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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 649 में से

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पृष्ठ 464

३२४ मनुस्मृति ।
नानारूपाणि जायन्ते बीजानीह स्वभावतः ॥ ३८ ॥
प्राचीनकाल के महात्मा-महर्षियों ने जो पुत्र को कहा था,
उस विश्वहितकारी, पवित्र विचार को सुनो—
क्षेत्र-बीजनिर्णय ।
मुनिगण उत्पन्न पुत्र को भर्ता का मानते हैं। परन्तु भर्ता के
विषय में दो प्रकार की श्रुति हैं—पहला मत है—पुत्र जिसके वीर्य
से हुआ हो उसका माना जाता है। दूसरा मत है—जिसकी स्त्री
में पैदा हो उसका होता है । स्त्री क्षेत्ररूप और पुरुष बीजरूप
कहा है, इस क्षेत्र और बीज के संयोग से सब प्राणियों की उत्पत्ति
है। कहीं बीज और कहीं क्षेत्र श्रेष्ठ माना जाता है। पर जिसमें
दोनों समान हों वह सन्तान श्रेष्ठ है। बीज और क्षेत्र में बीज
उत्तम गिना जाता है, क्योंकि—सब प्राणियों की उत्पत्ति में
बीज के रूप, रंग देखने में आते हैं। समय पर जैसा बीज खेत में
बोया जाता है, उसी भांति का गुण पैदा हुए में आता है। यह
भूमि प्राणियों की सनातन-योनि कही जाती है। परन्तु बीज
अपने खेत के गुणों को धारण नहीं करता । किसान लोग एक ही
भांति के खेत में समय पर अलग अलग बीज बोते हैं और वे
अपने स्वभाव से भांति भांति के उत्पन्न होते हैं अर्थात् एक ही
भूमि होने से एकसे नहीं होते ॥ ३१–३८ ॥
व्रीहयः शालयो मुद्गास्तिला माषास्तथा यवाः ।
यथाबीजं प्ररोहन्ति लशुनानीक्षवस्तथा ॥ ३९ ॥
अन्यदुप्तं जातमन्यदित्येतन्नोपपद्यते ।
उप्यते यद्धि यद्बीजं तत्तदेव प्ररोहति ॥ ४० ॥
तत्प्राज्ञेन विनीतेन ज्ञानविज्ञानवेदिना ।
आयुष्कामेन वप्तव्यं न जातु परयोषिति ॥ ४१ ॥
अत्र गाथा वायुगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।