मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 474, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३३४ मनुस्मृति ।
पित्रे न दद्याच्छुल्कं तु कन्यामृतुमतीं हरन् ।
स हि स्वाम्यादतिक्रामेदृतूनां प्रतिरोधनात् ॥ ९३ ॥
कन्या-विवाह ।
कुलीन, सुंदर और समान जाति का वर मिले तो पिता विवाह-
योग्य अवस्था न होने पर भी शास्त्ररीति से कन्यादान कर दे।
कन्या को ऋतुमती होने पर भी मरणपर्यन्त बैठी रक्खे पर
गुणहीन वर को कभी दान न करे । यदि पिता गुणी वर मिलने
पर विवाह न करे और कन्या ऋतुमती होती हो तो वह तीनवर्ष
तक प्रतीक्षा करके अपनी इच्छानुसार पति से विवाह कर ले ।
जिस कन्या का विवाह पिता न करता हो वह यदि स्वयं विवाह
कर ले तो कन्या पुरुष को कोई दोष नहीं लगता । स्वयं वर को
स्वीकार करनेवाली कन्या पिता-माता या भाई का दिया आभूषण
न ले; अगर ले तो चोर है । ऋतुमती कन्या का विवाह करनेवाला
उसके पिता को धन न दे । क्योंकि ऋतुकाल में सन्तान का रोक
पिता के कारण होनेसे उसका हक्क जाता रहा ॥ ८८-९३ ॥
त्रिंशद्वर्षो वहेत्कन्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् ।
त्र्यष्टवर्षोऽष्टवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥ ९४ ॥
देवदत्तां पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छयात्मनः ।
तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं देवानां प्रियमाचरन् ॥ ९५ ॥
प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः संतानार्थं च मानवाः ।
तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः ॥ ९६ ॥
कन्यायां दत्तशुल्कायां म्रियेत यदि शुल्कदः ।
देवराय प्रदातव्या यदि कन्याऽनुमन्यते ॥ ९७ ॥
तीस वर्ष का पुरुष बारह वर्ष की सुन्दरी कन्या से विवाह करे।
या चौबीस वर्ष का आठवर्ष की कन्या से करे। और अग्निहोत्रादि