मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
४२ मनुस्मृति ।
इसी प्रकार–" विज्ञानमानन्दं ब्रह्म " इत्यादिक श्रुति में
विज्ञान-पद में मतुबर्थीय अच्प्रत्यय कल्पना करके 'विज्ञानरूप '
ऐसा परम्परा गत अर्थ को न मानकर ' विज्ञानवान् ' ऐसा नवीन
अर्थ कल्पना करते हैं। अर्थात् विज्ञान-पद से ' विज्ञानवान् ' यह
अर्थ निकालने के लिये जब ' विज्ञानमस्यातीति विज्ञानम्=जिस
के विज्ञान है वह विज्ञान=विज्ञानवान्' ऐसी व्याख्या की जाती है
तब ' विज्ञान ' पद अन्तोदात्त होगा, परंतु ' विज्ञायते यत् तत्=
जो जाना जाय ' ऐसी परम्परागत व्याख्या से ' विज्ञान ' पद
स्वरित स्वरान्त है। आशय यह है कि जो गुरुपरम्परा से सस्वर-
वेद पढ़े हैं वे लोग ' विज्ञान ' पद को स्वरित ही पढ़ते हैं, तब
पूर्वयुक्ति से ' विज्ञान ' पद को अन्तोदात्त बना डालना कैसा
अनर्थ का काम है ? शिव शिव, हरे हरे । एवं साहस करने
ही से वेददूषक-ब्रह्मघ्न आदि उपाधि के पात्र बनते हैं।
इसी प्रकार–" कृष्णोऽस्याखरेष्ठोऽग्नये " इस सुप्रसिद्ध
यजुर्वेदीय-मन्त्र में ' कृष्ण ' पद आद्युदात्त पढ़ाजाता है
जिससे वहां ' कृष्ण ' पद का मृग अर्थ परम्परा प्राप्त है।
यदि ' कृष्ण ' पद अन्तोदात्त पढ़ा जाय तो वर्णवाची हो
जायगा इत्यादि ।
इन बातों से साफ जाहिर होता है कि वेदों में थोड़े ही
हेरफेर से अर्थ का अनर्थ होजाता है इसी भय से पूर्वकाल
में वेद अयातयाम ( ताजे ) बनारक्खे जाते थे उनके यथार्थ
धारण करनेवाले ' ऋषि ' तथा ' मन्त्रद्रष्टा ' कहलाते ,
थे और गुरुमुख से यथावत् उनको पढ़नेवाले ' अनूचान ' नाम
से विख्यात होते थे । मनु ने लिखा है–
भूमिका । ३३
‘ न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ ’
बड़ी अवस्था होने से या बाल पकने से या धनवान् होनेसे
या सुयोग्य बान्धवों से महत्त्व नहीं प्राप्त होता है। ऋषियों ने
नियम किया है कि जो अनूचान ( साङ्गवेद का अध्येता ) है
वही हमारे महान् है।
कालवश जब क्षत्रियसम्म्राट् का अभाव हुआ, वर्णाश्रम की
शिक्षाप्रणाली शिथिल होगई, वैदिक शुद्धज्ञान लुप्तप्राय होगया;
तभी से वर्णाश्रमव्यवस्था में चलनेवाले मनुष्यों की वृत्तियां
बदल गईँ, नानाप्रकार की धार्मिकशिक्षा चलपड़ीं, ब्राह्मण धर्म-
ध्वज बन गये, मनमानी धार्मिक व्यवस्थाएं करने लगे, अपने
अपने मतों के पुष्टि के लिये श्रुति स्मृतियों के यथेष्ट व्याख्यान
होने लगे, ग्रन्थों में नानाविध वाक्य मिला दिये गये, श्रुति
स्मृति के नाम से कितने एक नवीन ग्रन्थ बना डाले गये,
यहां तक, कि कईएक स्थलों में आर्ष और पौरुष विवेक संदेह-
सागर में डूब गया।
काल की महिमा है कि जो व्याकरण-न्याय वेदार्थ की
रक्षा के लिये पढ़े पढ़ाये जाते थे, जिनके बदौलत वेद के
शब्द और अर्थ से शरीर में किसी प्रकार की भी पीड़ा नहीं पहुँ-
चती थी वही ( व्याकरण-न्याय ) अब विपरीतभाव के लिये
उपस्थित किये कराये जाते हैं। व्याकरण-भाष्य में वारंवार
दिखलाया है कि वेदों के रक्षार्थ व्याकरण है। परंतु अब
वेदों का मनमाना अर्थ करने के लिये व्याकरण-चीर तयार
किया जाता है। और न्यायदर्शन में कहा है कि तत्त्वनिर्णय
३४ मनुस्मृति ।
के रक्षार्थ जल्प-वितण्डा हैं । परंतु इस समय अपने अपने
मतों के रक्षार्थ जल्प-वितण्डा का प्रयोग होता है ।
प्रसङ्गवश यह कहना पड़ता है कि चार्वाक, बौद्ध और जैन
वेददूषक अवश्य हुये हैं, पर उनसे वैदिक धर्म पर ऐसा आघात
नहीं पहुँचा कि जिसका प्रतीकार न हुआ हो। क्योंकि वे सब
खुल्लमखुल्ला वेददूषक हुए इस कारण समय समयपर उनकी
चिकित्सा भी होती गई । पर इस दुर्बल धार्मिक-संस्था में जो
प्रच्छन्न (गुप्त) चार्वाक आदि प्रबल हो रहे हैं इनका शासन
अतिकठिन क्या, बल्कि अशक्य सा होरहा है । इस शोचनीय
दशा का उल्लेख विद्याँ (दार्शनिकनिबन्ध) में यों आया है—
'प्रत्यक्षीक्रियतेऽद्य वेदपुरुषो व्याख्याकशालाञ्चितो
दृश्यन्ते स्मृतयोऽपि दुर्बलदशाः स्वेच्छा 'नियोगाङ्किताः ।'
तर्कोद्भावनया पुराणघटनोपन्यासतां नीयते
'क्षुभ्यद्धर्ममृगान्तरेषु वलते शार्दूलविक्रीडितम् ॥
साध्यन्ते परमोहनाय शतधा साध्यानि वेदादितो
वेदार्थेष्वपि साध्यभङ्गसमये श्रद्धाऽन्यथोत्पाद्यते ।
आपातामलवस्तुसंगतिकथाव्याजृम्भणाडम्बरै-
