सुनो ॥१०२-१०३ ॥
ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।
भजेरन् पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः ॥१०४॥
ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात्पित्र्यं धनमशेषतः ।
शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा ॥ १०५ ॥
ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः ।
पितॄणामनृणश्चैव स तस्मात् सर्वमर्हति ॥ १०६ ॥
यस्मिन्नृणं संनयति येन चानन्त्यमश्नुते ।
स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान् विदुः ॥ १०७ ॥
पितेव पालयेत्पुत्रान्ज्येष्ठो भ्रातॄन् यवीयसः ।
पुत्रवच्चापि वर्तेरञ्ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः ॥ १०८ ॥
ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः ।
ज्येष्ठः पूज्यतमो लोके ज्येष्ठः सद्भिरगर्हितः ॥ १०६ ॥
दायभाग-व्यवस्था ।
पिता और माता की मृत्यु के बाद, भाई आपस में पिता की
सम्पत्ति बाँट ले, पर उनके जीते नहीं बाँट सकते। बड़ा भाई पिता
का सब धन ग्रहण करे और शेष भाई जैसे पिता की आशा में जी-
विका करते थे, वैसेही भाई के वश में रहकर करें । बड़े पुत्र का
जन्म होने से मनुष्य पुत्रवान् होता है और पितृऋण से छूटता है,

इसलिए वह सब धन का स्वामी हो सकता है। जिस के उत्पन्न
होने से, पितृऋण दूर होता है। और मोक्ष प्राप्त होता है वही धर्म-
पुत्र है। दूसरों को काम से उत्पन्न जाने। बड़ा भाई, छोटे भाइयों
का पालन पिता के समान करे। और छोटे भाई, बड़े भाई के
साथ पिता के समान धर्मानुसार बर्ताव करें। ज्येष्ठ कुलं को
बढ़ाता है और ज्येष्ठ ही नाश करता है, ज्येष्ठ गुणवान् जगत् में
पूज्य है और सत्पुरुषों में निंदा नहीं पाता ॥१०४-१०६॥
यो ज्येष्ठो ज्येष्ठवृत्तिः स्यान्मातेव स पितेव सः।
अज्येष्ठवृत्तिर्यस्तु स्यात्स संपूज्यस्तु बन्धुवत् ॥११०॥
एवं सह वसेयुर्वा पृथग्वा धर्मकाम्यया।
पृथग् विवर्द्धते धर्मस्तस्माद्धर्म्या पृथक् क्रिया ॥१११॥
ज्येष्ठस्य विंश उद्धारः सर्वद्रव्याच्च यद्वरम्।
ततोऽर्धं मध्यमस्य स्यात्तुरीयं तु यवीयसः ॥ ११२ ॥
ज्येष्ठश्चैव कनिष्ठश्च संहरेतां यथोदितम्।
येऽन्ये ज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्यान्मध्यमं धनम् ॥११३॥
जो बड़ा भाई बड़प्पन का बर्ताव करे वह माता-पिता के स-
मान है। और वैसा बर्ताव न करे तो बन्धुवत् पूज्य है। भाइयों ने
यदि बांट न किया हो तो साथ रहें और बांट कर लिया हो तो अ-
लग अलग रहें। अलग रहने से धर्म-कर्म अधिक होता है ❋ इस
लिए अलग रहना धर्मानुकूल है। बड़े भाई को बीसवां भाग अ-
धिक भाग है और सब पदार्थों में जो उत्तम हो वह भी देना चा-
हिए। मध्यम भाई को इसका आधा—चालीसवां भाग अधिक दें
और बाक़ी धन को सब भाई समान बांट लें। बड़ा और सब से

❋ बृहस्पति का भी वचन है—
'एकपाकेन वसतां पितृदेवद्विजार्चनम्। एकम्भवद्विभक्तानां तदेवं स्याद् गृहे गृहे ॥'
अर्थात् अलग रहने से पञ्चमहायज्ञादि भी अलग होते हैं। यों धर्मवृद्धि होती है।
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