मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३२२ मनुस्मृति ।
शारङ्गी मन्दपालेन जगामाभ्यर्हणीयताम् ॥ २३ ॥
एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः ।
उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥ २४ ॥
एषोदिता लोकयात्रा नित्यं स्त्रीपुंसयोः शुभा ।
प्रेत्येह च सुखोदर्कान् प्रजाधर्मान्निबोधत ॥ २५ ॥
अक्षमाला-अधम जाति की स्त्री वशिष्ठ को विवाहित होने से
पूज्य हुई। शारंगी पक्षीजाति की मन्दपाल को विवाहित होने से
पूज्य हुई। ये और दूसरी भी स्त्रियां इस लोक में अपने पतियों के
गुणों के कारण उन्नति को पहुँची हैं। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों का
उत्तम लौकिक आचार कहा गया है। अब लोक, परलोक में सुख
देनेवाले सन्तानधर्म को सुनो ॥ २३-२५ ॥
प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥ २६ ॥
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् ।
प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम् ॥ २७ ॥
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितॄणामात्मनश्च ह ॥ २८ ॥
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकानाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ॥ २९ ॥
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं चाप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ॥ ३० ॥
ये स्त्रियां पुत्र उत्पन्न करने के लिए बड़ी भाग्यवंती, सत्कार
योग्य और घर की शोभा हैं। स्त्रियों में और लक्ष्मी में कोई भेद