राशूपाजितगौरवं प्रतिसभं निःशङ्कमाभाष्यते ॥
आस्तिक्यं प्रथयन्ति धर्मविषये भस्मोर्ध्वपुण्ड्रादिकै-
रन्तर्ध्वस्तसमस्तशास्त्रविधयो नास्तिक्यमध्यासते ।
मन्ये प्राग्यत एव वेदविटपी शाखासहस्रं दधौ
तस्मादेव धरामरेन्द्रकुलतः संप्रत्युपैत्यत्ययम् ॥ '
१ 'तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जलपवितण्डे बीजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखा-
वरणवत्' गौ० सू०
२ यह निबन्ध उक्त पूज्यपाद श्रीद्विवेदी जी कृत है ।
१। कर्मकाण्ड। वेद प्रतिपाद्य कर्म, श्रौत और स्मार्त भेद
'भूमिका।' ३५
१। कर्मकाण्ड। वेद प्रतिपाद्य कर्म, श्रौत और स्मार्त भेद
से दो प्रकार का है; इसका उल्लेख पहिले भी हो चुका है।
यद्यपि श्रुतियों के आधार पर स्मार्तकर्म हैं और श्रौतकर्म
साक्षात् श्रुतियों से सिद्ध हैं, इस युक्तिसे श्रौतकर्म का प्राधान्य
प्राप्त होता है तो भी स्मार्तकर्म उपनयन के विना श्रौतकर्म अग्निहोत्र
आदि नहीं हो सकता यह वैदिक सिद्धान्त है। इसीलिये
श्रौतकर्म का अधिकारी बनने के लिये पहिले उपनयनद्वारा
द्विजाति होना अत्यावश्यक है।
उपनयन=यज्ञोपवीत=जनेऊ। उपनयनसंस्कार के पूर्व
पश्चाद्भावी संस्कारों की चर्चा आगे की जायगी, पहिले यह
जानना बहुत जरूरी है कि 'उपनयन' ऐसा प्रधान संस्कार
जिसके ऊपर सारी वर्णाश्रम-व्यवस्था का भार है, वह इस
समय कष्टतरदशा को झेल रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
से विवाहिता-ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या में उत्पन्न बालक अपने
अपने समय पर उपनयन होने से 'द्विजाति' पद को
प्राप्त करते थे। क्षत्रिय, वैश्यों की कथा पीछे की जायगी, पहिले
उन अभागे ब्राह्मण बालकों की दशा दिखलाई जाती है कि
जिनके माता पिता दान लेने के लिये द्विजोत्तम बनकर अग्रसर
होते हैं। बहुधा देखने में आता है कि आठ वर्ष क्या, बल्कि
सोलह वर्ष का जवान बन गया है लेकिन गले से जनेऊ लिपटने
का अवसर नहीं आया। यदि भाग्यवश अवसर भी आया तो
किसी देवता वा तीर्थ के स्थान पर जाकर जनेऊ गले में डाल
लिया गया। यदि लड़के के माता पिता धनिक हुए तो विवाह-
मुहूर्त्त के एक दो दिन पेश्तर, कैसा ही दुर्मुहूर्त्त क्यों न हो,
झटपट गले में जनेऊ डाल दिया जायगा! उस पर भी
३६ मनुस्मृति ।
किसी किसी प्रदेश में यह 'विशेष' है कि बालक के पिता के
भगिनीपति या जामाता आदि ही गायत्री का उपदेश किया
करते हैं और वे 'मान्य' शब्द से पुकारे जाते हैं। कहीं
कहीं कुलगुरु कान फूंका करते हैं, वे चाहे गायत्री से परिचित
हों वा अपरिचित । और यही दशा उन मान्यधुरंधरों की भी है।
किसी मौके पर यहां तक नौबत गुजरती है कि 'रामनाम'
सुना दिया गया। क्या इससे भी गायत्री बड़ी है ! हरे हरे,
ऐसा अँधियारा छा गया। देखो 'रामनाम' बड़ा पदार्थ
है, इसमें कोई शक नहीं पर 'गायत्री' भी वह पदार्थ है
जिसकी पाबन्दी वर्णाश्रम श्रृंखला में बँधकर रामजी ने भी की थी।
और ऐसा भी देखने में आया है कि जिन लड़कों के माता पिता
सामान्य हैं, या विवाह की राह देख रहे हैं, या लापरवाह
हैं उनके दश, बीस, पचास, सौ लड़कों को एकत्र करके कोई
कोई साहसिक धनी एकदम जनेऊ करा डालते हैं। यह
ताण्डव प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक पांच सात ब्राह्मणों
से खतम होता है........इत्यादि ।
लड़कों के पिता लोग 'गोत्र, प्रवर' से अपरिचित रहते
हैं, ऐसी दशा में संध्या-तर्पण की तो बात ही क्या है ? कोई
गोत्र से परिचित भी रहते हैं पर 'प्रवर' से अपरिचित रहते
हैं। कोई गोत्र से परिचित होकर भी गोत्र का व्यवहार नहीं
करते हैं, किंतु गोत्र की जगह 'गोत' एक निराला ही पदार्थ
मानते हैं और उस गोत ही से विवाह-संबंध करते हैं। ऐसी
दशा में 'सगोत्रा' तथा 'समानप्रवरा' कन्या से विवाह
करने में कितना बड़ा दोष है यह बात धर्मशास्त्र या लोक-
१ परिणीय सगोत्रां तु समानप्रवरां तथा।
त्यागं कुर्याद्द्विजस्तस्यास्ततश्चान्द्रायणं चरेत् ॥
भूमिका । ३७
व्यवहार से छिपी नहीं है। यह केवल मूर्खों ही की कथा
नहीं है किंतु विद्वानों की भी है और उनको समाधान भी
मिलता ही जाता होगा।
बाक़ी रहे क्षत्रिय और वैश्य; उनको क्या कहा जावे ?
