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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 649 में से

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पृष्ठ 463

नवाँ अध्याय । ३२३
नहीं है। दोनों समान हैं। सन्तान पैदा करना, उनका पालन,
अतिथि, मित्र आदि का लौकिक आदर-भोजन का निर्वाह स्त्री
से ही हो सकता है यह प्रत्यक्ष है। सन्तान, धर्मकार्य, अतिथि-
सेवा, अच्छा काम सुख, अपने और पितरों को स्वर्ग-प्राप्ति स्त्री के
अधीन है। जो स्त्री मन, वाणी और शरीर को वश में रखकर
पति के अनुकूल रहती है वह पतिलोक पाती है और जगत् में
साध्वी कही जाती है। और पति के विरुद्ध करने से लोक में
निन्दा पाती है। सियार की योनि में जन्म लेती है और बुरे रोगों
से दुःखी होती है ॥ २६-३० ॥
पुत्रं प्रत्युदितं सद्भिः पूर्वजैश्च महर्षिभिः ।
विश्वजन्यमिमं पुण्यमुपन्यासं निबोधत ॥ ३१ ॥
भर्तुः पुत्रं विजानन्ति श्रुतिद्वैधं तु भर्तरि ।
आहुरुत्पादकं केचिदपरे क्षेत्रिणं विदुः ॥ ३२ ॥
क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान् ।
क्षेत्रबीजसमायोगात् संभवः सर्वदेहिनाम् ॥ ३३ ॥
विशिष्टं कुत्राचिद्बीजं स्त्रीयोनिस्त्वेव कुत्रचित् ।
उभयं तु समं यत्र सा प्रसूतिः प्रशस्यते ॥ ३४ ॥
बीजस्य चैव योन्याश्च बीजमुत्कृष्टमुच्यते ।
सर्वभूतप्रसूतिर्हि बीज लक्षणलक्षिता ॥ ३५ ॥
यादृशं तूप्यते बीजं क्षेत्रे कालोपपादिते ।
तादृग्रोहति तत्तस्मिन् बीजं स्वैर्व्यञ्जितं गुणैः ॥ ३६ ॥
इयं भूमिर्हि भूतानां शाश्वती योनिरुच्यते ।
न च योनिगुणान्कांश्चिद्बीजं पुष्यति पुष्टिषु ॥ ३७ ॥
भूमावप्येककेदारे कालोप्तानि कृषीबलैः ।