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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 536 में से

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पृष्ठ 474

भाषाटीकासमेतम् । ( ४५९ )
घरमे जाकर विचारने लगा,- "अवश्यही यह सब बौद्ध सन्यासी शिरमे डण्डेसे
प्रहार करनेसे सोनेके होजाते हैं सो मैंभी बहुतोंको बुलाकर डण्डोंसे शिरमें
प्रहार करके मारू । जिससे मेरे यहा बहुत धन होजाय" । ऐसा विचार कर
बडे कष्टसे उसने रात बिताई प्रात.कालही उठकर एक बडे डण्डेको तयारकर
संन्यासियोंके विहारस्थलमें जाकर जिनेन्द्रकी तीन प्रदक्षिणा करके जंघाके बलसे
पृथ्वीमें बैठकर वक्रद्वार ( मुख ) में दुपट्टा लपेटे हुए ऊंचे स्वरसे इस श्लोकको
पढने लगा-
जयन्ति ते जिना येषां केवलज्ञानशालिनाम् ।
आजन्मनः स्मरोत्पत्तौ मानसेनोषरायितम् ॥ १२ ॥
केवल निरवच्छिन्न ज्ञानवाले जिनके चित्तमें जन्मसेही कामोत्पत्ति उषरवत्
रही है (नहीं हुई) वे क्षपणक सबसे उत्कृष्ट वर्तते हैं ॥ १२ ॥
अन्यच्च-
औरभी-
सा जिह्वा या जिनं स्तौति तच्चित्तं यज्जिने रतम् ।
तावेव च करौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ ॥ १३ ॥
वही जिह्वा है जो जिनकी स्तुति करती है, वही चित्त है जो जिनमें रत
है, वही श्लाघनीय हाथ हैं जो बौद्धकी पूजा करनेवाले हैं ॥ १३ ॥
तथा च-
और देखो-
ध्यानव्याजमुपेत्य चिन्तयसि कामुन्मील्य चक्षुः क्षणं
पश्यानंगशरातुरञ्जनमिमं त्रातापि नो रक्षसि ।
मिथ्याकारुणिकोऽसि निर्घृणतरस्त्वत्तः कुतोऽन्यः पुमान्
सेर्ष्यं मारवधूभिरित्यभिहितो बौद्धो जिनः पातु वः॥१४॥
हे माननीय ! ध्यानके बहानेसे किस कान्ताका स्मरण करता है, आख खोल-
कर कामबाणसे विद्ध इस जनको अवलोकन कर । त्राणमें समर्थ होकरभी हमारी
रक्षा क्यो नहीं करता ? । इस कारण तुम अलीक दयावाले हो, तुमसे अधिक
और निर्दयी पुरुष कौन होगा, ईर्ष्यापूर्वक कामदेवकी वधूसे इस प्रकार कहेहुए
बौद्ध जिन तुम्हारी रक्षा करै ॥ १४ ॥