ब्राह्मणों को चारा देते हैं, तो भी 'दोषा वाच्या गुरोरपि'
इस न्याय का आश्रय लेकर कुछ कहा जाता है क्योंकि
याज्य होने से धर्मशास्त्रानुसार उनके ऊपर ब्राह्मणों का
अधिकार पुश्तैनी है। दुःख का विषय है कि क्षत्रिय और
वैश्य जाति से जनेऊ का व्यवहार उठ सा गया। कई घराने
तो ऐसें मिलेंगे कि उनमें से यदि किसी एक बूढ़े को पूछा
जावै कि आपके पुरुषों में किसका जनेऊ हुआ था तो देखना तो
दूर है पर सुनने का भी पता न चलेगा। कई घराने में किसी
क़दर जनेऊ होता भी है तो और घरानों के साथ खान् पान
संबंध होने से गजस्नान के समान उसका होना न होना बरा-
बर है। दूसरी यह बात है कि छोटे छोटे क्षत्रिय तथा वैश्य
विवाह आदि संबंधों के कारण बड़ों के अधीन हो रहे हैं
और बड़े तो बड़े ही हैं जिनमें बहुतेरे क्षत्रियों की उपभोग-
सामग्री महंमदियों की सी है और बहुतेरे वैश्यों का आचार
जैनों का सा है इसीलिये 'कलावाद्यन्तयोः स्थितिः' यह
कहना कई अंशों में यथार्थ हो गया है। और जो ब्राह्मणों के
प्रभाव से तथा अपने अपने अज्ञान से नवीन-त्रैवर्णिक जाति
बनती जाती है उसके विचार की आवश्यकता नहीं है। चातु-
र्वर्ण्यशिक्षा में कहा है—
३८ मनुस्मृति ।
‘ उत्पद्यतां नाम विलीयतां
वा नवा नवा जातिरहो तया किम् ।
न यत्र पारस्परिकी प्रतीतिः
क्रियापि सा जातिरनर्गला किम् ॥
जातिस्तदुत्कर्षविधिर्द्वयीति
स्मार्ती न लौकिक्यथ शासनेन ।
तत्राश्रयो युज्यत आत्मवृद्ध्यै
नहीच्छया सिध्यति भागधेयम् ॥’
अब ‘उपनयन’ के पूर्वपश्चाद्भावी संस्कारों का क्रम
दिखलाया जाता है, यह क्रम यद्यपि स्मृतिपाठभेद के कारण
कई स्थलों में भिन्न भिन्न प्राप्त होता है तो भी प्रौढ़ विद्वानों के
लेखानुसार ठीक कर लिया गया है। “ १ गर्भाधान, २ पुंस-
वन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ अन्न-
प्राशन, ७ चौल, ८ उपनयन, १२ चतुर्वेदव्रत, १३ स्नान
(समावर्तन) १४ सहधर्मचारिणी-संयोग (विवाह) १६ पञ्च-
महायज्ञ, २० अष्टका, २१ पार्वण, २२ श्राद्ध, २३ श्रावणी,
२४ आग्रहायणी, २५ चैत्री, २६ आश्वयुजी, २७ अग्न्याधान,
२८ अग्निहोत्र, २९ दर्शपौर्णमास, ३० चातुर्मास्य, ३१ आग्र-
यणेष्टि, ३२ निरूढपशुबन्ध, ३३ सौत्रामणी, ३४ अग्निष्टोम,
३५ अत्यग्निष्टोम, ३६ उक्थ, ३७ षोडशी, ३८ वाजपेय,
३६ अतिरात्र, ४० आप्तोर्याम ये चालीस संस्कारों के नाम हैं।
इनके अनुष्ठान-क्रम और लक्षण कल्पसूत्रों से जाने जाते हैं।
इनमें गर्भाधान से लेकर विवाहपर्यन्त चौदह संस्कारों से
पवित्र गृहस्थ=गृही=घरवाला बनता है और अगले संस्कारों
से वह उत्तरोत्तर माननीय बनता है (और चतुर्वेदव्रत के
अध्याय में बहुत कुछ लिखा है । अष्टकादि आश्वयुजीपर्यन्त
भूमिका । ३६
अनन्तर ही पूर्वकाल में आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अथर्व
वेद की शिक्षा प्राप्त की जाती थी ) इनमें भी पञ्चमहायज्ञ
गृहस्थ का नित्यकर्म है, जिसके बारे में भगवान् मनु ने तृतीय
अध्याय में बहुत कुछ लिखा है । अष्टकादि आश्वयुजीपर्यन्त
सात स्मार्तकर्म पाकनिष्ठ हैं, अग्न्याधानादि सौत्रामणीपर्यन्त
सात श्रौतकर्म हविपनिष्ठ हैं और अग्निष्टोमादि आप्तोर्याम-
पर्यन्त सात श्रौतकर्म सोम ( पूतिका ) निष्ठ हैं । उक्त चालीस
संस्कारों के अलावा ये आठ आत्मगुण हैं—१ दया,
२ क्षान्ति, ३ अनसूया, ४ शौच, ५ अनायास, ६ माङ्गल्य,
७ अकार्पण्य, ८ अस्पृहा । आन्तरक्रिया साध्य होने से
इनका भी उल्लेख संस्कारप्रकरण में किया है ।
' गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोन्नयनं जातकर्म नामकरणान्न-
प्राशनचौलोपनयनं चत्वारि वेदव्रतानि स्नानं सहधर्मचारिणी-
संयोगः पञ्चानां यज्ञानामनुष्ठानमष्टका पार्वणं श्राद्धं श्रावण्या-
