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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। (५१५)
न पाता हुआ तबतक पूर्ववत् शयन स्थानमें जाकर कुबडेकी टांगे पकड साम-
र्ध्यसे अपने मस्तकपर घुमाकर त्रिस्तनीके हृदयमें प्रहार करता हुआ । तब
कुब्जके प्रहारसे उसका तीसरा स्तन हृदयमें प्रवेश कर गया और बलसे मस्तकके
ऊपर घुमानेसे कुबडा सीधा होगया । इससे मैं कहता हू-
अन्धकः कुब्जकश्चैव राजकन्या च त्रिस्तनी ।
त्रयोऽप्यन्यायतः सिद्धाः सन्मुखे कर्मणि स्थिते ॥१०१॥”
अन्धा, कुबडा और तीन स्तनवाली राजकन्या यह तीनों सम्मुख कर्मकी
स्थितिमें अन्यायसे सिद्ध हुए ॥ १०० ॥”
सुवर्णसिद्धिः आह,–“भोः सत्यमेतत्, दैवानुकूलतया
सर्वं कल्याणं सम्पद्यते । तथापि पुरुषेण सतां वचनं कार्य्यम् ।
न पुनः एवमेव वर्त्तते स त्वमिव विनश्यति ।
सुवर्णसिद्धि बोला,–“भो ! यह सत्य है, देवानुकूलतासे सब कार्यमें मंगल
होगा तो भी पुरुषको सत्पुरुषोके वचन करने चाहिये, न कि ऐसाही है यह
कहनेसे वह पुरुष तुम्हारी समान नष्ट होगा ।
तथाच-
और देखो-
एकोदराः पृथग्ग्रीवा अन्योऽन्यफलभक्षिणः ।
असंहता विनश्यन्ति भारण्डा इव पक्षिणः ॥ १०१ ॥”
एक उदर, पृथक् ग्रीवावाले परस्पर फलके भक्षण कर्ता मेल न करनेसे भारण्ड
पक्षीकी समान नष्ट होते हैं ॥ १०१ ॥”
चक्रधर आह,–“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत् ।
चक्र धर बोला,–“यह कैसे ?” वह बोला-
कथा १४.
कस्मिंश्चित् सरोवरे भारण्डनामा पक्षी एकोदरः पृथग्-
ग्रीवः प्रतिवसति स्म । तेन च समुद्रतीरे परिश्रमता किञ्चित्
फलम् अमृतकल्पं तरङ्गाक्षिप्तं सम्प्राप्तम् । सोऽपि भक्षयन्
इदमाह,–“अहो! बहूनि मया अमृतप्रायाणि समुद्रकल्लोला-
हृतानि फलानि भक्षितानि । परमपूर्वोऽस्य आस्वादः, तत