मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 460, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३२० मनुस्मृति ।
अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराप्तकारिभिः ।
आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः ॥ १२ ॥
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् ।
स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च नारीसंदूषणानि षट् ॥ १३ ॥
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थितिः ।
सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते ॥ १४ ॥
धन-संग्रह, खर्च, सफ़ाई, पतिसेवा, धर्म, रसोई और घरके
सँभाल में स्त्री को लगावै । विश्वास पात्र मनुष्यों से घरमें रखवाली
कराने से रक्षित नहीं होती किन्तु जो अपनी रक्षा आपही करे
वेही सुरक्षित होसकती हैं । मद्यपान, दुर्जनसंग, पति से वियोग,
घूमना, सोना, दूसरे के घर रहना ये छः भांति के स्त्रियों में दूषण
होते हैं । व्यभिचारिणी स्त्रियां रूप और अवस्था को नहीं देखतीं,
केवल पुरुष देखकर ही मोहित होजाती हैं, वह कुरूप हो या
सुरूप ॥ ११-१४ ॥
पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च नैस्नेह्याच्च स्वभावतः ।
रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ॥ १५ ॥
एवं स्वभावं ज्ञात्वाऽऽसां प्रजापतिनिसर्गजम् ।
परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषो रक्षणं प्रति ॥ १६ ॥
शय्यासनमलङ्कारं कामं क्रोधमनार्जवम् ।
द्रोहभावं कुचर्यां च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत् ॥ १७ ॥
नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्रैरिति धर्मो व्यवस्थितः ।
निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थितिः॥१८॥
व्यभिचारिणी होनेसे, चित्तकी चञ्चलतासे, स्वभावसे रूखापनसे,