ग्रहायणी चैत्र्याश्वयुजीति सप्त पाकसंस्थाः अग्न्याधानमग्नि-
होत्रं दर्शपूर्णमासौ चातुर्मास्यान्याग्रयणेष्टिर्निरूढपशुबन्धः
सौत्रामणीति सप्त हविर्यज्ञसंस्थाः अग्निष्टोमोऽत्यग्निष्टोम उक्थः
षोडशी वाजपेयोऽतिरात्र आप्तोर्याम इति सप्त सोमसंस्था इत्येते
चत्वारिंशत्संस्काराः । अष्टावात्मगुणा दया सर्वभूतेषु क्षान्ति-
रनसूया शौचमनायासो माङ्गल्यमकार्पण्यमस्पृहेति ॥ , '
गौतम ।
' सर्वथापि-३ । ४ । ३४ । ' इस ब्रह्मसूत्र के शारीरक
व्याख्यानुसार ' १ निरशनसंहिताध्ययन, २ प्रायणकर्म,
१ वर्तमानकालिक मनुष्यशिक्षा का वर्णन ' चातुर्वर्ण्यशिक्षा ' में देखो ।
४० मनुस्मृति ।
३ जप, ४ उत्क्रमण, ५ दैहिक, ६ भस्मसमूह्न, ७ अस्थि-
संचयन, ८ श्राद्ध, ' ये आठ संस्कार और प्राप्त होते हैं
इनको लेने से अड़तालीस संस्कार होते हैं ।
' यस्यैते अष्टाचत्वारिंशत् संस्कारा इत्याद्या च '
शारीरक ।
आङ्गिरा ने ये पचीस संस्कार कहे हैं—
' पञ्चविंशतिसंस्कारैः संस्कृता ये द्विजातयः ।
ते पवित्राश्च योग्याश्च श्राद्धादिषु सुयन्त्रिताः ॥
गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो बलिरेव च ।
जातकृत्यं नामकर्म निष्क्रमोऽन्नाशनं तथा ॥
चौलकर्मोपनयनं तद्व्रतानां चतुष्टयम् ।
स्नानोद्वाहौ चाग्रयणमष्टका च यथायथम् ॥
श्रावण्यामाश्वयुज्यां च मार्गशीर्ष्यां च पार्वणम् ।
उत्सर्गश्चाप्युपाकर्म महायज्ञाश्च नित्यशः ।
संस्कारा नियता ह्येते ब्राह्मणस्य विशेषतः ॥ '
ये पचीस संस्कार नैमित्तिक, वार्षिक, मासिक और नित्य
भेद से चार प्रकार के होते हैं यह अश्वलायन ने कहा है—
' नैमित्तिकाः षोडशोक्ताः समुद्राहावसानकाः ।
सप्तैवाग्रयणाद्याश्च संस्कारा वार्षिका मताः ॥
मासिकं पार्वणं प्रोक्तमसक्तानां तु वार्षिकम् ।
महायज्ञास्तु नित्याः स्युः सन्ध्यावच्चाग्निहोत्रवत् ॥ '
इनमें गर्भाधानादि विवाहान्त सोलह संस्कार नैमित्तिक
और आग्रयण-आदि उपाकर्मपर्यन्त सात संस्कार मासिक,
किंवा वार्षिक हैं । पञ्चमहायज्ञ, संध्योपासन तथा अग्निहोत्र
के समान नित्य हैं ।
भूमिका । ४१
व्यास ने ये सोलह संस्कार कहे हैं—
‘ गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो जातकर्म च ।
नामक्रिया-निष्क्रमणेऽन्नाशनं वपनक्रिया ॥
कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भक्रियाविधिः ।
केशान्तः स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रहः ॥
त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्काराः षोडश स्मृताः ।
नवैताः कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्जं क्रियाः स्त्रियः ॥
विवाहो मन्त्रतस्तस्याः शूद्रस्यामन्त्रतो दश ॥’
इनमें गर्भाधानादि विवाहान्त चौदह संस्कार, पंद्रहवां स्मार्त्त
अग्न्याधान, सोलहवां श्रौत अग्न्याधान है ।
सारांश यह है कि अपने अपने कल्पसूत्र ( स्मार्त्तसूत्र श्रौत
सूत्रों) के अनुसार अधिक अथवा न्यून जितने संस्कार प्राप्त
होवें उनका ही करना योग्य है । और पहिले जो संस्कारों
की अधिक वा न्यून संख्या लिखी है वह सब वैदिक शाखा
सूत्रों के भेद से है । इसीलिये गोत्र, प्रवर के समान शाखा-
सूत्र का भी स्मरण रखना अत्यावश्यक है । नहीं तो किस
किस वाक्य के अनुसार संस्कार किया जायगा । सर्वथा
संस्कार का उच्छेद होगा या दूसरे का बेटा बनना पड़ेगा ।
उक्त व्यवस्था में यह गृह्यपरिशिष्टकार का वाक्य है—
‘ बह्वल्पं वा स्वगृह्योक्तं यस्य यावत् प्रकीर्तितम् ।
तस्य तावति शास्त्रार्थे कृते सर्वः कृतो भवेत् ॥’
इसी प्रकार कात्यायन का वाक्य है—
‘ ऊनो वाऽप्यतिरिक्तो वा यः स्वशाखास्थितो विधिः ।
तेन संतनुयाद् यज्ञं न कुर्यात् पारशाखिकम् ॥
४२ मनुस्मृति ।
परशाखोऽपि कर्तव्यः स्वशाखायां न नोदितः ।
सर्वशाखासु यत् कर्म एकं प्रत्यवशिष्यते ॥'
