पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
सुखेन तिष्ठ" । अथ स ब्राह्मणो दैववशात् केनापि साधुना
कूपादुत्तारितः परिभ्रमन् तदेव नगरं आयातः । तया दुष्ट-
भार्य्यया दृष्टो राज्ञे निवेदितः । “ राजन् ! अयं मम भर्तुः
वैरी समायातः ” । राज्ञा अपि वधः आदिष्टः । सोऽब्रवीत्-
“देव ! अनया मम सक्तं किञ्चिद् गृहीतमास्ति यदि त्वं धर्म-
वत्सलः तद्दापय” । राजा अब्रवीत्-“भद्रे ! यत् त्वया अस्य
सक्तं किञ्चिद्गृहीतमास्ति तत् समर्पय” । सा प्राह-“देव !
मया न किञ्चित् गृहीतम्” । ब्राह्मण आह-“यन्मया त्रिवा-
चिकं स्वजीवितार्द्धं दत्तं तद्देहि” । अथ सा राजभयात् तत्र
एव त्रिवाचिकं एव जीवितमनेन दत्तमिति जल्पन्ती प्राणैः
विमुक्ता । ततः सविस्मयं राजा अब्रवीत्-“किमेतत्” इति।
ब्राह्मणेनापि पूर्ववृत्तान्तः सकलोऽपि तस्मै निवेदितः। अतोऽहं
ब्रवीमि-
किसी स्थानमें कोई ब्राह्मण था । उसको अपनी स्त्री प्राणोंसेभी अधिक
प्यारी थी । वह प्रतिदिन कुटुम्बके साथ क्लेश करती नहीं उपरामको प्राप्त
होती थी । वह ब्राह्मणभी क्लेशको न सहकर भार्याके प्रेमसे अपने कुटुम्बको छोड
ब्राह्मणीके संग बहुत दूर देशको चला गया । तब महाजंगलके मध्यमें ब्राह्मणीने
कहा-“आर्य्यपुत्र ! मुझे बडी प्यास लगी है । सो कहीं जलकी खोज करो” ।
तब यह उसके वचन कहनेपर जबतक जल लेकर आता है तबतक उसे मरा
देखता हुआ । अति प्यारके कारण दुःखसे जब विलाप करने लगा । तब
आकाशवाणी सुनाई दी । “हे ब्राह्मण ! यदि तू इसे अपने जीवनके आधे दिन
देगा तो यह ब्राह्मणी जिये”। यह सुन ब्राह्मणने पवित्र होकर तीन बार उच्चा-
रण कर अपने जीवनका अर्ध दिया । बोलनेके साथही वह ब्राह्मणी जी उठी ।
तब वे दोनों जल पान कर वनके फल भक्षण करते चलने लगे । तब क्रमसे
किसी नगरके देशमें पुष्पवाटिका में प्रवेश कर ब्राह्मणने अपनी भार्यासे कहा-
“भद्रे ! जबतक मैं भोजन ग्रहण कर आऊं । तबतक तुम यहीं रहो”। ऐसा कह
ब्राह्मण नगरके बीचमें गया । तब उस पुष्पवाटिका में एक लंगडा कुएकी सींडी
पर खेलता हुआ मनोहर वाणीसे गीत गा रहा था । उसको सुन कामबाणसे