मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ मनुस्मृति ।
इसी प्रकार–" विज्ञानमानन्दं ब्रह्म " इत्यादिक श्रुति में
विज्ञान-पद में मतुबर्थीय अच्प्रत्यय कल्पना करके 'विज्ञानरूप '
ऐसा परम्परा गत अर्थ को न मानकर ' विज्ञानवान् ' ऐसा नवीन
अर्थ कल्पना करते हैं। अर्थात् विज्ञान-पद से ' विज्ञानवान् ' यह
अर्थ निकालने के लिये जब ' विज्ञानमस्यातीति विज्ञानम्=जिस
के विज्ञान है वह विज्ञान=विज्ञानवान्' ऐसी व्याख्या की जाती है
तब ' विज्ञान ' पद अन्तोदात्त होगा, परंतु ' विज्ञायते यत् तत्=
जो जाना जाय ' ऐसी परम्परागत व्याख्या से ' विज्ञान ' पद
स्वरित स्वरान्त है। आशय यह है कि जो गुरुपरम्परा से सस्वर-
वेद पढ़े हैं वे लोग ' विज्ञान ' पद को स्वरित ही पढ़ते हैं, तब
पूर्वयुक्ति से ' विज्ञान ' पद को अन्तोदात्त बना डालना कैसा
अनर्थ का काम है ? शिव शिव, हरे हरे । एवं साहस करने
ही से वेददूषक-ब्रह्मघ्न आदि उपाधि के पात्र बनते हैं।
इसी प्रकार–" कृष्णोऽस्याखरेष्ठोऽग्नये " इस सुप्रसिद्ध
यजुर्वेदीय-मन्त्र में ' कृष्ण ' पद आद्युदात्त पढ़ाजाता है
जिससे वहां ' कृष्ण ' पद का मृग अर्थ परम्परा प्राप्त है।
यदि ' कृष्ण ' पद अन्तोदात्त पढ़ा जाय तो वर्णवाची हो
जायगा इत्यादि ।
इन बातों से साफ जाहिर होता है कि वेदों में थोड़े ही
हेरफेर से अर्थ का अनर्थ होजाता है इसी भय से पूर्वकाल
में वेद अयातयाम ( ताजे ) बनारक्खे जाते थे उनके यथार्थ
धारण करनेवाले ' ऋषि ' तथा ' मन्त्रद्रष्टा ' कहलाते ,
थे और गुरुमुख से यथावत् उनको पढ़नेवाले ' अनूचान ' नाम
से विख्यात होते थे । मनु ने लिखा है–