ऐसी दशा में अन्यान्य स्मृतियों की उपेक्षा करके अपनी
अपनी गृह्यस्मृति (स्मार्तसूत्र) के अनुसार यावच्छक्य गर्भा-
धानादि संस्कारों का अनुष्ठान करना न्यायप्राप्त है। जैसे
शुक्लयजुर्वेदीय-माध्यंदिनी शाखावालों को उनकी गृह्यस्मृति
(पारस्करस्मार्तसूत्र) के अनुसार ये संस्कार करने चाहियें-
(१) आर्तव (ऋतु) काल में गर्भाधान ।
(२) दूसरे वा तीसरे मासमें गर्भचलन के पूर्व पुंसवन ।
(३) छठे वा आठवें मास में सीमन्त (सीमन्तोन्नयन) ।
(४) उत्पन्न होने पर जातकर्म ।
(५) ग्यारहवें दिन नामकर्म ।
(६) चौथे मासमें निष्क्रमण (बालक को घर से बाहर लाना)
(७) छठे मास में अन्नप्राशन ।
(८) पहिले वा तीसरे वा कुलाचार के अनुसार चूडा
(चौल) । (गृह्यस्मृति वा याज्ञवल्क्य में अनुक्त कर्णवेध, चौल
वा उपनयन के साथ यथाचार अनुष्ठेय है)
(९) गर्भाधान से आठवें वा आठवें वर्ष में ब्राह्मण का,
गर्भाधान से ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का, बारहवें में वैश्य का,
उपनयन संस्कार कहा है। यदि उक्त काल से दूना गौण
काल (१६, २२, २४ वर्ष) व्यतीत हो जाय तो बाद
'व्रात्यस्तोम' नामक प्रायश्चित्त किये बिना वे सब
१। इस समय पंचगौडों में तो उपनयन, वेदारम्भ, केशान्त और समावर्तन
ये चारों संस्कार एक ही दिन में खतम कर दिये जाते हैं ।
२। स्मार्त व्रात्यस्तोम कर्म दुर्लभ होरहा है ।
भूमिका । ४३
(ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य के अभागे लड़के) उपनयन के अधिकारी
कथमपि नहीं हो सकते और यह भी स्मरण रखने योग्य है
कि यदि इस काल के अभ्यन्तर स्त्रीपरिग्रह हो जाय तो अधि-
काधिक प्रायश्चित्त के भागी बनेंगे । जातकर्मार्दि चूडान्त पांच
संस्कार कन्या के अमन्त्रक (मन्त्रवर्जित) होते हैं और कन्या
का उपनयन-संस्कार नहीं होता है । अतएव वेदारम्भ-के-
शान्त-समावर्तन भी नहीं होते हैं ।
(१०) उपनयन के अनन्तर वेदारम्भ (स्वशाखाध्यय-
नारम्भ) ।
(११) यथासंभव अध्ययन के बाद केशान्तकर्म
(गोदानविधि) ।
(१२) केशान्तकर्म के अनन्तर समावर्तन ।
(१३) सोलहवें वर्ष के अनन्तर विवाह । यह विवाह-
संस्कार कन्या का आठवें वर्ष से ग्यारहवें वर्ष तक होना
आवश्यक है और विवाह संस्कार के पहिले साधारण शिक्षा
पश्चात् विशेष शिक्षा ब्रह्मचर्य व्रतपूर्वक अवश्य कर्त्तव्य है ।
(१४) विवाह के अनन्तर ही वा भाइयों से पृथक् होने पर
आवसथ्याधान (गृह्याग्निस्थापन) ।
(१५) यथाकाल पञ्चमहायज्ञ ।
(१६) श्रावण की पौर्णमासी में उपाकर्म ।
१। स्त्रियों की शिक्षाविधि ‘विद्या’ और ‘चातुर्वर्ण्यशिक्षा’ में देखो ।
२। ‘आवसथ्याधान’ किये बिना भी ‘पञ्चमहायज्ञ’ हो सकता है और
गृहस्थ को अत्यन्त आवश्यक है ।
४४ मनुस्मृति ।
( १७ ) पौष मास के रोहिणी नक्षत्र में वा कृष्णाष्टमी में
उत्सर्ग । .... .... .... इत्यादि ।
इसी प्रकार माध्यंदिनी शाखावालों को कात्यायन श्रौत
सूत्रानुसार अग्न्याधानादि श्रौतकर्म करना चाहिये ।
( १ ) अग्न्याधान । इसका आरम्भ ब्राह्मण-द्विज वसन्त
ऋतु में, क्षत्रिय-द्विज ग्रीष्मऋतु में, वैश्य-द्विज शरद् ऋतु में
करते हैं । अग्न्याधान में अध्वर्यु, होता, उद्गाता और ब्रह्मा
ये चार ऋत्विक् होते हैं । अग्न्याधान-शाला में पश्चिम की
ओर 'गार्हपत्य' नाम अग्नि का वृत्ताकार कुण्ड होता है । इस
से पूर्व की ओर 'आहवनीय' नाम अग्नि का चतुरस्र कुण्ड
होता है । दक्षिण की ओर 'अन्वाहार्यपचन' नाम अग्नि
का वृत्तार्धाकार कुण्ड होता है । गार्हपत्य और आहवनीय
कुण्ड के अन्तराल भूमि में एक विशिष्ट वेदिका बनाई जाती
है, जिसका पूर्व भाग 'अंश' पश्चिम भाग 'श्रोणि' कहलाता है ।
( २ ) अग्निहोत्र । यह सायं और प्रातः वेदमन्त्र से
जो अग्नि में आहुति दी जाती है उस कर्म का नाम है ।
' यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत ।
एवं, सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते ॥ '
( छां. उ. )
( ३ ) दर्शपौर्णमास । यह इष्टि आहिताग्नि ( अग्न्याधान-
कर्ता ) को प्रतिमास करना पड़ता है .... इत्यादि ।
इसी प्रकार आश्वलायन-शाङ्खायन आदि सूत्रों के अनुसार
ऋग्वेदियों के कर्म; आपस्तम्ब-हिरण्यकेशीय-सत्याषाढ
१-स्मार्त कर्म में ' अष्टका ' आदि कतिपय कर्म और श्रौतकर्म में आगिले
सभी भाग छोड़ दिये हैं । उनमें राजसूय, अश्वमेध क्षत्रिय के विषय हैं ।
भूमिका । ४५
आदि सूत्रों के अनुसार कृष्णयजुर्वेदियों के कर्म; गोभिल-
कौथुम आदि सूत्रों के अनुसार सामवेदियों के कर्म और
शौनक सूत्रानुसार अथर्ववेदियों के कर्म होते हैं। और यह
स्मरण रहे कि सर्वत्र स्मार्तकर्म में स्मार्तसूत्र और श्रौतकर्म में
श्रौतसूत्र ही शरण हैं। शाखा-सूत्र के विस्मरण में वा उच्छेद
में अन्यान्य स्मृतियों का शरण लेना यह अगतिक गति है।
एवं, प्रेतकर्म में गरुड़पुराण का शरण लेना भी अपनी अपनी
गृह्यस्मृति के अभावदशा में है। क्योंकि प्रायः पुराणों में
सर्वशाखीय कर्मों का निरूपण है इस कारण पौराणिक-कर्म लेने
से गृह्यस्मृति का अनादर होता है वह सर्वथा विरुद्ध है।
प्रेतकर्म-श्राद्ध । मरीचि ने कहा है—
' प्रेतं पितॄंश्च निर्दिश्य भोज्यं यत् प्रियमात्मनः ।
श्रद्धया दीयते यत्तु तच्छ्राद्धं परिकीर्तितम् ॥ '
मृतपित्रादि 'सपिण्डीकरण' श्राद्ध के पहिले "प्रेत =
प्र + इत " शब्द से कहे जाते हैं। मृतपित्रादिकों के उद्देश्य
से जो आत्मप्रिय भोजनादि ब्राह्मण को श्रद्धा से दिया जावे
वह 'श्राद्ध' कहलाता है। श्राद्ध चार प्रकार का है-एकोद्दिष्ट,
सपिण्डन; पार्वण और नान्दी। एकोद्दिष्ट तीन प्रकार का
है—नव, नवमिश्र और पुराण।
(१) मरण दिन से लेकर दशवें दिन तक जो श्राद्ध कहे
हैं वे 'नव' हैं।
(२) एकादशाहादि ऊनवार्षिक पर्यन्त श्राद्ध 'नव-
मिश्र' हैं।
१ इस समय ब्राह्मण सपत्ति के अभाव से अपात्रक श्राद्ध ही बहुधा होता है।
४६ मनुस्मृति ।
( ३ ) वार्षिकश्राद्ध 'पुराण' हैं ।
( ४ ) बारहवें दिन का श्राद्ध ' सपिण्डन ' कहलाता
है । जिसका यह स्वरूप है—
' पित्रर्घ्यपात्रापिण्डेषु मेलनं येन भाव्यते ।
प्रेतार्घ्यपिण्डयोस्तद्धि सपिण्डनमुदीर्यते ॥ '
और पित्रादि एक के उद्देश से एक पिण्डयुत विश्वेदेव-
हीन जो श्राद्ध किया जाता है वह 'एकोद्दिष्ट ' है ।
( ५ ) पित्रादि तीन पुरुष के उद्देश से जो श्राद्ध होता है—
वह ' पार्वण ' है ।
( ६ ) पुत्रजन्म, विवाह, अग्न्याधान, सोमयाग आदि
शुभ कर्म के प्रारम्भ में जो श्राद्ध किया जाता है वह 'नान्दी'
श्राद्ध कहलाता है । इन आवश्यक श्राद्धों से अतिरिक्त 'काम्य-
श्राद्ध' हैं जो 'कात्यायनश्राद्धसूत्र' के नौमी कारिका में
तथा याज्ञवल्क्यस्मृति आदि में लिखे हैं ।
उपसंहार । कतिपय आवश्यक विषयों का निरूपण करके
कर्मकाण्ड समाप्त कियाजाता है । यह जरूर है कि धार्मिक
क्रिया अनेक अंशों में अदृष्ट फलार्थ है, पर ऐसा भी नहीं है
कि दृष्टफल न हो । विचार दृष्टि से गर्भाधानादि संस्कारों में
दृष्टफल बहुत मिलेंगे जिनका क्षेत्र-बीज-फल पुष्टि के साथ
घनिष्ट संबन्धहै। और यह भी जरूरहै कि क्रिया देश, काल,
पात्र की अपेक्षा करती है, देश, काल, पात्र के संघटन के
लिये अनेकानेक विधि हैं, उनके विघटन दशामें दोष उपस्थित
होते हैं, विधि में दोष न उत्पन्न हों इसलिये अनेक निषेध
वाक्य और दोषमार्जन के लिये अनेक उपाय हैं, बहुधा ये
उपाय विषय विभाग से प्रायश्चित्त, शान्तिक, पौष्टिक शब्द से
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भूमिका । ४७
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कहेजाते हैं । यह विषय यहां तक पहुँचा कि ऋषियों ने देश,
काल, पात्र का संकोच देखकर 'विरोधे त्वनपेक्षं स्याद् असति
ह्यनुमानम्' इस श्रुति प्राबल्य व्यवस्थापर विशेष दृष्टि न देकर
लोकरक्षार्थ 'कलिवर्ज्य' प्रकरण बनाया । इधर स्वार्थान्ध
लोगों ने संकीर्ण ग्रन्थों की बहुतायत करदी जिसका कलकल
'प्रत्यक्षीक्रियते-' पहिले लिखा जाचुकाहै ।
ऐसी कष्टदशा में 'अस्वर्ग्यं लोकविद्विष्टं धर्ममप्याचरेन्न तु'
इस योगीश्वर के शिक्षानुसार अपने कल्पसूत्रोक्त श्रौत-स्मार्त
कर्म धर्मसंरक्षणार्थ यथासंभव अवश्य कर्तव्य हैं । और बालकाल
में होनेवाले संस्कारों पर माता पिता को बाद के संस्कारों
पर स्वयं विचार करना जरूरी है । काल की महिमा से बहुतेरे
पुरुष यह कहते हैं कि-हम संसारी हैं, नाक दबाकर बैठने का
समय नहीं है-उन महाशयों से यह कहाजाता है कि विचार
कीजिये चौबीस घंटेमें एकआध घंटेका समय सबको मिल सकता
है, यदि आप अपनी तन्दुरुस्ती ठीक बना रक्खा चाहते हैं तो
'नाक दबाने' को वैद्य-हकीम-डाक्टर की दवा में शुमार
कीजिये । और यों त्रैवर्णिकपनेकी लीक भी चलती रहेगी ।
यह अवश्य कहना पड़ेगा कि 'गृह्यस्मृति' के कुछ विषय बहुत
बढ़े चढ़े नजर आने लगे बाक़ी-के लुप्त होगये, पहिले ऐसा न था।
जबसे वैदिक ज्ञान लुप्तप्राय होगया स्वशाखीय वा परशाखीय कर्मों
का बोध उठगया अत्यावश्यक, आवश्यक, अनावश्यक विषयों
का विवेक डूब गया और वर्णाश्रमधर्म का अधरोत्तर भया। अज्ञान
[Footnote]
१। कलिवर्ज्य का उल्लेख बहुत स्थलों में है। जैसा कि 'निर्णयसिन्धु' में
तीसरे परिच्छेद के पूर्वार्ध के अन्त में। निबन्धग्रन्थों के उद्धृत वाक्यों को मूल
ग्रन्थ से मिलाने की अत्यावश्यकता है ।
अथवा स्वार्थपरायणता से नानाविध कर्मकाण्डकी पद्धतियां
४८ मनुस्मृति ।
अथवा स्वार्थपरायणता से नानाविध कर्मकाण्डकी पद्धतियां
जगमगाहट करने लगीं तबसे गरीबों का धनाभाव से अमीरों
का अवज्ञा से प्रायः बहुत कर्म छूटगया।
चातुर्वर्ण्यशिक्षा में कहा है कि—
'सांस्कारिकं कर्म विधातुकामाः
पृच्छन्ति यत्तत् सुनिरूप्य लेख्यम् ।
न वा जिघृक्षाससंश्रयेण
नानाविधं वस्तु विमोहनाय ॥
निक्षिप्यतां दृष्टिरितस्ततो वा
विमृश्यतां वा मनसा निकामम् ।
अपव्ययाद् भारतभूतलेऽस्मिन्
संस्कार एष ( शाखी ) प्रलयं नु यातः ॥
भूरिक्रियाक्लप्तिनिरूपितश्री-
रास्तां स सोमादिविशेषयागः ।
न स्मर्यते क्वापि स जातियोगी
संस्कारशाखी बहुवित्तसाध्यः ॥'
इत्यादि ।
कल्पसूत्रों का अन्यान्य स्मृतियों से उपबृंहण (फैलाव)
हो। पर उसका यह प्रयोजन नहीं है कि कल्पसूत्रही एक कोने
में कर दिये जायँ। हां, यह जरूर है; जैसे गृह्यस्मृति और ज्योतिष
के संहिताभाग में संस्कार के लिये कालशुद्धि लिखी है तो
गृह्यस्मृतिका अनुरोध करके ज्यौतिषिक कालशुद्धि लेनी चाहिये।
अतएव कितने ही कर्म सिंहस्थ-मकरस्थ गुरु आदि दुष्टकाल
में भी किये जाते हैं उसमें यह दिग्दर्शन है—
'अधार्यकन्यकोद्वाहोऽधार्यपुत्रोपनयनम् ।
गयागोदावरीयात्रो सिंहस्थेऽपि न दुष्यति ॥'
धर्माधिकारि नन्द पण्डित ।
यही दुर्दशा शान्तिक-पौष्टिक आदि की है। जहां पर
शान्तिक कर्म का विधान नहीं है वहां पर भी वह एक
विशालस्वरूप धारण करके यजमान को बाधित कर
डालता है। जैसे उपनयन-विवाह आदि में । उस कर्म को
'ग्रहशान्ति' वा 'ग्रहयज्ञ' कहा करते हैं, उसका उल्लेख
'याज्ञवल्क्यस्मृति' में इस प्रकार है-
'श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समाचरेत् ।
वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन्नपि ॥ २६५ ॥'
और इसकी इतिकर्त्तव्यता (विधि) भी वहीं लिखी है,
परंतु प्रचलित ग्रहशान्ति की पद्धति बहुत बढ़ाई गई है और
अनेक प्रकार की प्राप्त होती है। किसको क्या कहा जाय ?
यही दशा संस्कारभास्कर आदि की है।
पुनर्विवाह । जैसे उपनीत त्रैवर्णिक का अनेक कारणों
से फिर 'उपनयन' संस्कार करना प्राप्त होता है वैसा विवा-
हिता त्रैवर्णिक स्त्रीका फिर 'विवाह' करना नहीं प्राप्त होता।
अतएव पुनर्विवाह का विधान् किसी 'गृह्यस्मृति' में नहीं
किया है। और मनु ने आठवें तथा नवें अध्याय में "पाणि-
ग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः ॥२२६॥" "पाणिग्रहणिका
१ यह पुस्तक राजपूताना प्रान्त में बहुधा व्याप्त है ।
२ इस विषय का पूर्ण विचार 'विधवोद्वाहशङ्कासमाधि' नामक ग्रन्थ में
किया है। यहां तो दिग्दर्शनमात्र है ।
५० मनुस्मृति ।
मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् ॥ २२७ ॥ ” “ नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु
नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ॥ ६५ ॥ ” इत्यादि वाक्यों से पुन-
र्विवाह का निषेध किया है। और शास्त्रीय युक्ति भी है कि
जब एक बार कन्याद्रव्य का दान वरको करदिया गया, तब
दाता का पुनः कन्याद्रव्य में अधिकार न रहा, और अधिकारी
वर मृत हो गया तथा अन्यद्रव्य के समान अधिकारी के संवं-
धियों का अधिकार नहीं प्राप्त होता, उस दशा में ‘विधवा’
को देनेलेनेवाला चोर के सिवाय और कौन हो सकता है ?
और-
‘नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतितेऽपतौ ।
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते॥' (४अ. ३०श्लो.)
इस पराशरस्मृति वचन से जो पुनर्विवाह की सिद्धि
करते हैं उनकी बड़ी भूल है; क्योंकि प्रथम तो वैवाहिक श्रुति
(मन्त्र) के साथ उक्त स्मृति का विरोध होता है, जिस के बारे
में भगवान् मनु ने लिखा है कि 'पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्या-
स्वेव प्रतिष्ठिताः' (८ अ. २२६ श्लो. )। दूसरे, गृह्यस्मृतियों
में पुनर्विवाह विधिके न होने से उक्त स्मृति का गृह्यस्मृतियों के
साथ विरोध स्पष्ट है। तीसरे, पतिके पतित होने पर ‘आशुद्धेः
संप्रतीक्ष्यो हि महापातकदूषितः' (आ. ७७ श्लो. ) इस
याज्ञवल्क्य-स्मृति के अनुसार पत्यन्तर की प्राप्ति नहीं होती,
किंतु प्रायश्चित्त करने बाद वही पति व्यवहार्य होता है। अत-
एव यह कहा जा सकता है कि उक्त, स्मृति-वाक्य स्वतन्त्ररूप
१ पति स्त्रीका दाता किसी अवस्था में होता है। जैसे राजा हरिश्चन्द्र...।
२ 'अर्यमणं तु देवं कन्या अग्निमयक्षत' इत्यादि मन्त्र और प्रस्तुतविचार विद्यासुधाकर में स्पष्ट है।
भूमिका । ५१
से 'पुनर्विवाह' अथवा 'नियोग' का विधायक नहीं
हो सकता, किंतु व्यवस्था की अपेक्षा रखता है। जैसा—
वाग्दान के बाद पाणिग्रहण के पहले अपति, अर्थात् पतिभिन्न
पति सदृश वर; यदि लापता हो जाय, वा मर जाय, वा संन्यासी
हो जाय, वा नपुंसक हो जाय, वा महापातक से दूषित हो जाय
इन पांच आपत्तियों में 'च' कार से यदि विकर्मा, वा विरुद्ध-
धर्मा, वा समान गोत्र, वा समान प्रवर ज्ञात होय तो कन्या
दूसरे वर को दी जाय। यही आशय धर्माधिकारि नन्द पण्डित
ने विद्वन्मनोहरा में दिखलाया है ।
नियोगकर्म । यह इन्द्रियदौर्बल्य के कारण कलि में सर्वथा
असंभव है। इसीलिये वृहस्पति ने कहा है—
'उक्ता नियोगा मुनिना निषिद्धाः स्वयमेव तु ।
युगक्रमादशक्योऽयं कर्तुमन्यैर्विधानतः ॥'
इत्यादि ।
और मनु ने भी कहा है—
'अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।'
( ९ अ. ६६ श्लो. )
नियोग कर्म तो दूर रहा, इस समय भी पुनर्विवाह त्रैवर्णिक-
कातिरिक्त शूद्र जाति में हीनदृष्टि से व्यवहार्य है। भले ही
त्रैवर्णिक-महाशय उसकी कोशिश में रहें। और "अक्षमाला
वशिष्ठेन—' ९ । २३ 'अजीगर्तः सुतं हन्तुं—' १० । १०५
१ 'अपति' ऐसा छेद करने से 'उत्पत्स्यमानपतित्ववान्' ऐसी व्याख्या
की आवश्यकता नहीं है और नञ्समास होने से 'अपतौ' की साधुता भी
हो जाती है।
२ देखिये भारत में धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा पाण्डवों की उत्पत्ति के
प्रकरण ।